राजीव नारायण
कोल्हापुर, महाराष्ट्र: एक छोटे से चमड़ा कारखाने में आज भी हाथों से जूते काटे जाते हैं, सिले जाते हैं और चमकाए जाते हैं—बिल्कुल वैसे ही जैसे दशकों से होता आया है। इस ‘कारखाने’ में काम करने वाला एक युवा प्रशिक्षु अपने मोबाइल पर स्क्रॉल कर रहा है। वह मनोरंजन नहीं देख रहा, बल्कि व्हाट्सऐप पर दाम जांच रहा है, स्थानीय रीसेलर के ज़रिये आए ऑनलाइन ऑर्डर को ट्रैक कर रहा है और शहरी ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए फिनिशिंग बेहतर करने के छोटे-छोटे वीडियो देख रहा है।
बेंगलुरु, कर्नाटक: इसी कारखाने से कुछ सौ किलोमीटर दूर, एक सॉफ्टवेयर टेस्टर अपना डेस्क समेट रहा है। ‘एचआर’ ने उसे बताया है कि एक एआई टूल उसका काम उससे तेज़ और सस्ता कर सकता है। उसे तीन महीने की बेसिक सैलरी मिलेगी और उसकी नौकरी खत्म हो चुकी है।
ये दोनों घटनाएँ एक भारत के अनौपचारिक श्रम की दुनिया से और दूसरी उसके कॉरपोरेट केंद्र से आज के भारत में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) की सच्चाई और विरोधाभास को दिखाती हैं। एआई अब केवल सफ़ेदपोश नौकरियों, जैसे कोडर या कॉल-सेंटर कर्मचारियों, के लिए खतरा नहीं है। यह किराना दुकानों, छोटे कारखानों, खेतों, परिवहन केंद्रों और घर-आधारित कामों तक पहुंच चुका है। भारत के सामने असली सवाल यह नहीं है कि एआई नौकरियाँ खत्म करेगा या नहीं, बल्कि यह है कि किनकी नौकरियाँ बदलेंगी, किसे फायदा होगा और असमान अर्थव्यवस्था में कौन पीछे छूट जाएगा।

कांच की इमारतों से आगे
एआई और नौकरियों पर बहस ज़्यादातर भारत के आईटी और बीपीओ सेक्टर तक सीमित रही है—और यह स्वाभाविक भी है। टीसीएस और इन्फोसिस जैसी कंपनियों में हाल की छंटनियों ने मध्यम वर्ग को हिला दिया है। लेकिन इस फोकस से बड़ी तस्वीर छूट जाती है। भारत की करीब 90 प्रतिशत श्रम शक्ति अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती है। इसमें सड़क किनारे काम करने वाले विक्रेता, छोटे निर्माता, मज़दूर, कारीगर, घरेलू कामगार और गिग वर्कर शामिल हैं। फिर भी एआई से जुड़े चमकदार अनुमानों में ये लोग शायद ही दिखते हैं।
इन लोगों के लिए एआई अक्सर किसी ‘छंटनी पत्र’ की तरह नहीं, बल्कि रोज़ी-रोटी के अचानक खत्म हो जाने की तरह आता है। उदाहरण के तौर पर, मोहल्ले की किराना दुकान को ही देखिए। डिजिटल भुगतान, एल्गोरिदम पर आधारित स्टॉक ऐप्स और ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म अब इन दुकानों के कामकाज को प्रभावित कर रहे हैं। कुछ दुकानदारों के लिए एआई-आधारित मांग अनुमान बेकार कम करता है और मुनाफा बढ़ाता है। लेकिन ज़्यादातर, खासकर कम डिजिटल समझ वाले बुज़ुर्ग दुकानदारों के लिए, यही तकनीकें बड़े प्लेटफॉर्म और डिलीवरी ऐप्स के दबाव में उन्हें बाहर कर देने का खतरा बन जाती हैं।
इसी तरह मुरादाबाद के पीतल उद्योग या तिरुप्पुर के निटवेयर क्लस्टर में एआई-आधारित डिज़ाइन टूल और ऑटोमेटेड क्वालिटी चेक बड़े कारखानों द्वारा अपनाए जा रहे हैं। इससे निर्यात में प्रतिस्पर्धा तो बढ़ती है, लेकिन वे छोटे कारखाने बंद हो जाते हैं जो न तो ऐसी तकनीक खरीद सकते हैं और न ही मज़दूरों को दोबारा प्रशिक्षित कर सकते हैं। खतरा अचानक बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी का नहीं, बल्कि उन पारंपरिक आजीविकाओं के धीरे-धीरे खत्म होने का है, जिन्होंने पीढ़ियों तक समुदायों को संभाले रखा है।

