राजीव नारायण
हाल ही में अमेरिका में एक बड़ी हलचल देखने को मिली। वहां के प्रशासन ने एआई क्षेत्र की दिग्गज कंपनी एंथ्रोपिक को उसके सबसे आधुनिक 'फ्रंटियर एआई' सिस्टम को लेकर घेरा है। यह घटना सिर्फ एक सरकार और एक कंपनी के बीच का विवाद नहीं है। यह इशारा करती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) अब सिर्फ एक तकनीक नहीं रह गई है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, शासन और आर्थिक अस्तित्व का एक बड़ा हथियार बन चुकी है।
यही वजह है कि भारत को भी अब इस दिशा में अपनी रफ्तार तेज करनी होगी। उभरती हुई डिजिटल शक्ति होने के नाते भारत के सामने यह एक बड़ा अवसर भी है और चुनौती भी। अगर इसका सही उपयोग किया जाए तो स्वास्थ्य, खेती, प्रशासन और बुनियादी ढांचे को पूरी तरह बदला जा सकता है। लेकिन अगर हम पूरी तरह से विदेशी एआई सिस्टम पर निर्भर रहे तो डेटा सुरक्षा और भ्रामक जानकारियों का खतरा बढ़ जाएगा। आज भारत एआई के एक महत्वपूर्ण चौराहे पर खड़ा है।

भारतीय एआई की जरूरत और जमीनी हकीकत
भारत की एआई से जुड़ी चुनौतियां बाकी दुनिया से काफी अलग हैं। हमारे देश की विविधता और आबादी बहुत बड़ी है। हम बाहर के देशों में बने एआई मॉडल को सीधे तौर पर अपने देश में लागू नहीं कर सकते।
विदेशी तकनीक भारतीय भाषाओं, ग्रामीण परिवेश और हमारी प्रशासनिक वास्तविकताओं को समझने में नाकाम साबित हो रही है। इसलिए देश के विकास और हर वर्ग को जोड़ने के लिए स्वदेशी एआई तकनीक बनाना हमारी मजबूरी बन गया है।
भारत सरकार ने इस बात को समय रहते समझा है। देश के भीतर एआई और सेमीकंडक्टर क्षमता बढ़ाने को पहली प्राथमिकता दी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद एआई को विकास का सबसे बड़ा माध्यम मानते हैं।
हमारे पास पहले से ही डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का एक मजबूत नेटवर्क मौजूद है। हालांकि एआई की रेस बहुत तेज है। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार, उद्योग जगत और वैज्ञानिकों को मिलकर काम करना होगा।
हमें अनुसंधान और घरेलू कंप्यूटर इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा निवेश करने की आवश्यकता है। अब परीक्षा इस बात की है कि भारत सिर्फ विदेशी एआई कंपनियों के लिए एक बाजार बनकर न रह जाए। हमें अपनी क्षमता खुद विकसित करनी होगी।
बिना आहट के बढ़ता दायरा और नए खतरे
एआई हमारी जिंदगी में इस कदर शामिल हो चुका है कि आम लोगों को इसका अहसास भी नहीं है। हम इंटरनेट पर क्या देखते हैं, कौन सा विज्ञापन हमारे सामने आता है और हमारे वित्तीय फैसले कैसे तय होते हैं, यह सब एआई एल्गोरिदम तय कर रहा है। दुनिया भर की सरकारें अपने कामकाज में एआई का इस्तेमाल बढ़ा रही हैं। यह बदलाव आने वाले दिनों में और तेज होने वाला है।
इस तकनीक के साथ कुछ गंभीर पेचीदगियां भी सामने आ रही हैं। हाल ही में जम्मू कश्मीर से जुड़ा एक फर्जी एआई वीडियो सामने आया था। इस घटना ने सबको चौंका दिया। यह दिखाता है कि एआई के जरिए किसी की पहचान और नकली मीडिया का दुरुपयोग कितना आसान हो गया है।
इन चीजों को रोकना और पकड़ना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। एआई बनाने वाले कई विशेषज्ञ खुद अपनी नौकरियों से इस्तीफा दे चुके हैं। वे इसके खतरों को लेकर दुनिया को आगाह कर रहे हैं। यही कारण है कि एआई के नियमन को लेकर बहस तेज हो गई है।
@debjani_ghosh_ , Distinguished Fellow, @NITIAayog, shared her insights during the panel discussion on "AI, DPI & Emerging Technologies – Building the Future of Rural Governance" at the Workshop on Leveraging AI for Rural Development (Viksit Gram for Viksit Bharat).
— IndiaAI (@OfficialINDIAai) June 25, 2026
Highlighting… pic.twitter.com/YYrNvbCLKN
डेटा संप्रभुता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
एआई को जिंदा रखने और उसे बेहतर बनाने के लिए सबसे जरूरी चीज डेटा है। इस मामले में भारत बहुत समृद्ध है। स्मार्टफोन का बढ़ता इस्तेमाल और डिजिटल लेन-देन हर रोज भारी मात्रा में डेटा तैयार कर रहे हैं। यह डेटा हमारी सबसे बड़ी ताकत है लेकिन इसके साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी आती है।
दुनिया के कुछ देशों ने इस बदलाव को बहुत पहले भांप लिया था। ताइवान ने टीएसएमसी जैसी कंपनियों के दम पर खुद को इस क्रांति के केंद्र में स्थापित किया। अमेरिकी कंपनी एनवीडिया ने कंप्यूटर इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में अपना दबदबा बनाया।
यह पूरी लड़ाई सिर्फ सॉफ्टवेयर की नहीं है। यह सेमीकंडक्टर, बिजली की उपलब्धता और तकनीकी संप्रभुता से जुड़ी हुई है। भारत ने भी इस दिशा में अपनी नीतियां बनाई हैं लेकिन वैश्विक रफ्तार को देखते हुए हमें और अधिक निवेश और बेहतर तालमेल की जरूरत है।

