इस्लाम के नाम पर नहीं: तालिबान के कानूनी दावों की हकीकत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 02-03-2026
Not in the name of Islam: The reality of Taliban legal claims
Not in the name of Islam: The reality of Taliban legal claims

 

डॉ. उज़मा खातून

अफगानिस्तान से आ रही खबरें पूरी दुनिया को परेशान कर रही हैं। वहां तालिबान एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार कर रहा है जो समाज को सदियों पीछे ले जाने वाला है। हाल ही में 'क्रिमिनल प्रोसीजर कोड' नाम का एक 90 पन्नों का दस्तावेज सामने आया है। इस पर तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा के दस्तखत बताए जा रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह कानून नहीं बल्कि भेदभाव को सरकारी मुहर देने जैसा है।

एक मुस्लिम स्कॉलर होने के नाते मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि तालिबान इन सख्तियों को इस्लामी सिद्धांतों के रूप में पेश कर रहा है। जब नाइंसाफी को जायज ठहराने के लिए धर्म का सहारा लिया जाए, तो विद्वानों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। हमें देखना होगा कि तालिबान की इन नीतियों के पीछे जो दलीलें दी जा रही हैं, उनमें कितनी सच्चाई है।

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तालिबान के कानूनी ढांचे की कमजोरियां

इस नए कानून का सबसे डरावना हिस्सा घरेलू हिंसा की परिभाषा है। खबरों के मुताबिक, अगर कोई पति अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता है, तो उसे अपराधी तभी माना जाएगा जब पत्नी को कोई गहरा घाव हो या उसकी हड्डी टूट जाए। इसका मतलब यह हुआ कि थप्पड़ मारना या लात मारना अब वहां सामान्य बात मान ली जाएगी। यह कानूनी और नैतिक, दोनों नजरिए से एक बड़ी विफलता है। आज का कानून मानता है कि चोट सिर्फ शरीर पर नहीं, मन पर भी लगती है।

एक और बड़ी कमी सबूत जुटाने के तरीके में है। अगर किसी महिला के साथ बुरा होता है, तो उसे ही अदालत में अपनी बात साबित करनी होगी। विडंबना यह है कि वहां की अदालतों में महिलाओं की गवाही को कमतर आंका जाता है। इसे 'संरचनात्मक अन्याय' कहते हैं, जहां इंसाफ कागज पर तो होता है पर हकीकत में नहीं मिल पाता। एक निष्पक्ष व्यवस्था वही है जहां हर नागरिक की बात की बराबर कीमत हो।

समाज को श्रेणियों में बांटना, जैसे कि उलेमा, अभिजात वर्ग, मध्यम वर्ग और निचला वर्ग, एक और गंभीर गलती है। आधुनिक शासन का आधार बराबरी है। जब सजा इंसान के रुतबे को देखकर तय होने लगे, तो कानून का शासन खत्म हो जाता है। इस्लामी इतिहास में भी समाज के हर तबके को बराबर दर्जा देने की बात कही गई है, जो तालिबान की इस व्यवस्था के बिल्कुल उलट है।

तालिबान की नीतियों में इस्लाम और कबायली रिवाजों का घालमेल साफ दिखता है। पश्तूनवली जैसे पारंपरिक कोड, जिसमें सम्मान और गैरत के नाम पर महिलाओं पर पाबंदियां लगाई जाती हैं, उन्हें धर्म का नाम दिया जा रहा है। यह उन महान मुस्लिम सभ्यताओं के इतिहास को नकारने जैसा है जहां महिलाएं शिक्षा, व्यापार और शोध में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं।

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इस्लामी नजरिया: सुधार की जरूरत

इन गलतियों को सुधारने के लिए हमें इस्लाम के मूल सिद्धांतों की तरफ लौटना होगा। इस्लामी न्यायशास्त्र (Fقه) में हमेशा अलग-अलग विचारों और व्याख्याओं का सम्मान रहा है। किसी एक कट्टर व्याख्या को आखिरी मान लेना गलत है। शरिया का असली मकसद न्याय, दया और मानवीय गरिमा है। समय के साथ कानून की व्याख्या बदलती रही है।

महिलाओं की शिक्षा का मुद्दा ही ले लीजिए। कुरान का पहला शब्द था 'इकरा' यानी 'पढ़'। यह आदेश सिर्फ मर्दों के लिए नहीं था। पैगंबर मुहम्मद (SAW) ने साफ कहा था कि ज्ञान हासिल करना हर मुसलमान का फर्ज है। इतिहास गवाह है कि कई बड़ी महिला स्कॉलर्स ने हदीस और कानून की शिक्षा दी है। ऐसे में उच्च शिक्षा पर पाबंदी लगाना इस्लाम के खिलाफ है।

घरेलू संबंधों को लेकर कुरान की आयतों की व्याख्या भी अक्सर गलत की जाती है। 'कव्वामून' शब्द का अर्थ श्रेष्ठता नहीं बल्कि जिम्मेदारी और भरण-पोषण है। इसी तरह, पैगंबर साहब ने कभी अपनी पत्नियों पर हाथ नहीं उठाया। उनका संदेश था कि "तुममें से सबसे अच्छा वह है जो अपनी पत्नी के लिए सबसे अच्छा है।" जो व्यवस्था हिंसा को बढ़ावा दे, वह इस्लामी नहीं हो सकती।

ट्यूनीशिया, मोरक्को, पाकिस्तान, बांग्लादेश और हाल ही में सऊदी अरब जैसे देशों ने दिखाया है कि इस्लामी ढांचे के भीतर रहते हुए भी महिलाओं के अधिकारों को कैसे मजबूत किया जा सकता है। इन देशों ने घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून बनाए हैं और महिलाओं को शिक्षा व रोजगार के मौके दिए हैं। यह साबित करता है कि महिलाओं के अधिकार कोई पश्चिमी सोच नहीं बल्कि खुद इस्लाम की रूह का हिस्सा हैं।

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अफगानिस्तान का नया दंड संहिता मुस्लिम कानूनी सोच के लिए एक बड़ी चुनौती है। जब धर्म का इस्तेमाल नुकसान पहुँचाने के लिए किया जाए, तो चुप्पी तोड़ना जरूरी है। घरेलू हिंसा को हर हाल में अपराध माना जाए, अदालतों में महिलाओं को बराबर का हक मिले और शिक्षा के रास्ते फिर से खुलें।

इस्लाम का मूल न्याय और करुणा है। तालिबान की मौजूदा नीतियां इस्लाम के समृद्ध इतिहास की बहुत ही संकीर्ण और गलत व्याख्या पेश करती हैं। एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए जरूरी है कि हम परंपराओं को साहस और ईमानदारी के साथ समझें।

डॉ. उज़मा खातून, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पूर्व फैकल्टी, लेखिका और सामाजिक विचारक हैं।