आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ आवाज़: कश्मीर की नायक डॉ. दरख़शां अंद्राबी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 02-03-2026
Voice against terrorism and separatism: Kashmir's hero Dr. Darakshan Andrabi
Voice against terrorism and separatism: Kashmir's hero Dr. Darakshan Andrabi

 

एहसान फाज़िली/ श्रीनगर

कश्मीर की वादियों में जहाँ सियासत की राहें हमेशा से पेचीदा रही हैं, वहाँ एक नाम ऐसा है जिसने डर को कभी अपने करीब फटकने नहीं दिया। यह नाम है डॉ. दरख्शां अंद्राबी का। जो लोग कश्मीर को करीब से जानते हैं, वे इस बात के गवाह हैं कि यहाँ देश के पक्ष में बात करना कितना बड़ा साहस मांगता है। डॉ. अंद्राबी ने पिछले तीन दशकों में यही साहस दिखाया है। आज वह भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य हैं। इसके साथ ही वह जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन भी हैं। पिछले चार सालों से वह इस जिम्मेदारी को बड़ी मुस्तैदी से निभा रही हैं। उनकी पहचान केवल एक नेता की नहीं है। वे एक सुलझी हुई लेखिका, कवयित्री और शोधकर्ता भी हैं।

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डॉ. अंद्राबी की सबसे बड़ी पहचान तब बनी जब 16 मार्च 2022 को उन्होंने वक्फ बोर्ड की कमान संभाली। यह कोई मामूली समय नहीं था। 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटने के बाद यह पहली बड़ी नियुक्ति थी। वक्फ बोर्ड जैसी संस्था पर हमेशा से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का दबदबा रहा था। उन पर आरोप लगते थे कि उन्होंने दशकों तक वक्फ की संपत्तियों का दुरुपयोग किया। जब अंद्राबी ने कुर्सी संभाली तो उनके सामने एक बीमार और बदहाल संस्था थी। भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी थीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने साफ कहा कि मैं यहाँ लूट और कुप्रबंधन को खत्म करने आई हूँ।

उन्होंने महज एक साल के भीतर वक्फ बोर्ड को अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। पहले जो पैसा निजी जेबों में जाता था, अब वह सीधे बोर्ड के खातों में आने लगा। उन्होंने दरगाहों और वक्फ की संपत्तियों की मरम्मत शुरू कराई। यह काम आसान नहीं था। उन्हें वंशवादी राजनीति करने वालों और अलगाववादी विचारधारा के समर्थकों से धमकियां मिलीं। लेकिन डॉ. अंद्राबी ने अपना काम जारी रखा।

आज वक्फ की सारी संपत्तियां डिजिटल हो चुकी हैं। चंदा देने वालों को पता है कि उनका पैसा कहाँ खर्च हो रहा है। उन्होंने स्टाफ की तनख्वाह बढ़ाई और नए विभाग बनाए। उनके इस काम की तारीफ दिल्ली तक गूँजी। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ने संसद में उनके काम की सराहना की। उन्होंने जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड को पूरे देश के लिए एक आदर्श बताया।

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डॉ. अंद्राबी की राजनीतिक यात्रा भाजपा से काफी पहले शुरू हो गई थी। उन्होंने 'सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी' बनाई थी। उस वक्त कश्मीर में अलगाववाद का बोलबाला था। मुख्यधारा के नेता भी दबी जुबान में अलगाववादियों की भाषा बोलते थे।

ऐसे माहौल में दरख्शां ने 'वोट फॉर इंडिया' और 'शांति के लिए जनमत संग्रह' जैसे अभियान चलाए। ये अभियान कश्मीर की राजनीतिक सोच बदलने में मील का पत्थर साबित हुए। उन्होंने लोगों को बताया कि उनका भविष्य भारत के साथ ही सुरक्षित है। आतंकवाद के सबसे काले दिनों में भी वह डटकर खड़ी रहीं। उन्होंने कभी भी अलगाववादियों के साथ कोई समझौता नहीं किया। उनके स्पष्ट रुख ने उन्हें कश्मीर घाटी में भाजपा का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा बना दिया।

वह केवल राजनीति नहीं करतीं। वे समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने की कोशिश करती हैं। कश्मीर में जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आई या लोग आतंकवाद से पीड़ित हुए, वह हमेशा मदद के लिए आगे रहीं। उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। वे जानती हैं कि कश्मीर की महिलाओं ने हिंसा का सबसे बुरा दौर देखा है। उनकी मदद करना वह अपना धर्म मानती हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम आज भी जारी है। उन्हें राज्य के हर कोने से लोगों का समर्थन मिलता है।

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डॉ. अंद्राबी की शख्सियत का एक और पहलू उनकी साहित्यिक रुचि है। उन्होंने उर्दू और कश्मीरी साहित्य में बड़ा योगदान दिया है। वे चार भाषाओं पर पकड़ रखती हैं। उनके लेख और कविताएं रूह को छू लेने वाली होती हैं।

उनकी उर्दू शायरी की किताब 'दिल ही काफिर हो गया' और कश्मीरी कविता संग्रह 'अहसासन हंडे शीशे खाने' काफी प्रसिद्ध हैं। आलोचक उन्हें एक अनोखी शैली वाली लेखिका मानते हैं। वह जम्मू-कश्मीर कला एवं संस्कृति अकादमी की उर्दू पत्रिका की संपादक भी रही हैं। उनके साहित्यिक काम के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं। साल 2018 में उन्हें साहित्य का राज्य पुरस्कार दिया गया।

डॉ. दरख्शां अंद्राबी की पढ़ाई-लिखाई भी काफी मजबूत है। उन्होंने कश्मीर विश्वविद्यालय से उर्दू में एमए और बीएड किया। इसके बाद उन्होंने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर से पीएचडी की उपाधि ली। यह उनकी विद्वता ही है जो उनके भाषणों और लेखों में साफ झलकती है। वे किसी भी मुद्दे पर बहुत गहराई से बात करती हैं।

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आज जब कश्मीर एक नए युग में प्रवेश कर रहा है, डॉ. दरख्शां अंद्राबी जैसे नेतृत्व की बहुत जरूरत है। वह एक ऐसी नेता हैं जो धमकियों से नहीं डरतीं। उनके लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है। वे कश्मीर की उस आधी आबादी की आवाज हैं जो शांति और प्रगति चाहती है।

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वक्फ बोर्ड में उनके द्वारा किए गए सुधार इस बात का सबूत हैं कि अगर नियत साफ हो तो बदलाव मुमकिन है। वे आज कश्मीर की गलियों में एक उम्मीद बनकर घूमती हैं। उनका 'जय हिंद' का नारा पहाड़ों की चोटियों तक गूँजता है। वह सही मायनों में कश्मीर की बेटी और भारत की एक बुलंद आवाज हैं।