डॉ. फ़िरदौस ख़ान
इस्लाम के पांच सुतूनों में से एक ज़कात भी है। ज़कात का मतलब है पाकीज़गी, इज़ाफ़ा और बरकत। ज़कात के ज़रिये पाकीज़गी हासिल की जाती है। माल के उस हिस्से को ज़कात कहा जाता है, जो अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ ज़रूरतमंदों को दिया जाता है। क़ुरआन करीम में बार-बार ज़कात देने का ज़िक्र आता है, जिससे इसकी फ़ज़ीलत का पता चलता है। क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उनके माल में से सदक़ा क़ुबूल कर लो कि तुम इसके ज़रिये उन्हें गुनाहों से पाक कर दो और उन्हें दुआएं दो।”(क़ुरआन 9:103)
ज़कात कब दें
कुछ लोग सोचते हैं कि ज़कात रमज़ान में ही देनी चाहिए। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। माल के एक साल पूरा होने पर ज़कात वाजिब हो जाती है। इसलिए माल की तारीख़ और महीना याद होना चाहिए। क़ाबिले ग़ौर है कि पहली बार इस्लामी साल के जिस दिन किसी निसाब के मालिक बने, तो उसी दिन से इसका साल शुरू हो जाता है और एक साल मुकम्मल होते ही ज़कात वाजिब हो जाती है।
निसाब का मतलब माल और रक़म की वह सीमा है, जिस पर ज़कात देना वाजिब हो जाता है। अगर महीना और तारीख़ भूल जाएं, तो कोई तारीख़ मुक़र्रर कर लें और जल्द से जल्द ज़कात अदा कर दें। फिर इसी तारीख़ के हिसाब से हर साल ज़कात देते रहें। तारीख़ और महीना इस्लामी ही होना चाहिए, क्योंकि अंग्रेज़ी साल में इस्लामी साल के मुक़ाबले दस दिन ज़्यादा होते हैं।
ज़कात देने में देर करना सही नहीं है। ज़्यादातर लोग रमज़ान में ज़कात निकालते हैं। इसकी वजह ये है कि रमज़ान में हर नेकी का सवाब सत्तर गुना बढ़ जाता है। जिस किसी ने रमज़ान में ज़कात दी, तो उसका अगला साल रमज़ान ही माना जाएगा। वैसे एक साल पूरा होने से पहले भी ज़कात निकाली जा सकती है। अगर कोई ज़रूरतमंद सामने आ जाए, तो उसे ज़कात की पूरी या कुछ रक़म दी जा सकती है। इस रक़म को साल पूरा होने पर दी जाने वाली ज़कात में जोड़ा जा सकता है।
अगर किसी वजह से ज़कात देने में देर हो गई, तो बाद में भी ज़कात दी जा सकती है, लेकिन जानबूझ कर देर करना सही नहीं है।
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किन चीज़ों पर ज़कात दें
सोना, चाँदी, नक़दी और तिजारती माल पर ज़कात देना फ़र्ज़ है।
सोना : ये ईंट के रूप में हो, ज़ेवरात के रूप में हो, बर्तनों के रूप में हो या किसी और चीज़ के रूप में हो। वह इस्तेमाल में हो या न हो। इस पर ज़कात देना फ़र्ज़ किया गया है।
चाँदी : सोने की तरह ही चाँदी पर भी ज़कात देना फ़र्ज़ है।
नक़दी : ये किसी भी रूप में हो, वह करंसी के रूप में हो, किसी को क़र्ज़ दी हो, शेयर के रूप में हो या एफ़डी के रूप में हो। इस पर भी ज़कात देना फ़र्ज़ है।
माल : जो माल बेचने की नीयत से ख़रीदा गया है, भले ही वह बिका न हो, उस पर ज़कात फ़र्ज़ है। माल में वह सब चीज़ें शामिल हैं, जिनकी तिजारत की जाती है।
