अपने ही देश में पराये क्यों: उत्तर-पूर्व के साथ भेदभाव की कड़वी सच्चाई

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 01-03-2026
Why are we strangers in our own country: The harsh reality of discrimination against the Northeast?
Why are we strangers in our own country: The harsh reality of discrimination against the Northeast?

 

पल्लब भट्टाचार्य
 
बीते 20 फरवरी 2026 को दिल्ली के मालवीय नगर के एक साधारण अपार्टमेंट में मामूली सी बात पर विवाद शुरू हुआ। एयर कंडीशनर की मरम्मत के दौरान उड़ने वाली धूल ने एक बदसूरत मोड़ ले लिया। अरुणाचल प्रदेश की तीन युवतियां वहां किराए पर रहती थीं। पड़ोसियों ने उन पर नस्लीय टिप्पणियों और भद्दे तानों की बौछार कर दी। उन लड़कियों को "मोमो" कहा गया और उनके चरित्र पर सवाल उठाए गए। इस झगड़े का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। उत्तर-पूर्व में इसे लेकर भारी गुस्सा देखा गया।
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पुलिस ने हस्तक्षेप किया और भारतीय न्याय संहिता व एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तारियां कीं। इन गिरफ्तारियों का स्वागत हुआ। लेकिन यह घटना कोई इकलौता मामला नहीं थी। यह उस ढर्रे की याद दिलाती है जो दशकों से उत्तर-पूर्वी भारतीयों का पीछा कर रहा है। यह अपने ही देश में विदेशी समझे जाने का एक कड़वा अनुभव है।
 
मालवीय नगर की यह घटना उन मामलों की फेहरिस्त में एक और नाम है जो समय-समय पर देश को झकझोरते रहे हैं। साल 2014 में दिल्ली में निडो तानिया की हत्या कर दी गई थी। उनका कसूर सिर्फ यह था कि उन्होंने अपने लुक का मजाक उड़ाए जाने का विरोध किया था। उस वक्त केंद्र सरकार ने एम.पी. बेजबरुआ समिति का गठन किया था।
 
इसका मकसद महानगरों में रहने वाले उत्तर-पूर्वी लोगों के खिलाफ नस्लवाद की जांच करना था। एक दशक बाद उत्तराखंड में त्रिपुरा की छात्रा अंजेल चकमा की कथित नस्लीय हत्या ने फिर वही सवाल खड़े कर दिए। इन बड़ी घटनाओं के पीछे ऐसी सैकड़ों कहानियां छिपी हैं जो सामने नहीं आतीं। किसी को घर देने से मना कर दिया जाता है। दफ्तरों में सहकर्मी ताने मारते हैं। महिलाओं पर नैतिक पहरेदारी की जाती है। आम रास्तों पर चलते हुए उन्हें "चिंकी", "चाइनीज" या कोरोना काल में "कोरोना" कहकर चिढ़ाया जाता है।
 
बेजबरुआ समिति के समय के आंकड़ों पर गौर करें तो 2010 के शुरुआती सालों में दिल्ली में उत्तर-पूर्वी लोगों के खिलाफ अपराध तेजी से बढ़े थे। सर्वेक्षणों के मुताबिक राजधानी में रहने वाली उत्तर-पूर्व की अधिकांश महिलाओं ने किसी न किसी तरह के उत्पीड़न का सामना किया है। कई मामले तो दर्ज ही नहीं होते।
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यह प्रताड़ना शब्दों से शुरू होती है। चेहरे की बनावट, खान-पान, भाषा या कपड़ों पर कमेंट किए जाते हैं। फिर यह भेदभाव मकान मालिकों तक पहुँचता है। वे "संस्कृति" का हवाला देकर घर देने से मना कर देते हैं या अजीब शर्तें थोपते हैं। खुदरा व्यापार और होटल जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले युवाओं को अक्सर 'कमजोर' या 'चरित्रहीन' मानकर उनके साथ गलत व्यवहार किया जाता है। महिलाओं के लिए नस्लीय और लैंगिक भेदभाव एक साथ जुड़ जाते हैं। उनके पहनावे या सामाजिक जीवन को शक की निगाह से देखा जाता है।
 
आखिर यह नफरत खत्म क्यों नहीं होती? इसका एक कारण इतिहास में छिपा है। औपनिवेशिक काल में मानवविज्ञानी इन समुदायों को "मंगोलॉयड" जनजाति कहते थे। उन्हें मुख्यधारा से अलग माना जाता था। आजादी के बाद भी हमारी सोच में खास बदलाव नहीं आया।
 
स्कूली किताबों और मीडिया ने हमेशा गंगा के मैदानी इलाकों को ही 'असली भारत' के रूप में पेश किया। उत्तर-पूर्व का एक बड़ा हिस्सा हमारी कल्पनाओं में हाशिए पर ही रहा। इसका नतीजा यह है कि बहुत से भारतीय आज भी उन राज्यों के नाम तक नहीं जानते। वे अपने ही देश के नागरिकों को विदेशी समझ लेते हैं। चेहरे की बनावट या अलग भाषा को वे "पराया" होने का सबूत मान लेते हैं।
 
