देस-परदेस : चुनाव बताएँगे ट्रंप और नेतन्याहू की दशा-दिशा

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 18-08-2026
Global Scene: Elections Will Determine the Fate and Future Course of Trump and Netanyahu
Global Scene: Elections Will Determine the Fate and Future Course of Trump and Netanyahu

 

प्रमोद जोशी

अमेरिका और इसराइल ने 28 फरवरी को ईरान में सत्ता बदलने के मकसद से जो युद्ध शुरू किया था, वह बड़ी नाकामी साबित हुआ है. इससे दुनिया में पैदा हुआ संकट अपनी जगह है, पर अब देखना होगा कि अमेरिका और इसराइल की राजनीति पर उसका क्या प्रभाव पड़ा है. 

इसका पहला अनुमान इस साल अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों और इसराइल के आम चुनावों से लगेगा. हालाँकि डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में दो साल बाकी हैं, पर मध्यावधि चुनावों से उनकी लोकप्रियता का पता ज़रूर लगेगा.

अमेरिका में हरेक चार साल पर राष्ट्रपति, पूरे प्रतिनिधि सदन और उच्च सदन सीनेट के एक तिहाई सदस्यों और राज्यों के गवर्नरों के चुनाव होते हैं. उसके दो साल बाद मध्यावधि चुनाव होते हैं, जिसमें प्रतिनिधि सदन का चुनाव होता है.

प्रतिनिधि सदन का कार्यकाल दो साल का होता है, इसलिए हरेक दो साल में पूरे सदन का नया गठन होता है, साथ ही सीनेट के खाली हो रहे एक तिहाई स्थानों और राज्यों के गवर्नरों के चुनाव होते हैं.

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राजनीतिक महत्त्व

इन चुनावों का वहाँ की राजनीति में खास महत्त्व इसलिए होता है, क्योंकि जो भी व्यक्ति उस समय राष्ट्रपति पद पर होता है, उसकी नीतियों को लेकर जनता की राय सामने आ जाती है.इस दौरान नया प्रतिनिधि सदन गठित होता है और सीनेट में, जो संसद का अपेक्षाकृत ज्यादा महत्त्वपूर्ण सदन है, राष्ट्रपति की पार्टी के पक्ष में या विरोध में स्थितियाँ पैदा होती हैं.

गोकि राष्ट्रपति के पास सरकार चलाने के लिए काफी अधिकार होते हैं, पर वहाँ की संसद भी राष्ट्रपति के अधिकारों के साथ संतुलन बनाती है.

जनता की राय

अब 3नवंबर को वहाँ फिर से मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं, जो राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों पर जनता की सबसे महत्त्वपूर्ण टिप्पणी होगी. इन चुनावों में, प्रतिनिधि सभा की सभी 435सीटों और सीनेट की 100में से 35सीटों पर चुनाव होंगे, जिससे 120वीं अमेरिकी कांग्रेस का चयन होगा.

इसके अलावा, 39राज्यों और क्षेत्रों के गवर्नरों के चुनाव, अटॉर्नी जनरल के चुनाव और कई अन्य राज्य एवं स्थानीय चुनाव भी होंगे. पश्चिम एशिया की लड़ाई और ट्रंप की टैरिफ-योजना के छींटे इस चुनाव पर ज़रूर पड़ेंगे.

अमेरिका में भी मतदाता की पहचान को लेकर बहस चल रही है. राष्ट्रपति ट्रंप ‘सेव अमेरिका एक्ट’ लाना चाहते हैं, जिसके तहत मतदान के लिए पंजीकरण कराते समय और वोट डालते वक्त वोटर को नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण और वैध फोटो पहचान पत्र दिखाना अनिवार्य होगा. इसे लेकर अच्छी-खासी बहस देश में है.

ट्रंप की रेटिंग

ट्रंप की जॉब अप्रूवल रेटिंग लगभग 33-40प्रतिशत के आसपास है, जबकि अस्वीकृति 58-62प्रतिशत तक है. यह उनके दोनों कार्यकालों में सबसे निचले स्तरों में से एक है. अतीत में देखा गया है, जब राष्ट्रपति की रेटिंग 45प्रश से नीचे होती है, तो उनकी पार्टी को हाउस में भारी नुकसान होता है.

मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंता महंगाई, रहने की लागत, गैस की कीमतें और अर्थव्यवस्था है. ट्रंप ने 2024में इन्हें ठीक करने का वादा किया था, लेकिन कई सर्वे में लोग इन मुद्दों पर उनकी हैंडलिंग से असंतुष्ट हैं.

ईरान की लड़ाई को देश में नापसंद किया गया है. इससे ऊर्जा कीमतें बढ़ी हैं और ट्रंप की रेटिंग गिरी है. यह बात रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त बोझ बन रहा है.