अगर ज़मीन रिहाइश या किसी और काम के लिए ख़रीदी है, तो इसे माल नहीं माना जाएगा और इस पर ज़कात वाजिब नहीं होगी। अगर ज़मीन इस नीयत से ली गई है कि इसे बेचकर मुनाफ़ा कमाया जाएगा, तो ये माल मानी जाएगी और इस पर ज़कात वाजिब हो जाएगी। इन सब चीज़ों पर 2.5फ़ीसद की दर से ज़कात दी जाएगी।
क़ाबिले ग़ौर ये भी है कि आमदनी पर ज़कात वाजिब नहीं है। ज़कात सिर्फ़ उस माल पर वाजिब है, जिसे एक साल गुज़र चुका हो। अगर लाखों की आमदनी हो और वह पैसा ख़र्च हो जाता है, तो उस पर कोई ज़कात नहीं है।रमज़ान से पहले बहुत से लोग ज़मीन-जायदाद ख़रीद लेते हैं, ताकि उन्हें ज़्यादा ज़कात न देनी पड़े। ख़ैर, ये उनका ज़ाती मसला है।
सनद रहे कि सदक़ा या ज़कात देने की बड़ी फ़ज़ीलत है। क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “जो लोग अपना माल अल्लाह की राह में ख़र्च करते हैं, उनके ख़र्च की मिसाल उस दाने की मानिन्द है जिससे सात बालियां निकलें और हर बाली में सौ दाने हों। और अल्लाह जिसके लिए चाहता है, इज़ाफ़ा कर देता है. और अल्लाह बड़ा वुसअत वाला बड़ा साहिबे इल्म है।“(क़ुरआन 2: 261)
ज़कात कैसे तय करें
ज़कात के लिए सोना और चाँदी की मिक़दार तय की गई है, यानी 7.5तोले सोने और 52.5तोले चाँदी पर ज़कात देना फ़र्ज़ है। अगर सोना और चाँदी इससे कम है, तो ज़कात वाजिब नहीं है।
नक़दी के लिए कोई निसाब तय नहीं है। इसलिए सोने और चाँदी के बाज़ार भाव से इसकी ज़कात तय कर ली जाती है।
माल जिस मुनाफ़े पर बेचा जाएगा, उसके हिसाब से ही उसकी ज़कात तय होगी। उस हिसाब से ज़कात तय नहीं होगी, जिस हिसाब से माल ख़रीदा गया है।
ज़कात देना किन पर फ़र्ज़ है : जिन लोगों के पास सोना, चाँदी, नक़दी और तिजारती माल ज़कात के निसाब के मुताबिक़ हो, तो उन पर ज़कात वाजिब हो जाती है।
ज़कात कौन ले सकता है
ज़कात पर ग़रीबों का हक़ है। ज़कात के लिए मुस्तहक़ को मालिक बनाना लाज़िमी है। मिल्कियत में दिए बिना किसी नेक काम में ख़र्च करने से ज़कात अदा नहीं होगी। इसका मतलब ये है कि ज़कात का पैसा मस्जिद या मदरसे की तामीर आदि में ख़र्च नहीं किया जा सकता।
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक ज़कात सिर्फ़ फ़क़ीरों और मिस्कीनों यानी मोहताजों और उसकी वसूली पर मुक़र्रर किए गये कारिन्दों और ऐसे लोगों के लिए है, जिनकी दिलदारी मक़सूद हो और गर्दनों यानी गु़लामों को आज़ाद कराने और क़र्ज़दारों का बोझ उतारने और अल्लाह की राह में नेक काम करने वालों और मुसाफ़िरों के लिए है. यह सब अल्लाह की तरफ़ से फ़र्ज़ किया गया है. और अल्लाह बड़ा साहिबे इल्म बड़ा हिकमत वाला है.(क़ुरआन 9:60)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो और ज़कात देते रहो और अल्लाह के अहकाम को मज़बूती से थामे रहो। और अल्लाह ही तुम्हारा मौला है और वही बेहतरीन मौला और वही बेहतरीन मददगार है।(क़ुरआन 22:78)
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)