हरजिंदर
हमारे पास ऐसे कुछ उदाहरण हैं जब किसी जगह पर दंगा हो गया और उसके बाद शहर के लोग सहम गए। अचानक लोगों को लगा कि यह क्या हो गया है। फिर सब उस हिंसा और तनाव को भूलकर जिंदगी को दुबारा पटरी पर लाने में जुट गए।लेकिन यह अतीत की बाते हैं। क्या आजकल भी ऐसा होता है। जब हम दो साल पहले ब्रिटेन के कुछ हिस्सों में हुए दंगों के बाद का माहौल देखते हैं तो पता लगता है कि बदकिस्मती से अब ऐसा नहीं होता।
सितंबर 2024 में ये दंगे साउथपोर्ट में हुए थे। कारण यह था कि पश्चिम एशिया के संकट के कारण कुछ शरणार्थी वहां पर आ रहे थे। जिन्हें लेकर अफवाहों का दौर चला और फिर तनाव फैल गया। तनाव को ठंडा करने की कही कोई कोशिश नहीं थी। प्रदर्शन हुए और इस दौरान हुई छुट-पुट हिंसा की घटनाओं ने जल्द ही दंगों का रूप ले लिया।
दंगे जल्द ही ब्रिस्टल, हेनले, टमवर्थ जैसी जगहों पर फैल गए। शरण की उम्मीद में आने वाले सभी लोग मुस्लिम थे इसलिए दंगों ने मुस्लिम विरोधी रूप ले लिया, फिर एशियाई और अफ्रीकी सभी विदेशी मूल के लोग इसकी चपेट में आने लगे।

दंगों के बाद क्या हुआ। ताजा आंकड़ें तो उपलब्ध नहीं हैं लेकिन पिछली मार्च तक के ब्रिटिश गृह मंत्रालय के आंकड़ें बताते हैं कि 12 महीनों के दौरान इंग्लैंड और वेल्स में मुस्लिम विरोधी नफरती अपराधों में 19 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
दूसरी तरफ ब्रिटिश मुस्लिम ट्रस्ट का कहना है कि इस दौरान 56 प्रतिशत मुसलमानों को किसी न किसी रूप में नफरत का सामना करना पड़ा है। इनमें स्कूलों में पढ़ने वाले छोटे बच्चे भी शामिल हैं। कईं बार उनके साथ पढ़ने वाले बच्चे ही उनके खिलाफ हिंसक हो जाते हैं।
Lynching or public beatings by radical Islamist mobs, claiming to be Touhidi Janata who chant "Naraye Taqbir," have been very common since the July riots of 2024; rights groups put the number of deceased at 350+, but the frequent discovery of unidentified bodies left abandoned… pic.twitter.com/29pYbGFdtA
— Probir Kumar Sarker (@probirbidhan) June 21, 2026
इसका असर ब्रिटिश मुसलमानों की जीवन शैली पर भी पड़ा है। समुदाय के लोगों ने कुछ खास इलाकों में जाना बंद कर दिया है। अब वे शाम को लोगों के साथ घुलने-मिलने के लिए भी नहीं निकलते। उन्होंने दूसरों शहरों में घूमने जाना भी बंद कर दिया है। समुदाय की एक नेता अकीला अहमद का मानना है कि इससे समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि वह बढ़ ही सकती है। लेकिन शायद लोगों को यही आसान तरीका समझ में आ रहा है।
बिे्रटेन में नफरती अपरोधों के लिए एक नीति हुआ करती थी जिसकी मियाद 2020 में ही खत्म हो गई थी। इस साल की शुरुआत में सरकार ने धर्मस्थलों की सुरक्षा के लिए चार करोड़ पौंड का प्रावधान किया। हालांकि यह इतना नहीं था कि इसके कुछ नतीजे निकलते। ब्रिटिश मुस्लिम ट्रस्ट के अनुसार तीन महीनों के दौरान ही 25 मस्जिदों पर हमले हुए हैं।

रनीमेडे ट्रस्ट की डाॅयरेक्टर शबाना बेगम का कहना है कि दक्षिणपंथियों ने बाहर से आने वाले अप्रवासियों के खिलाफ भावनाओं को मुस्लिम विरोधी भावनाओं में बदलने में कामयाबी हासिल कर ली है। और इसका दायरा अब सभी अश्वेत लोगों तक बढ़ रहा है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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