भारत का असली इंफ्रास्ट्रक्चर संकट: युवाओं के लिए नौकरियां कहां हैं?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 22-08-2026
India's real infrastructure crisis: Where are the jobs for the youth?
India's real infrastructure crisis: Where are the jobs for the youth?

 

राजीव नारायण 
 
भारत बहुत तेज़ी से हाईवे, सेमीकंडक्टर प्लांट, डेटा सेंटर और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म बना रहा है। लेकिन जिस इंफ्रास्ट्रक्चर की भारत की युवा आबादी को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, वह मिलना बहुत मुश्किल है: ऐसी स्थिर और अच्छी सैलरी वाली नौकरियां जो सम्मान और सुरक्षित भविष्य दें। आज भारत में चारों ओर देखें तो ज़बरदस्त आर्थिक महत्वाकांक्षा के सबूत साफ़ दिखते हैं।

हाईवे का विस्तार हो रहा है, एयरपोर्ट को आधुनिक बनाया जा रहा है, मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लग रहे हैं, डिजिटल नेटवर्क व्यापार और पेमेंट के तरीकों को बदल रहे हैं, डेटा सेंटर बढ़ रहे हैं और सेमीकंडक्टर प्लांट की एक नई पीढ़ी भारत को ग्लोबल टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन में और आगे ले जाने का वादा करती है।
 
लेकिन एक तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर गायब है, ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर जिसकी शानदार तस्वीरें नहीं आतीं या जिसका उद्घाटन समारोह नहीं होता। नौकरी। सिर्फ़ कोई भी नौकरी नहीं, बल्कि ऐसी नौकरी जो ठीक-ठाक सैलरी दे, सुरक्षा दे, स्किल बढ़ाए और परिवार को बेहतर कल की उम्मीद दे। यह हमारे आर्थिक बदलाव की एक कठिन परीक्षा हो सकती है क्योंकि भारत में ज़बरदस्त आर्थिक गतिविधियां हो रही हैं, लेकिन चिंता इस बात की है कि क्या इससे हर साल नौकरी के बाज़ार में आने वाले लाखों युवा भारतीयों के लिए पर्याप्त स्थिर नौकरियां पैदा हो रही हैं।
 
गंभीर आंकड़े

बेरोज़गारी के आंकड़े चिंताजनक हैं। 15 से 29 साल के युवाओं में बेरोज़गारी की दर कुल बेरोज़गारी दर से ज़्यादा है, और महिलाओं के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है। लेकिन बेरोज़गारी पूरी कहानी का सिर्फ़ एक हिस्सा है। कोई युवा जो दिन में कुछ घंटे काम करता है, जिसकी कमाई अनिश्चित है या जो अपनी योग्यता से कम स्तर की नौकरी करता है, वह शायद बेरोज़गारी के आंकड़ों में शामिल ही न हो।
 
यह मायने रखता है। क्योंकि इन बड़े आंकड़ों के पीछे बहुत से लोगों की अपनी-अपनी कहानियां हैं – जैसे भर्ती परीक्षाओं का इंतज़ार करते ग्रेजुएट, अपनी योग्यता से कम स्तर की नौकरी करते युवा, एक अस्थायी काम से दूसरे काम पर जाते वर्कर और ऐसे परिवार जो यह जाने बिना शिक्षा पर पैसा खर्च कर रहे हैं कि उसका क्या फ़ायदा होगा या कब होगा।
 
उस ग्रेजुएट का क्या जो सालों तक किसी परीक्षा की तैयारी करता है क्योंकि प्राइवेट नौकरियों में सैलरी कम होती है और सुरक्षा भी नहीं होती? या उस डिप्लोमा-होल्डर का क्या जो डिलीवरी का काम करता है क्योंकि उससे तुरंत पैसे मिल जाते हैं, भले ही उसका उसकी सीखी हुई स्किल से कोई लेना-देना न हो? या उस युवा महिला का क्या जिसके पास डिग्री तो है लेकिन वह वर्कफ़ोर्स से बाहर रहती है क्योंकि उपलब्ध नौकरियों में सैलरी कम है, वे दूर हैं या उनमें सुरक्षा नहीं है?
 
डिग्री, फिर क्या?

भारत ने शिक्षा तक पहुंच बेहतर बनाने में कई दशक बिताए हैं और युवाओं की उम्मीदें बढ़ी हैं। डिग्री को अब सिर्फ़ एक योग्यता के तौर पर नहीं देखा जाता; यह परिवार का निवेश और बेहतर भविष्य की उम्मीद है।
लेकिन जब शिक्षा और अवसर का मेल नहीं हो पाता, तो यह वादा कमज़ोर पड़ जाता है। परीक्षा, भर्ती प्रक्रिया और अवसरों की कमी को लेकर जो निराशा है, वह सिर्फ़ सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं है। यह एक बड़ी चिंता को भी दिखाता है: डिग्री मिलने के बाद क्या होगा?
 
डिग्री के लिए लोन लेने वाला युवा हमेशा सरकारी नौकरी नहीं चाहता। वह वयस्क जीवन की ओर बढ़ना चाहता है, ऐसी नौकरी चाहता है जिसमें मेहनत का फल मिले, स्किल बढ़े और बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद हो।
 
यहीं पर डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) पर चर्चा मुश्किल हो जाती है। युवा वर्कफोर्स एक आर्थिक फ़ायदा है, लेकिन युवा होना (अपने आप में) कोई डिविडेंड नहीं है। यह तभी डिविडेंड बनता है जब लोगों के पास इकॉनमी में प्रोडक्टिव तरीके से हिस्सा लेने के लिए स्किल और मौके हों। इससे एक मुश्किल सवाल उठता है। क्या हमारी इकॉनमी उन लोगों को खपा सकती है जिन्हें हम शिक्षित कर रहे हैं?
 
