देस-परदेस : सऊदी एटमी-डील से पश्चिम एशिया में होड़ बढ़ेगी

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 28-07-2026
Global Affairs: Saudi nuclear deal to fuel arms race in West Asia
Global Affairs: Saudi nuclear deal to fuel arms race in West Asia

 

प्रमोद जोशी

पश्चिम एशिया का अनिश्चय खत्म होकर नहीं दे रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच समझौता-ज्ञापन पर दस्तखत होने के बावज़ूद लड़ाई खत्म नहीं हुई है. दूसरी तरफ राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने पिटारे से नई-नई चीजें निकाल रहे हैं.

पिछले बुधवार को उन्होंने सऊदी अरब के साथ नाभिकीय-सहयोग के समझौते की घोषणा करके खलबली पैदा कर दी है. इस समझौते के तहत अमेरिकी सहयोग से सऊदी अरब अपने असैनिक परमाणु-कार्यक्रम का संचालन कर सकेगा.

यह 30वर्षीय समझौता नाभिकीय-सहयोग पर तो रोशनी डालता है, लेकिन साथ ही कई महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलावों की ओर इशारा भी कर रहा है.वेस्टिंगहाउस जैसी कंपनियों का उपयोग करते हुए रियाद को एक दीर्घकालिक अमेरिकी तकनीकी और सुरक्षा ढाँचे में बाँधकर, वाशिंगटन का लक्ष्य खाड़ी में चीन और रूस के बढ़ते राजनयिक और आर्थिक प्रभाव को कम करना है.

अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान ने इस ‘एग्रीमेंट 123’ पर हस्ताक्षर किए है, जिसे अब अमेरिकी संसद के पास भेजा जाएगा.

समझौते का आधिकारिक पाठ अभी तक जारी नहीं हुआ है, लेकिन उसके लीक हुए अंशों से पता लगता है कि अमेरिका ने सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम को तीस वर्षों तक विकसित करने में सहायता करने पर सहमति व्यक्त की है.इसमें एक यूरेनियम संवर्धन सुविधा शामिल है जिसका संचालन वेस्टिंगहाउस जैसी अमेरिकी कंपनियाँ करेंगी.

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अब्राहम समझौता

इस समझौते पर दस्तखत होने के ठीक एक दिन बाद, राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के सामने अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने की शर्त रख दी है, जो इसराइल के साथ अरब देशों के रिश्तों को सामान्य बनाने के इरादे से किया गया है.

चूँकि समझौते का पाठ उपलब्ध नहीं है, इसलिए पता नहीं चल पा रहा है कि अब्राहम समझौते वाली बात इस समझौते का हिस्सा है या बाद में कही गई है. लगता नहीं कि सऊदी अरब इसे   स्वीकार करेगा.

उसने यह स्पष्ट कर रखा है कि इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए एक समयबद्ध राजनयिक प्रक्रिया की आवश्यकता होगी, जो फ़लस्तीनी राज्य की स्थापना की ओर ले जाए.यह ऐसी शर्त है जिसे वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में इसराइल भी पूरा नहीं कर सकता. सर्वेक्षणों से पता चलता है कि लगभग दो-तिहाई इसराइली जनता और करीब पूरी राजनीति ‘टू-स्टेट’ समाधान के विरोध में हैं.

नाभिकीय-महत्वाकांक्षा

यह भी साफ है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वजह से सऊदी अरब के शासकों के मन में भी अपनी परमाणु क्षमता हासिल करने की इच्छा पैदा हुई है. लंबे समय से वे परमाणु कार्यक्रम विकसित करने में रुचि व्यक्त करते रहे हैं.

2018में, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका के सीबीएस टीवी के ‘60मिनिट्स’ कार्यक्रम में कहा था कि ‘सऊदी अरब कोई परमाणु बम हासिल नहीं करना चाहता, लेकिन अगर ईरान परमाणु बम विकसित करेगा, तो हम भी जल्द से जल्द ऐसा ही करेंगे.’

ईरान ने कहा है कि उनका परमाणु हथियार विकसित करने का कोई इरादा नहीं है. लेकिन कोई ज़रूरी नहीं है कि वे लंबे समय तक इस रुख पर कायम रहें, क्योंकि परमाणु अस्त्र सुरक्षा की गारंटी माने जा रहे हैं.