बुनियादी ढांचे पर दबाव और पर्यावरण की चिंता
एआई के विस्तार के साथ ही देश में डेटा सेंटर्स की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। ये डेटा सेंटर ही एआई की रीढ़ हैं। हालांकि इनका एक दूसरा पहलू भी है। ये सेंटर्स भारी मात्रा में बिजली और पानी की खपत करते हैं। मशीनों को ठंडा रखने के लिए लाखों गैलन पानी की जरूरत होती है। पश्चिमी देशों के कई शहरों में इसे लेकर विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो चुके हैं।
ग्लोबल इन्वेस्टर भारत की तरफ देख रहे हैं और यहां डेटा सेंटर्स का विस्तार हो रहा है। भारत को अपने डिजिटल विकास के साथ-साथ पर्यावरण और बिजली सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा। हमें विकास और प्रकृति के बीच एक सही संतुलन बनाना होगा। एआई के कारण साइबर खतरों का जोखिम भी बढ़ सकता है। इसके लिए हमें मजबूत सुरक्षा तंत्र तैयार करना होगा।

भविष्य का कानूनी ढांचा और जागरूकता
एआई की रफ्तार बहुत तेज है। हम पुरानी नीतियों के भरोसे इस पर नियंत्रण नहीं रख सकते। भारत को एक ऐसे आधुनिक कानूनी ढांचे की जरूरत है जो नए आविष्कारों को बढ़ावा दे और साथ ही जवाबदेही भी तय करे। मीडिया, डेटा गवर्नेंस और संवेदनशील क्षेत्रों में एआई के इस्तेमाल को लेकर कड़े नियम होने चाहिए।
इसके साथ ही आम जनता में जागरूकता बढ़ाना भी बेहद जरूरी है। जब इंटरनेट और सोशल मीडिया की शुरुआत हुई थी, तब समाज इसके खतरों को बहुत बाद में समझ पाया था। एआई एक ऐसा दोस्त है जो जितने मौके देता है, उतने ही खतरे भी लाता है।
अब सवाल यह नहीं है कि एआई हमारा भविष्य बदलेगा या नहीं। सच यह है कि वह भविष्य आ चुका है। अब मुख्य बात यह है कि हम इस तकनीक का सामना करने के लिए कितने तैयार हैं। जो देश सही रणनीति और सुरक्षात्मक उपायों के साथ आगे बढ़ेंगे, वही आने वाले समय में दुनिया का नेतृत्व करेंगे। भारत के पास ऐसा करने की पूरी क्षमता है।