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संसद की स्थिति

मध्यावधि चुनावों में यों भी सत्ताधारी पार्टी आमतौर पर सीटें खोती है. प्रतिनिधि सदन में डेमोक्रेट्स को बहुमत के लिए बहुत कम सीटें पलटनी हैं. सीनेट में डेमोक्रेट्स को नेट +4सीटों की जरूरत है, जो मुश्किल है, लेकिन ओहायो, मेन, नॉर्थ कैरलिना, आयोवा, टेक्सस जैसे राज्यों में प्रतिस्पर्धी तगड़ी है.

2024में ट्रंप को मिले कुछ नए वोटर समूहों (लैटिनो, युवा, इंडिपेंडेंट्स) का समर्थन कमजोर पड़ गया है. रिपब्लिकन उम्मीदवारों को ट्रंप के बेस से समर्थन तो मिल रहा है, लेकिन व्यापक मतदाताओं तक पहुँचने में दिक्कत है.

ट्रंप की प्राइमरी में दखलंदाजी और कुछ विवादास्पद उम्मीदवारों का समर्थन (जैसे टेक्सस में) मॉडरेट और इंडिपेंडेंट वोटरों को दूर कर सकता है. साथ ही, चुनाव नियमों में बदलाव, मिड-डिकेड रेडिस्ट्रिक्टिंग और अन्य प्रयासों को लेकर कानूनी चुनौतियाँ और विवाद हैं.

सबसे बड़ी बात यह है कि अगर डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सदन को जीत लेंगे, तो वे ट्रंप के एजेंडे को रोकने में समर्थ हो जाएँगे. सीनेट को बचाना, फिलहाल रिपब्लिकनों के लिए अपेक्षाकृत आसान है, पर कुल मिलाकर माहौल उनके खिलाफ है.

इसराइल के चुनाव

इसराइल में 120सीटों वाली संसद, नेसेट के लिए चुनाव हर चार साल में होने चाहिए. व्यवहार में, बहुत कम नेसेट अपना पूरा कार्यकाल पूरा कर पाती हैं, पर इसबार का चुनाव नेसेट के कार्यकाल पूरा होने के बाद हो रहा है.

इस साल 27अक्तूबर को चुनाव होंगे, जिनमें तय होगा कि बिन्यामिन नेतन्याहू, प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे या नहीं. यह तारीख 7अक्तूबर के फौरन बाद पड़ रही है, जिस दिन तीन साल पहले हमास ने गज़ा में सीमा पार करके हमला किया और इसराइली नागरिकों की हत्या करके काफी लोगों को बंधक बना लिया.

उस हमले ने देश को झकझोर दिया और पश्चिम एशिया में उथल-पुथल मचा दी.  कई विश्लेषक इस चुनाव को नेतन्याहू द्वारा 7अक्तूबर की घटना से निपटने के तरीके और हमास, हिज़्बुल्ला और ईरानी शासन के खिलाफ इसराइल के युद्धों पर जनमत संग्रह के रूप में देखते हैं.

अल्पकालिक सरकारें

इसराइल अल्पकालिक सरकारों और चुनावों के एक ऐसे चक्र में फँसा हुआ था, जो 2019में शुरू हुआ और 2022में समाप्त हुआ, जब नेतन्याहू ने संसद में ठोस बहुमत हासिल किया और इसराइल की अब तक की सबसे दक्षिणपंथी सरकार के प्रमुख के रूप में सत्ता में वापसी की.

नेसेट की सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर उन राष्ट्रीय पार्टी सूचियों को आवंटित की जाती हैं जो राष्ट्रीय वोटों के 3.25प्रतिशत की सीमा को पार करती हैं, जो चार सीटों के बराबर है.इसराइल में किसी भी एक पार्टी को कभी पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, इसलिए सरकारें पार्टियों के गठबंधन द्वारा बनती हैं. जब मतभेद उत्पन्न होते हैं, तो गठबंधन जल्दी टूट सकते हैं.

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छोटी पार्टियाँ

इससे छोटी पार्टियों को स्थिति किंगमेकर की होती है. प्रधानमंत्रियों को अक्सर अपनी सरकार को सत्ता में बनाए रखने के लिए संकीर्ण माँगों का सामना करना पड़ता है. नेतन्याहू ने अपने राजनीतिक अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अति-रूढ़िवादी यहूदी दलों पर भरोसा किया है.

पार्टियों को सितंबर तक अपने उम्मीदवारों की सूची जमा करनी है. इसका मतलब है कि राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव आ सकता है, और उम्मीद है कि और भी पार्टियाँ चुनाव में शामिल होंगी, विलय करेंगी या फिर दौड़ से बाहर हो जाएंगी.

