देस-परदेस : पाकिस्तानी ‘डिप्लोमैटिक’ वज़न बढ़ने का मतलब

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 21-04-2026
Home and Abroad: The Significance of Pakistan’s Growing ‘Diplomatic’ Clout
Home and Abroad: The Significance of Pakistan’s Growing ‘Diplomatic’ Clout

 

ffप्रमोद जोशी

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ समझौता हुआ, तो उसपर दस्तखत करने मैं ख़ुद इस्लामाबाद जा सकता हूँ. उनकी इस बात से युद्ध को लेकर उनके दृष्टिकोण के अलावा पाकिस्तान के प्रति उनका झुकाव भी नज़र आता है.

मंगलवार को इस्लामाबाद में बातचीत का दूसरा दौर होने जा रहा है, जिसमें कम से कम ट्रंप नहीं आ रहे हैं. इसका मतलब है कि प्रगति तो हुई है, पर अभी समझौते की स्थिति नहीं है.

ब्रिटिश साप्ताहिक इकोनॉमिस्ट ने लिखा है कि ईरानी नेतृत्व के भीतर मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं. पिछले 10-11 अप्रेल को हुई बातचीत में अमेरिकी प्रतिनिधियों से बहस करने के बजाय ईरानी प्रतिनिधियों ने आपस में ही बहस कर डाली. उसे रोकने में ही पाकिस्तानी मध्यस्थों का समय लग गया.

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मुनीर-शहबाज़ की तारीफ

जो ध्यान देने वाली बात है, वह यह कि ट्रंप पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की बार-बार तारीफ़ कर रहे हैं. उनकी इस तारीफ़ में भी प्रधानमंत्री के मुकाबले आसिम मुनीर की तारीफ़ का पुट ज्यादा है.

ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए हमें पाकिस्तान के वर्तमान नेतृत्व की संरचना को समझना होगा. आप इतना समझ लें कि ट्रंप की नज़रों में आसिम मुनीर ‘काम के आदमी’हैं. वे ट्रंप के फ़ेवरेट हैं. वे पहले भी कह चुके हैं कि मुनीर ईरान को 'ज़्यादातर लोगों से बेहतर' जानते हैं.

इस बात से मुनीर और शरीफ़ साहब और पाकिस्तानी विदेश-नीति के कर्णधार खुश ज़रूर हो सकते हैं, पर पाकिस्तान की राज्य-शक्ति का वज़न नहीं बढ़ेगा. बेशक उसकी डिप्लोमेसी की विज़िबिलिटी बढ़ी है, वज़न नहीं. वज़न तभी बढ़ेगा, जब उसके अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधरेंगे.

शैलियों का अंतर

इस दौरान भारत और पाकिस्तान की डिप्लोमेसी का अंतर स्पष्ट हुआ है. पाकिस्तानी शैली में ‘मौकापरस्ती और जोखिम उठाने का जज़्बा’ है. भारत ने इस विवाद के दूरगामी परिणामों को देखते हुए सतर्कता का परिचय दिया है.

इस लड़ाई और उसके बाद की सामरिक-भौगोलिक स्थिति अभी अनिश्चित है. फिलहाल पाकिस्तान प्रासंगिक लग रहा है, सिर्फ वार्ता-स्थल के कारण. वह दोनों पक्षों में से किसी को प्रभावित नहीं कर सकता. उनसे अनुनय-विनय ही कर सकता है. आने वाले समय के आर्थिक और भू-राजनीतिक हालात में वह कहाँ खड़ा होगा, अभी कहना मुश्किल है.

भारत ने जानबूझकर किसी का पक्ष लेने, मध्यस्थता से बचने और सक्रियता का आभास देने से भी परहेज किया है. विदेशमंत्री एस जयशंकर ने राजनयिक परंपराओं से हटकर एक कड़वी बात ज़रूर कही है कि भारत ‘मध्यस्थ देश’ या दलाल नहीं है. इसमें पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, पर इशारा तो वही है.

भारत, उभरती हुई वैश्विक शक्ति है. हमारा आकार, अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिष्ठा स्वतः ही प्रभाव में तब्दील होगी. भारत अक्सर सतर्क पर्यवेक्षक की तरह व्यवहार करता है, संकट के क्षणों में हस्तक्षेप करने के बजाय उनसे दूर रहना पसंद करता है.

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पश्चिम एशिया के हालात

यह सावधानी अनुचित नहीं है, क्योंकि हमारा कई तरह की चुनौतियों से सामना है. ईरान और खाड़ी देशों पर ऊर्जा निर्भरता, भारतीय कामगारों के हित, इसराइल के साथ महत्वपूर्ण रक्षा संबंध और अमेरिका के साथ रणनीतिक गठबंधन.

किसी भी तरह का खुला रुख अपनाना इस नाजुक संतुलन को बिगाड़ेगा. फिर भी हमें अपने दीर्घकालीन हितों के बारे में विचार करना होगा. सवाल केवल पाकिस्तान का नहीं है, बल्कि अमेरिका की बदलती नीतियों का भी है.

