डिजिटल मीडिया और पसमांदा आंदोलन

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 05-08-2026
Digital Media and the Pasmanda Movement
Digital Media and the Pasmanda Movement

 

सेराज अंसारी

जब हम सुबह-सुबह चाय की चुस्की के साथ अखबार खोलते हैं या रात को टीवी पर तीखी बहसें देखते हैं, तो ऐसा लगता है मानो देश के सारे मुसलमान एक जैसे ही हैं। सालों से इन बड़े-बड़े अखबारों और टीवी चैनलों ने मुस्लिम समाज को एक ही चश्मे से देखने की आदत बना ली है। उन्होंने यह मान लिया है कि इस बड़े समाज में न तो कोई विविधता है, न कोई आपसी फर्क और न ही कोई सामाजिक ऊंच-नीच।

पारंपरिक मीडिया के कर्ताधर्ताओं ने मुसलमानों का एक काल्पनिक और एकरूपी चेहरा बना दिया है, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। इन मीडिया घरानों ने इस बड़ी सच्चाई को हमेशा दबाकर रखा कि मुस्लिम समाज के भीतर भी अगड़े यानी अशराफ और पिछड़े यानी पसमांदा का एक बहुत बड़ा और गहरा फर्क मौजूद है।

इस फर्क को साबित करने के लिए किसी बड़े दावे की जरूरत नहीं है, बल्कि 2006 की मशहूर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ही काफी है। यह सरकारी रिपोर्ट साफ बताती है कि भारत की कुल मुस्लिम आबादी का करीब 85प्रतिशत हिस्सा पसमांदा समाज का है, जिसमें पिछड़े, दलित और आदिवासी पृष्ठभूमि के मुसलमान शामिल हैं।

इतने बड़े बहुमत के बावजूद मुख्यधारा के मीडिया में पसमांदा समाज की तकलीफों, उनकी मेहनत, उनके रोजमर्रा के संघर्षों और उनकी सामाजिक पहचान को कभी जगह नहीं मिली। आजादी के बाद से अगर किसी पसमांदा इंसान को अपनी बात रखनी होती थी या अपना कोई लेख छपवाना होता था, तो उसे बड़े-बड़े संपादकों के दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे।

ये संपादक एक तरह से गेटकीपर यानी पहरेदार का काम करते थे। अशराफ सोच से घिरे ये पहरेदार ही तय करते थे कि कौन सी बात जनता के सामने जाएगी और कौन सा दर्द फाइलों में दबा दिया जाएगा। नतीजा यह हुआ कि 85प्रतिशत आबादी की आवाज कभी सामने ही नहीं आ सकी।

लेकिन अब वक्त बदल रहा है और इस स्थापित भ्रम को तोड़ा जा रहा है। आज पसमांदा समाज के युवा, लेखक और कार्यकर्ता इस झूठे नैरेटिव को चुनौती दे रहे हैं कि मुस्लिम समाज में कोई जात-पात या भेदभाव नहीं है। मैं खुद इस वैचारिक बदलाव का एक छोटा सा हिस्सा हूँ।

मैं बहुत सामान्य परिवार से आता हूँ और मेरी पढ़ाई-लिखाई भी किसी नामी-गिरामी यूनिवर्सिटी में नहीं हुई है। लेकिन मुझे अपने समाज और देश की राजनीति को समझने का हमेशा से शौक था। इसी शौक की वजह से मैं अपने सीधे-साधे शब्दों में कुछ न कुछ लिखता रहता था।

मेरी जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी, लेकिन फिर मेरा परिचय 'पसमांदा विमर्श' से हुआ। जब मैंने पसमांदा आंदोलन के बारे में पढ़ना और सुनना शुरू किया, तो मेरे दिल को बहुत तसल्ली मिली। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे ही दिल की बात कह दी हो। जो बातें मैं अपने मोहल्ले में, अपने घर-परिवार में और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में देखता था, उन्हें पहली बार एक वैचारिक पहचान मिल रही थी।

मेरी इस सीख और समझ के सफर में डिजिटल मीडिया ने सबसे बड़े उस्ताद का काम किया। यूट्यूब पर मुझे 'पसमांदा डेमोक्रेसी' जैसे चैनल मिले, जहाँ से मुझे इस आंदोलन की बारीकियों को समझने का मौका मिला। मैंने फैयाज अहमद फैजी जैसे विचारकों को सुना, जिनके तर्कों ने मेरी आँखें खोल दीं।