यह प्रक्रिया उत्तर-पूर्वी भारतीयों को "आंतरिक विदेशी" बना देती है। उनके पास भारतीय पासपोर्ट है और वे राजनीतिक रूप से भारतीय हैं। फिर भी उन्हें बार-बार अपनी नागरिकता और वफादारी साबित करनी पड़ती है। कोरोना महामारी जैसे संकट के समय यह पूर्वाग्रह खुलकर सामने आया। जब उन्हें "कोरोना" कहकर पुकारा गया या वायरस फैलाने का जिम्मेदार ठहराया गया, तो पता चला कि नस्लीय भेदभाव समाज की जड़ों में कितना गहरा है।
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यह नस्लवाद समाज में मौजूद अन्य ऊंच-नीच से भी जुड़ा है। सबसे बड़ी समानता जातिवाद के साथ दिखती है। संविधान ने 1950 में छुआछूत को खत्म कर दिया था। इसके बावजूद जातिगत भेदभाव आज भी एक हकीकत है। जातिवाद और नस्लवाद दोनों ही जन्म के आधार पर तय होते हैं। दोनों में ही सामने वाले को "दूसरा" या "नीचा" साबित करने के लिए मजाक और गालियों का सहारा लिया जाता है। ये प्रवृत्तियां कानून के बाद भी इसलिए बची हुई हैं क्योंकि इन्हें सामाजिक सोच से खाद-पानी मिलता है।
 
सरकार की प्रतिक्रिया समय के साथ बदली है। बेजबरुआ समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि उत्तर-पूर्वी प्रवासी खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। समिति ने कई कानूनी और प्रशासनिक सुधारों का सुझाव दिया था। इसमें नस्लीय गालियों को अपराध घोषित करना, विशेष पुलिस यूनिट बनाना और स्कूली पाठ्यक्रम में उत्तर-पूर्व के इतिहास को शामिल करना शामिल था।
 
इनमें से कुछ सुझावों पर अमल भी हुआ। दिल्ली पुलिस ने 1093 नाम की एक समर्पित हेल्पलाइन शुरू की। पुलिस बल में उत्तर-पूर्व के युवाओं की भर्ती बढ़ाई गई। स्टेट भवनों में शिकायत केंद्र बनाए गए और हॉस्टल की सुविधा बढ़ाई गई। यूजीसी ने विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के नियम सख्त किए। संसद में भी नस्लीय भेदभाव को रोकने के लिए नए कानूनी प्रावधानों पर चर्चा हुई।
 
लेकिन मालवीय नगर जैसी घटनाएं बताती हैं कि ये उपाय काफी नहीं रहे। कानून सख्त हुए लेकिन सामाजिक सोच नहीं बदली। भारत में आज भी एक स्पष्ट और व्यापक "नस्लवाद विरोधी कानून" की कमी महसूस होती है। असली चुनौती सांस्कृतिक है। कानून किसी अपराधी को सजा दे सकता है लेकिन वह सोच नहीं बदल सकता।
 
इसके लिए एक बड़े राष्ट्रीय अभियान की जरूरत है। स्कूली किताबों में अहोम साम्राज्य, नागा और मिजो आंदोलनों की कहानियां होनी चाहिए। युवाओं को खेल और कला के क्षेत्र में उत्तर-पूर्व के योगदान के बारे में बताना चाहिए। मीडिया को अपनी भूमिका समझनी होगी और उत्तर-पूर्वी लोगों को केवल "अजीब" या "विदेशी" दिखाने के बजाय सामान्य किरदारों में पेश करना होगा। रेंट एग्रीमेंट और हाउसिंग सोसायटियों के नियम ऐसे होने चाहिए जहाँ भेदभाव करने वालों की जवाबदेही तय हो।
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कानूनी स्तर पर भारत को एक ऐसे भेदभाव-विरोधी कानून की जरूरत है जो नस्ल, क्षेत्र, भाषा, जाति और धर्म सभी को कवर करे। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को नस्लीय आधार पर होने वाले अपराधों का अलग डेटा इकट्ठा करना चाहिए। मालवीय नगर की उन लड़कियों ने कोई विशेष अधिकार नहीं मांगा था। वे बस सम्मान और सुरक्षा चाहती थीं।
 
अगर भारत को अपनी विविधता पर गर्व करना है, तो उसे अपनी इस अंदरूनी बीमारी का इलाज करना ही होगा। "विविधता में एकता" का नारा तब तक अधूरा है जब तक हर भारतीय अपने चेहरे और लहजे के साथ इस देश में पूरी तरह सुरक्षित महसूस न करे।