हो सकता है कि पश्चिम एशिया और संभवतः अफगानिस्तान में पाकिस्तान को अब अमेरिका बड़ी सुरक्षा भूमिका सौंप दे. इस इलाके में हमारे व्यापक हित हैं, जिसमें पाकिस्तान अड़ंगा लगा सकता है.

ट्रंप प्रशासन, चीन से भी रिश्ते सुधार रहा है. ऐसे में क्वॉड की भूमिका को लेकर भी सवाल हैं. भारत ने अपने आपको अमेरिका का पिट्ठू बनाने की कोशिश कभी नहीं की. भविष्य में भी नहीं करेगा. पिछले साल ट्रंप की आतिशबाजी के पहले ही भारत ने चीन के साथ अपने रिश्तों को यों ही सुधारना शुरू नहीं किया था.

पाकिस्तानी पहल

पहली नज़र में पाकिस्तानी पहल ध्यान खींचती है. अपनी प्रासंगिकता स्थापित करना फिलहाल पाकिस्तान की वरीयता है. राजनयिक दृष्टि से पाकिस्तान, बेहद असुरक्षित रहता है. वह लगातार मान्यता, प्रासंगिकता और बाहरी जुड़ाव की तलाश में रहता है.

इस मामले में उसने आगे बढ़कर अपनी तात्कालिक निष्क्रियता को त्यागा है. उसे अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ मिलता ही है, जो हमेशा मिलेगा, पर उसके विखंडन से न हमें कुछ मिलेगा और न पश्चिमी देशों को. ज़रूरत पड़ने पर मुद्राकोष से सहारा भी मिलेगा.

उसे इस बात पर खुशी है कि उसकी विज़ुअलिटी बढ़ गई है. उसने जो किया है, वह चीन भी कर सकता था. पर उसने खुद को पीछे रखा. उसने पाकिस्तानी प्रयासों को सहारा दिया, पर इलाके के देशों के रिश्तों की जटिलता को समझते हुए खुद को दूर रखा.  

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मोदी की तारीफ़

ट्रंप ने भी इसबार पाकिस्तान की तारीफ़ करते वक़्त इस बात का ख़याल रखा कि इससे भारत को लेकर कोई संदेश न जाए. जिस वक़्त वे यह बात कह रहे थे, उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी तारीफ़ की और उन्हें अपना 'अच्छा दोस्त' बताया.

14 अप्रैल को ट्रंप ने मोदी से 40 मिनट तक फोन पर बातचीत की. भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के अनुसार, उन्होंने मोदी से कहा, ‘मैं बस आपको यह बताना चाहता हूं कि हम सब आपसे प्यार करते हैं.’

14 अप्रैल को ही ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिया कि अमेरिका-ईरान वार्ता अगले दो दिनों में फिर से शुरू होगी और यह पाकिस्तान में होगी. इन बातों का विवेचन करते हुए हमें बदलती स्थितियों पर नज़र डालनी होगी.

अमेरिकी निगाहें

अमेरिका क्या भारत-पाकिस्तान संबंधों को पुराने दौर में ले जाएगा? अमेरिका ने पाकिस्तान को मध्यस्थता की जो भूमिका सौंपी है और जिसे ईरान ने भी स्वीकार कर लिया है, उससे पश्चिम एशिया और इस्लामी जगत में उसकी छवि सुधरेगी.

भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों को राष्ट्रीय हितों की सीमा के भीतर रखना है. पिछले साल टैरिफ और ‘ऑपरेशन सिंदूर’प्रकरणों में ट्रंप प्रशासन ने भारत के प्रति अपनी हिकारत को कई तरह से व्यक्त किया था. पर भारत ने कड़वी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, पर उसके दबाव को स्वीकार भी नहीं किया.

बेशक अमेरिका हमारी अनदेखी नहीं करेगा, पर वह भारत को इतना प्रभावशाली बनते दखना नहीं चाहेगा कि वह अमेरिकी हितों को चुनौती दे सके. सवाल है कि क्या भारत का स्वास्थ्य अमेरिका की कृपा-दृष्टि पर निर्भर करता है?

अमेरिकी विदेश उपमंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने रायसीना डायलॉग 2026 में स्पष्ट किया कि अमेरिका भारत के मामले में वह व्यापारिक गलती नहीं दोहराएगा, जो उसने 20 साल पहले चीन के साथ की थी. पर इससे भारत का विकास रुक नहीं जाएगा. दस-बीस साल और सही.

ट्रंप जिस अंदाज़ में अब आसिम मुनीर की पीठ ठोक रहे हैं, वह विस्मयकारी नहीं लगता. उन्होंने न केवल मुनीर की तारीफ़ की है, बल्कि उन्हें शरीफ़ से ऊँचा दर्जा दिया है. मुनीर ने ईरान में बातचीत की है. वार्ता की बागडोर अब उनके हाथ में है.यह मौके की बात है. ट्रंप बुनियादी तौर पर व्यापारी है. पाकिस्तान की हैसियत को वे बेहतर जानते-समझते हैं.

