मलिक असगर हाशमी, नई दिल्ली
हैदराबाद के मोहम्मद सुजातुल्लाह इस सच को केवल कहते नहीं हैं, बल्कि पिछले कई वर्षों से हर सुबह इसे जीते हैं। जब शहर अभी नींद से जाग ही रहा होता है, तब सुजातुल्लाह और उनके साथी सैकड़ों भूखे लोगों के लिए गरम नाश्ता लेकर खड़े होते हैं,बिना यह पूछे कि सामने खड़ा इंसान किस धर्म, जाति या पृष्ठभूमि से आता है। उनके लिए हर खाली पेट एक ही पहचान रखता है-भूखा।
सुजातुल्लाह बताते हैं कि यह सफ़र आज का नहीं है। उन्होंने तब से लोगों को खाना खिलाना शुरू कर दिया था, जब उनके चेहरे पर मूंछ तक नहीं आई थी। शुरुआत बेहद छोटी थी—सिर्फ़ पाँच किलो उपमा और थोड़ी-सी चटनी। लेकिन इरादा बड़ा था। आज वही छोटा-सा प्रयास एक आंदोलन बन चुका है, जिसमें हर दिन करीब एक हज़ार लोगों को सुबह का नाश्ता परोसा जाता है। हैदराबाद के सरकारी अस्पतालों के बाहर, बस स्टॉप पर, फुटपाथों पर और झुग्गियों में—जहाँ भी भूख छिपी होती है, वहाँ सुजातुल्लाह की पहल पहुँच जाती है।

वे साफ़ शब्दों में कहते हैं,“भूख का कोई धर्म नहीं होता,सिर्फ़ इंसानियत होती है।”
इस सोच की जड़ें उनके जीवन के एक बेहद मार्मिक अनुभव में हैं। सालों पहले उन्होंने एक छोटे बच्चे को कचरे के ढेर में खाना ढूँढते देखा था। उस दृश्य ने उनके भीतर कुछ तोड़ दिया। उसी पल उन्हें एहसास हुआ कि भूख न हिंदू देखती है, न मुसलमान, न अमीर-गरीब,वह बस खाने की माँग करती है। उसी दिन उन्होंने खुद से और ईश्वर से एक वादा किया—अगर उनके बस में हुआ, तो वे किसी भी पेट को खाली नहीं रहने देंगे।
आज यह वादा ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट फाउंडेशन’ के रूप में साकार हो चुका है। इस संस्था के ज़रिए हर सुबह गरम इडली, उपमा, पूरी-भाजी जैसे पौष्टिक नाश्ते सैकड़ों ज़रूरतमंदों तक पहुँचते हैं। न कोई नाम पूछा जाता है, न धर्म—सिर्फ़ प्यार और सम्मान के साथ खाना परोसा जाता है।
सुजातुल्लाह की कहानी केवल सेवा की नहीं, संघर्ष की भी है। वे बताते हैं कि उनका बचपन आर्थिक तंगी में बीता। उनके पिता ने 16 वर्षों तक साइकिल से नौकरी पर जाकर परिवार का पेट पाला। घर छोटा था, साधन सीमित थे, लेकिन संस्कार बड़े थे। उन्होंने सिखाया कि चाहे हमारे पास कम ही क्यों न हो, उसे दूसरों के साथ बाँटना चाहिए।
कॉलेज के दिनों में, जब वे बी.फार्मेसी के तीसरे वर्ष में थे, एक घटना ने उनके संकल्प को और मज़बूत कर दिया। सड़क पर उन्हें एक बुज़ुर्ग व्यक्ति सोया हुआ मिला। उन्होंने उसके लिए खाना खरीदा और देने लगे। बुज़ुर्ग ने मुस्कराकर कहा, “मैं खाना खा चुका हूँ, इसे किसी और को दे दो जिसे ज़्यादा ज़रूरत है।” अपनी तकलीफ़ों के बावजूद उस आदमी की सोच ने सुजातुल्लाह को भीतर तक हिला दिया। उस दिन उन्हें समझ आया कि इंसानियत उम्र या हालात की मोहताज नहीं होती।
2015 में, एक कठिन बैकलॉग परीक्षा पास करने के बाद, उन्होंने 10 भूखे लोगों को खाना खिलाने की कसम खाई। उस दिन जो संतोष और खुशी उन्हें मिली, उसने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी। फिर उन्होंने 50 फूड पैकेट से एक डिनर प्रोग्राम शुरू किया, जो धीरे-धीरे 200 तक पहुँचा।
2016 में उन्होंने अपने एक कज़िन से बात की, जो उस समय अमेरिका में रहते थे। कज़िन ने बिना किसी सवाल के 5,000 रुपये भेज दिए। यहीं से दोस्तों और परिवार की मदद से उनका काम बढ़ता चला गया। शुरुआत में कुछ लोगों ने सवाल उठाए,“एक मुसलमान होकर हिंदुओं को खाना क्यों खिला रहे हो?”