सभी निवासी इसराइली नागरिक, जिनमें फलस्तीनी मुस्लिम अल्पसंख्यक भी शामिल हैं, चुनाव में मतदान कर सकते हैं. उन बस्तियों में रहने वाले भी, जिन्हें इसराइल ने औपचारिक रूप से अपने कब्जे में नहीं लिया है, मतदान कर सकते हैं.

यरुशलम में रहने वाले लाखों फलस्तीनियों से ज्यादातर वे लोग, जो स्थायी रूप से वहाँ रहते हैं, पर जिन्होंने इसराइली नागरिकता को अस्वीकार किया है, मतदान नहीं कर सकते. पर नागरिक लेने वाले फलस्तीनियों की अपनी पार्टियाँ भी हैं.

अलोकप्रिय नेतन्याहू

हालाँकि जनता ने हमास, हिज़्बुल्ला और ईरान के खिलाफ युद्ध का बड़े पैमाने पर समर्थन किया है, लेकिन सर्वेक्षणों से पता लगता है कि नेतन्याहू के नेतृत्व पर लोगों का भरोसा कम हो गया है.

उनकी हार सामने नज़र आने के बावज़ूद उनके किसी प्रतिद्वंद्वी के लिए भी कोई स्पष्ट रास्ता नज़र नहीं आ रहा है. उनके प्रमुख प्रतिस्पर्धियों में एक हैं, गज़ा में अपना बेटा खोने वाले पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़ेनकोट, जिनकी लोकप्रियता बढ़ रही है.

उनके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और येर लैपिड भी हैं, जिन्होंने गठबंधन बनाकर 2021के चुनाव में नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर दिया था. उन्होंने उदारवादी और रूढ़िवादी दलों की एक संयुक्त सरकार बनाई, और इसराइल के इतिहास में पहली बार, एक इस्लामी अरब पार्टी को भी शामिल किया. वह सरकार 18महीने तक चली.

पूर्व रक्षामंत्री एविग्डोर लिबरमैन भी प्रतिस्पर्धा में हैं, जो कभी नेतन्याहू के सहयोगी और करीबी थे. अपने पूर्व बॉस से भी अधिक कट्टरपंथी लिबरमैन ने 2018में नेतन्याहू की सरकार से इस्तीफा दे दिया था, और उन पर गज़ा में हमास के प्रति बहुत नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया था.

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गठबंधनों की भूमिका

नेतन्याहू के गठबंधन में उनकी अपनी दक्षिणपंथी पार्टी लिकुड, वित्तमंत्री बेज़लेल स्मोट्रिच की बस्ती समर्थक धार्मिक ज़ायोनिज़्म और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर की धुर दक्षिणपंथी यहूदी पावर शामिल हैं.

अति रूढ़िवादी यहूदी पार्टियाँ यूनाइटेड टोरा यहूदी धर्म और शास ने 2024में सरकार छोड़ दी थी, लेकिन उन्होंने इसे बनाए रखने में मदद की है.नेतन्याहू को सत्ता से हटाने की होड़ में आइज़ेनकोट की यशर (हिब्रू में ‘ईमानदार’ या ‘सीधा’), बेनेट और लैपिड की टुगेदर, लिबरमैन की इसराइल अवर होम, जिसे इसराइल के पूर्व सोवियत आप्रवासी समुदाय का समर्थन प्राप्त है.

इनके अलावा पूर्व जनरल यायर गोलान के नेतृत्व वाली वामपंथी डेमोक्रेट्स भी इनमें शामिल हैं. चार पार्टियाँ जो मुख्य रूप से 20प्रश अल्पसंख्यक अरबों का प्रतिनिधित्व करती हैं, हदाश, ता’अल, रा’आम और बलाद. ये भी नेतन्याहू विरोधी मोर्चे में जा सकती हैं.

भ्रष्टाचार के आरोप

नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोपों का मुकदमा भी चल रहा है. उनके खिलाफ तीन मामले हैं. एक, धनी व्यापारियों से महंगे उपहार लेने और बदले में मदद करने का आरोप.दूसरे, अखबार येदियोट अहरोनोट के प्रकाशक अर्नोन ‘नोनी’ मोज़ेस के साथ बातचीत में अच्छी मीडिया कवरेज के बदले प्रतिद्वंद्वी अखबार इसराइल हयोम पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा का आरोप. और तीसरे, दूरसंचार कंपनी बेज़ेग को फायदे देने के बदले न्यूज़ साइट से अनुकूल कवरेज लेने का आरोप.

इस साल जून में नेतन्याहू ने अपनी गवाही पूरी की. अभियोजन पक्ष की जिरह भी खत्म हो चुकी है. यह प्रक्रिया अभी बरसों तक चल सकती है. सबसे महत्त्वपूर्ण मामले में जजों ने अभियोजन पक्ष से मामला वापस लेने को कहा है, पर वह वापस हुआ नहीं है.

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