उदाहरण के लिए, उत्तर कोरिया को निरस्त्र करने के लिए कोई 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' नहीं चलाया गया है. ईरानी नेतृत्व निश्चित रूप से अपनी और किम जोंग उन की स्थिति में अंतर को समझता है.

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इसराइली विरोध

इस समझौते की घोषणा का इसराइल में कड़ा विरोध हुआ. वहाँ के अधिकारियों का कहना है कि इस समझौते से अन्य देश भी परमाणु संवर्धन कार्यक्रम शुरू करने और परमाणु हथियार बनाने की राह पर चल पड़ेंगे.

इसराइल लंबे समय से चेतावनी देता रहा है कि इस तरह का समझौता सऊदी अरब के लिए एटम बम बनाने का रास्ता खोल सकता है.इसराइलियों की दो मुख्य चिंताएँ हैं. हालाँकि वे सऊदी अरब के साथ सामान्य संबंध चाहते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का पूरा भरोसा नहीं है कि सऊदी अरब भविष्य में शत्रुतापूर्ण रुख नहीं अपनाएगा.

ईरान के शाह के साथ इसराइलियों के अच्छे संबंध थे, लेकिन 1978-1979की ईरानी क्रांति ने उन संबंधों को पूरी तरह से बदल दिया.हालाँकि इसराइली, सऊदी अरब और ईरान के बीच के मतभेदों को समझते हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण से, अगर शाह के साथ ऐसा हुआ, तो क्राउन प्रिंस बिन सलमान के साथ भी हो सकता है.

दूसरा, इसराइल अघोषित परमाणु शक्ति-संपन्न देश है. यह दर्जा उसे काफी ताकत देता करता है. अगर सऊदी अरब, ईरान या कोई अन्य देश परमाणु क्षमता विकसित कर लेगा, तो इससे पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बदल जाएगा.

दो दशक की पृष्ठभूमि

इस समझौते पर एक दशक से अधिक समय से काम चल रहा था, लेकिन अब तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे अंतिम रूप देने की कोशिश नहीं की.अमेरिका और सऊदी अरब के बीच परमाणु सहयोग पर बातचीत की शुरुआत 2008में हुई थी. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में दोनों देशों ने एक गैर-बाध्यकारी समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे.

इसके तहत अमेरिका ने सऊदी अरब को असैनिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम विकसित करने में सहयोग देने का वादा किया था. उस समय सऊदी अरब ने कहा था कि वह परमाणु ईंधन का आयात करेगा और संवेदनशील परमाणु तकनीक हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा.

2017से 2019के बीच अमेरिका ने अपनी सात कंपनियों को सऊदी अरब के साथ असैनिक परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में बातचीत करने की अनुमति दी. पर दोनों देशों के मतभेदों के कारण बातचीत में कोई खास प्रगति नहीं हुई.

2022में दोनों देशों ने परमाणु सुरक्षा और तकनीकी जानकारी के आदान-प्रदान पर एक नया समझौता ज्ञापन किया. 2023में अमेरिकी मीडिया ने ख़बर दी कि सऊदी अरब में अमेरिकी निगरानी में यूरेनियम संवर्धन परियोजना शुरू करने पर अमेरिका विचार कर रहा है.

नवंबर 2025में दोनों देशों ने एक संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जिसे ट्रंप प्रशासन ने अरबों डॉलर की परमाणु ऊर्जा साझेदारी के लिए कानूनी आधार बताया. इस दौरान दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव भी आया है.

अपने दूसरे कार्यकाल में डॉनल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ संबंधों को मज़बूत करने पर खासतौर से ज़ोर दिया है. मई 2025में उनके पहले विदेशी दौरों में  सऊदी अरब भी शामिल था.

समझौते के जोखिम

सऊदी अरब के साथ हुए समझौते से ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने के अपने इरादे में और मजबूती मिलेगी. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अब वह चीन और रूस की ओर रुख कर सकता है.

यह ऐसा समझौता नहीं है जो सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की खुली छूट दे, लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या इस समझौते में दिए गए सुरक्षा उपाय सऊदी अरब को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए पर्याप्त होंगे.

अमेरिकी सरकार ने समझौते के लिए जो प्रमुख कारण बताए हैं, उनमें से एक यह है कि इससे अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनियों, विशेष रूप से वेस्टिंगहाउस को सऊदी अरब को महत्वपूर्ण मात्रा में परमाणु ऊर्जा की बिक्री करने का अवसर मिलेगा.