सुजातुल्लाह का जवाब हमेशा एक ही रहा,उन्हें राजनीति या नफ़रत में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनका संगठन ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट फाउंडेशन’ इसीलिए इस नाम से जाना जाता है, क्योंकि उनके लिए इंसान पहले है, बाकी पहचान बाद में।
जब उन्होंने हैदराबाद में मास्टर्स शुरू किया, तो और भी लोग उनके साथ जुड़ने लगे। नवंबर में उन्होंने पहली बार एक होटल से 100–120 प्लेट उपमा का ऑर्डर दिया। एक बाल्टी में खाना भरकर वे पास के सरकारी अस्पताल पहुँचे। वे घबराए हुए थे यह पहला मौका था। लेकिन जैसे ही वे पहुँचे, करीब 300 लोग नाश्ते के लिए लाइन में लग गए। उस दिन जो खुशी उन्हें मिली, वह उनके लिए शब्दों से परे थी।
तब से यह सिलसिला थमा नहीं। पिछले पाँच वर्षों से वे बिना किसी छुट्टी के लगातार हर दिन नाश्ता बाँट रहे हैं—करीब 1,825 दिनों तक। शुक्रवार को उन्होंने दो सरकारी अस्पतालों,किंग कोटी मैटरनिटी हॉस्पिटल और निलोफर हॉस्पिटल—के बाहर एक हज़ार लोगों को मुफ्त नाश्ता बाँटने का यह सफ़र पूरा किया।

गर्मियों में उन्होंने मुफ़्त पानी कैंप शुरू किए, ताकि कोई प्यास से न तड़पे। 2022 में उन्होंने ‘ह्यूमैनिटी हॉस्पिटल’ की शुरुआत की हैदराबाद के नाल नगर में एक मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल, जहाँ कम कीमत पर इलाज उपलब्ध है। 2023 में इसी अस्पताल में एक फ्री डायलिसिस यूनिट शुरू की गई, ताकि किडनी की बीमारी से जूझ रहे ग़रीब मरीज़ों को भी ज़रूरी इलाज मिल सके।
इस सबके साथ-साथ सुजातुल्लाह ने अपनी पढ़ाई भी पूरी की और डॉक्टर ऑफ फार्मेसी की डिग्री हासिल कर ‘डॉ. मोहम्मद सुजातुल्लाह’ बने। लेकिन उनके लिए डिग्री से बड़ी पहचान समाजसेवा है।क्राउड-फंडिंग के ज़रिए वे 100 प्रतिशत दान प्रणाली पर काम करते हैं,अपने लिए एक रुपया भी नहीं रखते। वे कहते हैं, “हर इंसान के अंदर कुछ खास होता है। उसे पहचानिए, और दूसरों के लिए इस्तेमाल कीजिए। मौत के बाद की ज़िंदगी से पहले, एक अच्छा इंसान बनना ज़रूरी है।”
एक बार रेलवे स्टेशन पर उनके पास सिर्फ़ चार फूड पैकेट थे, जबकि सामने 15–20 भूखे लोग उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे थे। वह पल उनके लिए बेहद कठिन था, लेकिन उसी ने उन्हें सिखाया कि ज़रूरत हमेशा साधनों से बड़ी होती है।
सुजातुल्लाह कहते हैं, “मेरी 24 साल की ज़िंदगी में, भूखे को खाना खिलाने से ज़्यादा खुशी मुझे कभी किसी चीज़ से नहीं मिली।”आज जब समाज में नफ़रत और विभाजन की आवाज़ें तेज़ हैं, तब मोहम्मद सुजातुल्लाह जैसे लोग याद दिलाते हैं कि इंसानियत अब भी ज़िंदा है,बस उसे रोज़ सुबह एक प्लेट नाश्ते के साथ परोसा जा रहा है।