सिर्फ़ कोड नहीं, हाथ भी
भारत के एआई सफ़र में अकुशल और अर्ध-कुशल मज़दूर सबसे नाज़ुक स्थिति में हैं। निर्माण मज़दूर, गोदामों में काम करने वाले, सफ़ाईकर्मी और कृषि मज़दूरों को अक्सर यह कहकर सुरक्षित माना जाता है कि उनका काम शारीरिक है। लेकिन अब यह धारणा बदल रही है। एआई-निर्देशित मशीनें, प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस सिस्टम और ऑटोमेटेड लॉजिस्टिक्स साइट्स, बंदरगाहों और गोदामों में प्रवेश कर रहे हैं। भले ही पूरी तरह ऑटोमेशन अभी दूर हो, लेकिन उत्पादकता के दबाव का मतलब हैउसी काम के लिए कम मज़दूर।
साथ ही, एआई ने जीविका के नए तरीके भी बनाए हैं। डिलीवरी, राइड-हेलिंग और घरेलू सेवाओं जैसे प्लेटफॉर्म-आधारित काम एल्गोरिदमिक प्रबंधन पर चलते हैं। किसी प्रवासी मज़दूर के लिए ऐप का मतलब पारंपरिक दलालों के बिना कमाई का मौका हो सकता है। लेकिन इसका मतलब निगरानी, अनिश्चित आमदनी और अपारदर्शी फैसले भी है—जहाँ मशीनें तय करती हैं कि किसे काम मिलेगा और किसे नहीं। इस दुनिया में एआई मज़दूरी खत्म नहीं करता, बल्कि असुरक्षा को नए सिरे से संगठित करता है।
कारीगरों और शिल्पकारों के सामने दोहरी चुनौती है। एआई-आधारित डिज़ाइन और कस्टमाइज़ेशन हाथ से बने उत्पादों को सस्ता कर रहे हैं, वहीं डिजिटल बाज़ार और एल्गोरिदम पारंपरिक शिल्प को वैश्विक ग्राहकों तक भी पहुंचा रहे हैं। कच्छ का बुनकर या खुर्जा का कुम्हार सैद्धांतिक रूप से स्थानीय सीमाओं से बाहर ग्राहकों तक पहुंच सकता है। लेकिन असल सफलता डिजिटल कौशल, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और ऐसी नीतियों पर निर्भर है जो परंपरा नहीं, पैमाने को बढ़ावा देती हैं।

असमानता: असली जोखिम
भारत के एआई दौर को विकसित देशों से अलग करने वाली बात सिर्फ़ आय स्तर नहीं, बल्कि गहरी संरचनात्मक असमानता भी है। अमेरिका या यूरोप में ऑटोमेशन से होने वाली नौकरी छूट सामाजिक सुरक्षा और री-स्किलिंग के रास्तों से कुछ हद तक संभाली जाती है। भारत में गलती की गुंजाइश बहुत कम है। एआई से विस्थापित कोई फैक्ट्री मज़दूर या रेहड़ी-पटरी वाला न तो बचत रखता है, न समय, न संस्थागत मदद कि वह आसानी से नई स्किल सीख सके।
इसीलिए यह दावा कि “एआई जितनी नौकरियाँ खत्म करेगा, उससे ज़्यादा पैदा करेगा”, भारत में खोखला लगता है। भले ही कुल नौकरियाँ बढ़ें, लेकिन बदलाव की कीमत बराबर नहीं बंटती। अंग्रेज़ी जानने वाले, डिजिटल पहुंच वाले और शहरी हाई-स्किल कामगारों के लिए ढलना आसान है। नीचे के पायदान पर खड़े लोग—अनौपचारिक काम में लगी महिलाएँ, मज़दूर और बुज़ुर्ग—नई अर्थव्यवस्था से बाहर हो जाने के सबसे बड़े खतरे में हैं।
सरकारी अनुमान और नीतिगत दस्तावेज़ अक्सर जीडीपी ग्रोथ और नौकरी सृजन में एआई के योगदान पर ज़ोर देते हैं। ये अनुमान ग़लत नहीं हैं, लेकिन एक कड़वी सच्चाई छुपा लेते हैं—समावेशन के बिना विकास सामाजिक दरारें गहरी करता है। अगर एआई का फायदा मुख्य रूप से बड़ी कंपनियों, शहरी इलाकों और पहले से कुशल लोगों को मिलता है, तो यह क्षेत्रीय और वर्गीय असमानताओं को पाटेगा नहीं, बल्कि बढ़ाएगा।