सऊदी अरब परमाणु ऊर्जा के सहारे बिजली उत्पादन के लिए तेल का इस्तेमाल कम कर देगा, लेकिन समझौते के जोखिम हैं. सऊदी अरब में इस समय कोई भी परमाणु ऊर्जा संयंत्र नहीं है. सितंबर 2023में देश के ऊर्जा मंत्री ने कहा था कि सऊदी अरब अपना पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने का इरादा रखता है.

इस समझौते के कुछ पहलू चिंता के विषय हैं. पहला, यह संभावना कि सऊदी अरब बिना किसी रोक-टोक के घरेलू स्तर पर यूरेनियम संवर्धन कर सकता है, और दूसरे, निरीक्षण व्यवस्था पर कुछ सीमाएं हो सकती हैं, जो इस समझौते के मामले में अमेरिका द्वारा हस्ताक्षरित कुछ अन्य समझौतों से भिन्न होंगी.

क्या सुरक्षा उपाय यह सुनिश्चित करेंगे कि यह सऊदी समझौता सख्ती से केवल नागरिक उपयोग तक ही सीमित रहे? वास्तव में इस समझौते में संवर्धन संबंधी प्रावधान शामिल हैं.

इस वज़ह से यह उस समझौते से अलग है, जो अमेरिका ने 2009में संयुक्त अरब अमीरात के साथ किया था. उसके तहत यूएई अपना ईंधन स्वयं उत्पादित नहीं करता है और कई अन्य प्रतिबंधों के अधीन है.

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123 समझौता

इस समझौते का प्रमुख तत्व 123 समझौता है, जो अमेरिका को अन्य देशों के साथ परमाणु प्रौद्योगिकी साझा करने की अनुमति देता है. भारत भी ऐसा ही एक हस्ताक्षरकर्ता देश है.यह समझौता, जिसका नाम 1954 के अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123के नाम पर रखा गया है, कानूनन बाध्यकारी समझौता है जिसे अमेरिका किसी अन्य देश के साथ महत्वपूर्ण परमाणु सहयोग करने से पहले अनिवार्य मानता है.

अमेरिकी कांग्रेस ने 1अक्तूबर, 2008को से इस विधेयक को पारित कर दिया, जिससे परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर ऐतिहासिक समझौते का मार्ग प्रशस्त हुआ.

अमेरिका में विरोध

अमेरिका में भी इस समझौते को लेकर राजनीतिक नेताओं के बीच अलग-अलग राय सामने आई है. कैलिफ़ोर्निया से डेमोक्रेटिक सांसद ब्रैड शेरमैन ने कहा कि अमेरिका को ऐसा समझौता तभी मंज़ूर करना चाहिए, जब उसमें यूएई के साथ हुए 2009के समझौते जैसी कड़ी सुरक्षा और अप्रसार संबंधी शर्तें शामिल हों.

2009के वह समझौता यूएई को अपने देश में यूरेनियम संवर्धन (यूरेनियम एनरिचमेंट) की अनुमति नहीं देता है. शेरमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ‘पश्चिम एशिया में परमाणु अप्रसार के लिए युद्ध छेड़ने वाला कोई राष्ट्रपति सिर्फ़ इसलिए परमाणु प्रसार को बढ़ावा नहीं दे सकता कि उससे अमेरिकी कंपनियों को मुनाफ़ा होगा.’

अब कुछ सवाल खड़े होते हैं. क्या सऊदी अरब के परमाणु हथियार बनाने की आशंका जायज़ है? क्या सऊदी अरब परमाणु बम बनाने की कोशिश करेगा? मौज़ूदा हालात में ऐसा नहीं लगता, पर दीर्घकाल में क्या होगा, कहना मुश्किल है.

ईरान ने अपने स्तर पर यूरेनियम एनरिचमेंट किया, और उसके परिणाम सामने हैं. यह संवर्धित यूरेनियम अब भी उन सुरंगों में मौजूद हो सकता है, जिन पर पिछले साल अमेरिका के ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के दौरान बमबारी की गई थी.

ईरान के नाभिकीय-कार्यक्रम और यूरेनियम भंडार को लेकर अभी निश्चय बना हुआ है. अभी तो वह समझौता ही लागू नहीं हो पा रहा है, जो युद्ध रोकने के लिए किया गया है.

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