India's youth unemployment problem is real. But it's bigger than India -  Economy News | The Financial Express
 
नौकरियां कहां बढ़ती हैं

सिर्फ़ यह मांग करना कि इकॉनमी और नौकरियां पैदा करे, इस सवाल का जवाब नहीं देता कि वे नौकरियां कहां से और कैसे आएंगी। हमें यह पूछने की ज़रूरत है कि किस तरह की ग्रोथ बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा करती है।
 
भारत सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, रिन्यूएबल एनर्जी, इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल सर्विस में फंडिंग आकर्षित कर रहा है, जिससे प्रोडक्टिविटी बदल रही है और ग्लोबल सप्लाई चेन में हमारी जगह मज़बूत हो रही है। लेकिन इन्वेस्टमेंट हमेशा नौकरियों में नहीं बदलता क्योंकि आधुनिक इंडस्ट्रीज़ सिर्फ़ कैपिटल-इंटेंसिव (ज़्यादा पूंजी वाली) नहीं होतीं; वे बहुत ज़्यादा ऑटोमेटेड भी होती हैं।
 
यह नई चीज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं है, बल्कि फ़ैक्ट्री गेट से आगे देखने की अपील है। एक सेमीकंडक्टर प्लांट हज़ारों लोगों को रोज़गार दे सकता है, लेकिन रोज़गार का बड़ा मौका उसके आस-पास के इकोसिस्टम में होता है – जैसे कंपोनेंट सप्लायर, लॉजिस्टिक्स, मेंटेनेंस, कंस्ट्रक्शन, ट्रांसपोर्ट, फ़ूड सर्विस, हाउसिंग और कई छोटे बिज़नेस। यही बात इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, टूरिज़्म हब, वेयरहाउस, फ़ूड-प्रोसेसिंग क्लस्टर और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी लागू होती है।
 
यहीं पर छोटे और मध्यम उद्यम (SME) अहम हो जाते हैं। उनमें सेमीकंडक्टर प्लांट जैसा ग्लैमर नहीं होता, लेकिन वे उस जगह के ज़्यादा करीब होते हैं जहां बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा की जा सकती हैं। अगर वे बढ़ते हैं, उन्हें फ़ाइनेंस मिलता है, वे टेक्नोलॉजी अपनाते हैं, फ़ॉर्मल होते हैं और बड़ी सप्लाई चेन से जुड़ते हैं, तो वे आर्थिक गतिविधि को रोज़गार की कहानी में बदल सकते हैं। चुनौती टेक्नोलॉजी और नौकरियों के बीच चुनाव करने की नहीं है; चुनौती यह है कि इन्वेस्टमेंट को रोज़गार बढ़ाने वाला (एम्प्लॉयमेंट मल्टीप्लायर) बनाया जाए। भारतीय नौकरियों की कहानी में यही कड़ी गायब है।
 
डिविडेंड टेस्ट

अब 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की बात करते हैं। एक विकसित भारत को सिर्फ़ उसकी इकॉनमी के आकार, इंफ्रास्ट्रक्चर की क्वालिटी या यहां निवेश करने वाली ग्लोबल कंपनियों की संख्या से नहीं मापा जा सकता।
 
इसे इस बात से भी आंका जाना चाहिए कि क्या एक आम भारतीय इकॉनमी को देखकर उसमें अपने लिए कोई जगह देख सकता है। इसके लिए सिर्फ़ वैकेंसी से कहीं ज़्यादा की ज़रूरत है। इसके लिए शिक्षा से स्किल, स्किल से पहली नौकरी, पहली नौकरी से बेहतर नौकरी और बढ़ती प्रोडक्टिविटी से बढ़ती इनकम तक का रास्ता चाहिए।
 
इसीलिए नौकरियों पर चर्चा को सिर्फ़ मार्केट पर नहीं छोड़ा जा सकता। बेहतर स्किलिंग, आसान बिज़नेस माहौल, मज़बूत इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम, महिलाओं की ज़्यादा भागीदारी और ज़्यादा मोबिलिटी की भी इसमें भूमिका है। साथ ही, शहरों और उभरते इंडस्ट्रियल सेंटर्स की यह क्षमता भी ज़रूरी है कि वे लोगों को घर, ट्रांसपोर्ट और पब्लिक सर्विस दे सकें, ताकि वे नौकरी कर सकें।
 
भारत ने दिखाया है कि वह बड़े पैमाने पर निर्माण कर सकता है। अब चुनौती यह पक्का करने की है कि जिन लोगों के लिए यह बदलाव लाया जा रहा है, वे इसमें शामिल हो सकें। डेमोग्राफिक डिविडेंड हमेशा नहीं रहेगा। युवा बड़े होंगे, उम्मीदें बढ़ेंगी और मौके कम होते जाएँगे। कोई देश सिर्फ़ अपने युवाओं की गिनती करके डेमोग्राफिक डिविडेंड का फ़ायदा नहीं उठा सकता; ऐसा तभी हो सकता है जब उन्हें काम करने लायक कुछ दिया जाए। यही वह काम है जिसे भारत नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।