तुलना और चेतावनी
विकसित देशों से तुलना उपयोगी है, लेकिन सीमित भी। यूरोप और अमेरिका में एआई मुख्य रूप से दफ़्तरी, कानूनी और प्रशासनिक नौकरियों को प्रभावित कर रहा है। भारत में असर ज़्यादा व्यापक और उलझा हुआ है—औपचारिक और अनौपचारिक, दोनों क्षेत्रों में। खतरा किसी एक बड़े पतन का नहीं, बल्कि छोटी-छोटी, अनगिनी विस्थापन की घटनाओं का है जो धीरे-धीरे जुड़ जाती हैं।
फिर भी भारत के पास एक ऐसा फायदा है जो कई विकसित देशों के पास नहीं,जनसांख्यिकीय पैमाना और अनुकूलन की क्षमता। अनौपचारिक मज़दूर आर्थिक सुधारों, नोटबंदी और कोविड जैसी मार झेल चुके हैं। उनके लिए एआई एक और झटका है। असली सवाल यह है कि उनके इस अनुकूलन को सहारा मिलेगा या बस मान लिया जाएगा।

आगे का अलग रास्ता
अगर एआई को भारत के पक्ष में काम करना है, तो नीति सोच को बोर्डरूम और एलीट चिंताओं से बाहर आना होगा। री-स्किलिंग केवल इंजीनियरों के लिए कोडिंग बूट कैंप या एआई सर्टिफ़िकेशन तक सीमित नहीं रह सकती। इसमें दुकानदारों के लिए डिजिटल साक्षरता, गिग वर्कर्स के अधिकार, छोटे निर्माताओं के लिए तकनीकी पहुंच और कारीगरों के लिए डिज़ाइन सपोर्ट शामिल होना चाहिए।
हमें उन मानवीय कामों की कद्र भी करनी होगी जिन्हें एआई आसानी से नहीं दोहरा सकता जैसे देखभाल, सामुदायिक सेवाएँ, स्थानीय ज्ञान और सांस्कृतिक उत्पादन। ये श्रम-प्रधान और सामाजिक रूप से ज़रूरी क्षेत्र हैं, लेकिन कम आंके जाते हैं। इन क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश विस्थापित कामगारों को समेट सकता है और जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर कर सकता है। साथ ही, मज़दूरों को जोखिम लेने और नई स्किल सीखने के लिए मज़बूत सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य कवरेज और आय सहायता ज़रूरी है, ताकि वे बदहाली में न फिसलें।
एआई कोई निर्दयी सेना नहीं, बल्कि विकल्पों से गढ़ा जाने वाला औज़ार है। भारत में ये विकल्प तय करेंगे कि एआई दौलत और अवसर को सिमटाएगा या फैलाएगा। बेंगलुरु के सॉफ्टवेयर इंजीनियर से लेकर कोल्हापुर के जूता बनाने वाले तक—काम का भविष्य फिर से तय हो रहा है। अगर नीति, उद्योग और समाज कॉरपोरेट डर और मुनाफ़े से आगे सोच सकें, तो एआई साझा समृद्धि का साधन बन सकता है। वरना यह असमानता को—और तेज़, और सस्ता, और अभूतपूर्व पैमाने पर—स्वचालित कर देगा।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और संचार विशेषज्ञ हैं।)