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मुनीर का महत्त्व

मुनीर एकमात्र फौजी अफ़सर हैं, जिन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति ने वाइट हाउस में वार्ता और दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया था. ऐसा करके ट्रंप ने पाकिस्तान की लगातार कमजोर होती लोकतांत्रिक संरचनाओं पर भी प्रहार किया.

ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के साथ मुनीर के संपर्क अमेरिका-ईरान वार्ता के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह समझ पाना मुश्किल है कि ट्रंप ने पाकिस्तान के असैनिक नेतृत्व और निर्वाचित संस्थानों की कीमत पर सार्वजनिक रूप से फौजी जनरल को महत्त्व क्यों दिया?

1971 की ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ के दौर में पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन के संपर्क में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उसके बाद पाकिस्तान की डिप्लोमेसी यह अंदाज़ पहली बार दिखाई पड़ा है. इस समय हालात 1971 जैसे नहीं हैं. उस समय पाकिस्तान पूरी तरह से अमेरिकी खेमे में था. कुछ साल पहले तक उसकी डिप्लोमेसी रसातल में थी और आर्थिक स्थिति बदहाल.

उसे बदहाली की हालत से बाहर निकालने में अमेरिका की बड़ी भूमिका है.  इमरान खान के प्रधानमंत्रित्व में अमेरिका को लेकर वहाँ कड़वा माहौल पाकिस्तान में बन गया था.

अमेरिका से जुड़े तार   

अंततः इमरान को हटना पड़ा, पर यह बात छिपी नहीं रही कि पाकिस्तानी सेना के अमेरिका के साथ तार जुड़े हैं. 2025 के ‘ऑपरेशन सिंदूर’के बाद यह बात और अच्छी तरह साफ हो गई.

पाकिस्तान, उसकी सेना और अब राजनीति के भी अमेरिका के साथ अच्छे रिश्तों के पीछे अनेक कारण हैं. सबसे बड़ा कारण है, उसका मुस्लिम देश होना और दक्षिण एशिया में सामरिक-दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण जगह पर होना.

इन रिश्तों में उतार-चढ़ाव आता रहा है. 2023 में जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की विजय हो रही थी, तब अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों में भी गिरावट आ रही थी.

बहरहाल अब कहानी बदल चुकी है. कोई नहीं कह सकता कि आगे परिस्थितियाँ क्या करवट लेंगी, लेकिन इतना साफ़ है कि पाकिस्तान ने ट्रंप के साथ अपने संबंधों का फ़ायदा तेज़ी से उठाया है.

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पाकिस्तान को लाभ

इस वक्त बात केवल अमेरिका की ही नहीं है. युद्ध-विराम होने पर तमाम देशों ने इस पहल के लिए पाकिस्तान की तारीफ की है. हालाँकि, यह युद्धविराम अस्थायी है, पर उसके कारण हालात बिगड़ने से बच गए.

पाकिस्तान के पीछे अमेरिका ही नहीं है, बल्कि चीन, रूस और तुर्की जैसे देशों का भी उसे समर्थन हासिल है. अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक इसे पाकिस्तान की बड़ी राजनयिक सफलता बता रहे हैं और संघर्ष को रोकने में इस्लामाबाद की भूमिका की प्रशंसा कर रहे हैं.

कभी क्षेत्रीय अस्थिरता से जुड़े देश के रूप में प्रसिद्ध पाकिस्तान की अब शांति को बढ़ावा देने और उग्रवाद का मुकाबला करने के लिए सक्रिय रूप से काम करने की छवि उभर कर सामने आई है. संयोग है कि इस वक्त वह अफ़ग़ानिस्तान के साथ लड़ भी रहा है, पर उसका ज़िक्र कोई नहीं कर रहा है.

मध्यस्थता की विसंगतियाँ

पाकिस्तान ने खुद को मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया है. आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल तेहरान पहुँचा है और शहबाज़ शरीफ सऊदी अरब. दूसरी तरफ़ हाल में ही पाकिस्तान के लड़ाकू विमान और सैन्य बल सऊदी अरब पहुँचे.

रॉयटर्स से बात करते हुए पाकिस्तान के एक अधिकारी ने, कहा कि सऊदी अरब पहुँचे पाकिस्तानी सैनिक ‘किसी पर हमला करने के लिए नहीं’ हैं. बहरहाल यह तैनाती दोनों देशों के बीच पिछले साल हुए रक्षा समझौते का हिस्सा मानी जा रही है.

ईरानी हमलों के बाद सऊदी अरब में अपनी सेना भेजना पाकिस्तान की उस मध्यस्थ भूमिका पर भी सवाल उठाता है. हाल में पाकिस्तान ने यूएई को कर्ज़े के 3.5 अरब डॉलर लौटाए, तो सऊदी अरब ने 3 अरब डॉलर की अतिरिक्त वित्तीय सहायता की घोषणा कर दी.

खाड़ी देशों के आपसी रिश्तों में खलिश है और अमेरिकी सुरक्षा छतरी को लेकर असंतोष. इस बात का असंतोष भी है कि ईरान के साथ अमेरिका ने युद्ध छेड़ने का जो फ़ैसला लिया, उसमें उनके हितों और संभावित नुकसान के बारे में नहीं सोचा गया.

( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)

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