क्यों बांग्लादेश में स्वीकार्य नहीं जमात-ए-इस्लामी ?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 15-02-2026
Why is Jamaat-e-Islami not acceptable in Bangladesh?
Why is Jamaat-e-Islami not acceptable in Bangladesh?

 

fडॉ. नौशाद आलम चिश्तीअलीग

हाल ही में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की चुनावी जीत ने एक बार फिर जमात-ए-इस्लामी को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सत्तर सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनने के बावजूद, जमात-ए-इस्लामी अपनी संख्यात्मक उपस्थिति को वास्तविक राजनीतिक सफलता में परिवर्तित नहीं कर सकी। यह विरोधाभास आकस्मिक नहीं है और न ही केवल समकालीन चुनावी समीकरणों तक सीमित है। इसकी जड़ें पार्टी के ऐतिहासिक निर्णयों, वैचारिक कठोरता और दक्षिण एशियाई मुस्लिम इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में निभाई गई उसकी विवादास्पद भूमिका में गहराई से निहित हैं। यह समझने के लिए कि बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी को वैधता हासिल करने में लगातार कठिनाई क्यों होती रही है, उसके उद्गम, राजनीतिक आचरण और हिंसा व विभाजन की उस लंबी छाया को देखना आवश्यक है, जो आज भी जनस्मृति को प्रभावित करती है।

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मौलाना मौदूदी द्वारा स्थापित जमात-ए-इस्लामी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में विभिन्न रूपों और संरचनाओं में मौजूद है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मौलाना मौदूदी ने अलग रुख अपनाया था। उन्होंने न तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन किया और न ही मुस्लिम लीग का।

उनके दृष्टिकोण में भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही दोनों पार्टियां भ्रमित थीं, और इस्लामी दृष्टि से वे उन्हें शैतानी शक्तियों के उपकरण मानते थे। हालांकि, पाकिस्तान बनने के बाद मौलाना मौदूदी अपनी पूरी राजनीतिक संरचना के साथ वहां चले गए और जमात-ए-इस्लामी की कट्टर राजनीतिक इस्लाम की अवधारणा को लागू करने का प्रयास किया। समय के साथ पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी ने इस्लाम लागू करने के नाम पर सशस्त्र संघर्ष का सहारा लेने से भी परहेज़ नहीं किया।

लेखक के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान एक हिंसक संगठन रहा है, जिसका उग्रवाद से जुड़ा लंबा इतिहास है। उसका छात्र संगठन इस्लामी जमीअत-ए-तलबा कभी पाकिस्तान के कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों को षड्यंत्र, गुंडागर्दी और रक्तपात के केंद्रों में बदल देता था।

छात्र संघ चुनावों में बूथ कब्जा, प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों का अपहरण, हत्या और अपने संस्करण के इस्लाम को लागू करने के नाम पर हिंसक धमकी उसकी प्रमुख “उपलब्धियां” बन गई थीं। पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर, बहाउद्दीन जकरिया विश्वविद्यालय मुल्तान, सिंध विश्वविद्यालय, कराची विश्वविद्यालय और कई अन्य उच्च शिक्षण संस्थान एक समय उसकी हिंसा के भयावह केंद्र बन गए थे।

जब पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) की बंगाली मुस्लिम आबादी, पश्चिमी पाकिस्तान के राजनेताओं, नौकरशाहों और सेना की अनुचित नीतियों, राजनीतिक अहंकार और पंजाबी वर्चस्व से तंग आकर स्वतंत्रता आंदोलन में उतरी, तब विभिन्न तत्वों ने इस अराजक स्थिति का अपने हित में उपयोग किया।

उन उथल-पुथल भरे हालात में बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी को पश्चिमी पाकिस्तान के अन्याय के विरुद्ध बंगाली मुसलमानों के साथ खड़ा होना चाहिए था। इसके बजाय, उसने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया और बंगाली मुसलमानों की हत्या में सहभागी बनी। बाद में, पाकिस्तान समर्थक उर्दूभाषी आबादी को भी बंगालियों द्वारा क्रूरतापूर्वक निशाना बनाया गया और मारा गया।

यदि पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों के साथ संवाद और पारस्परिक समझ का रास्ता चुना होता, और यदि अलगाव सौहार्दपूर्ण ढंग से हुआ होता, तो कोई बाहरी शक्ति स्थिति का लाभ नहीं उठा पाती और लाखों मुस्लिम पुरुषों व महिलाओं की जान नहीं जाती। बंगाली मुसलमान जमात-ए-इस्लामी की ऐतिहासिक भूमिका से भली-भांति परिचित हैं।

इसके अतिरिक्त, जमात-ए-इस्लामी जिस राजनीतिक विचारधारा और जिस प्रकार के इस्लाम को लागू करना चाहती है, उसे दक्षिण एशिया में कहीं भी व्यवहारिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। जब तक जमात-ए-इस्लामी जमीनी स्तर पर अपने ढांचे और सोच में मूलभूत परिवर्तन नहीं करती, तब तक वह सफल नहीं हो सकती।

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भारत में जमात-ए-इस्लामी के पास न तो सार्थक राजनीतिक भागीदारी की क्षमता है और न ही सफलता की कोई यथार्थ संभावना। वह अफगानिस्तान में पहले ही असफल हो चुकी है। विश्व इस बात से परिचित है कि पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी किन नीतियों पर आधारित रही है, और बांग्लादेश के बंगाली मुसलमान भी उसके अतीत की भूमिका को स्पष्ट रूप से याद रखते हैं।

(लेखक अलीगढ़ स्थित विद्वान और इस्लामी मामलों के विशेषज्ञ हैं।)