इसके बाद मैंने अली अनवर साहब की किताब 'मसावात की जंग' और मसूद आलम फलाही साहब की किताब 'हिंदुस्तान में जात-पात और मुसलमान' को पढ़ा। इन किताबों ने मुझे वह वैचारिक ताकत दी जिसकी मुझे तलाश थी। मुझे साफ समझ आ गया कि राईन, मंसूरी, सैफी, कुरैशी, अंसारी, जुलाहा या हलालखोर जैसे मेहनतकश समाजों के साथ मस्जिदों की कमेटियों से लेकर राजनीतिक पार्टियों तक में जो दरकिनारी होती है, वह कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि एक सोची-समझी सामाजिक व्यवस्था है।

जब मेरी समझ बेहतर हुई, तो मैंने फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पसमांदा हकों के लिए लिखना शुरू किया। मुझे लोगों से बहुत अच्छा समर्थन मिला, लोग जुड़ने लगे और मेरी लिखी बातें दूर-दूर तक पहुँचने लगीं। मैं ज़मीनी स्तर पर 'ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़' से भी जुड़ा, जहाँ मुझे बहुत कुछ नया सीखने को मिल रहा है।

लेकिन सोशल मीडिया पर यह सफर उतना आसान नहीं है जितना बाहर से दिखता है। जब एक पसमांदा कार्यकर्ता इंटरनेट पर अपनी आवाज उठाता है, तो उसे सबसे पहले अशराफ समाज के बुने हुए उस नैरेटिव का सामना करना पड़ता है जो सिर्फ 'हिंदू-मुस्लिम' के ध्रुवीकरण पर टिका है।

अशराफ वर्ग हमेशा समाज को बाबरी मस्जिद, पर्सनल लॉ, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का दर्जा या उर्दू जैसे भावनात्मक मुद्दों में उलझा कर रखना चाहता है। जब आम आदमी इन भावनात्मक बहसों में फंसा रहता है, तो वह अपनी गरीबी, अपनी शिक्षा, रोजगार और राजनीति में अपनी जायज हिस्सेदारी पर बात ही नहीं कर पाता।

जैसे ही कोई पसमांदा कार्यकर्ता इन बुनियादी मुद्दों को उठाता है, उस पर तरह-तरह के तमगे चिपका दिए जाते हैं। उसे 'कौम का गद्दार', 'मुस्लिम एकता तोड़ने वाला' या किसी विरोधी दल की 'बी-टीम' कहकर चुप कराने की कोशिश की जाती है।

लेकिन हमारा जवाब बहुत सीधा और साफ है,सच्ची 'मुस्लिम एकता' केवल और केवल समानता और मसावात पर ही टिकी हो सकती है। जो एकता गैर-बराबरी, भेदभाव और शोषण पर टिकी हो, वह एकता नहीं बल्कि गुलामी है। गैर-बराबरी को छुपाकर एकता का नारा देना समाज को धोखे में रखने जैसा है।

इन वैचारिक हमलों के अलावा, सोशल मीडिया की अपनी तकनीकी सीमाएं और रुकावटें भी हैं जो एक कार्यकर्ता के सामने आती हैं। अक्सर सोशल मीडिया के एल्गोरिदम गंभीर और हक-अधिकार की बातों को उतनी रीच नहीं देते जितनी विवादित या मसालेदार बातों को मिलती है।

इसके साथ ही, अशराफ वर्ग के संगठित ट्रोल्स पसमांदा कार्यकर्ताओं की पोस्ट्स पर बदतमीजी करते हैं, अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं और अकाउंट्स को मास-रिपोर्ट करके ब्लॉक करवाने की साजिशें करते हैं।

इस मनोवैज्ञानिक दबाव का असर यह होता है कि बहुत से पसमांदा युवा जो हमसे सहमत होते हैं, वे भी डर के मारे हमारी पोस्ट को सार्वजनिक रूप से लाइक, कमेंट या शेयर करने से कतराते हैं। वे इनबॉक्स में तो समर्थन देते हैं, लेकिन खुले तौर पर सामने आने से डरते हैं कि कहीं उन्हें समाज में अकेला न कर दिया जाए।

इन तमाम चुनौतियों के बावजूद डिजिटल मीडिया ने पसमांदा आंदोलन को वह हथियार दे दिया है जिसे अब कोई छीन नहीं सकता। आज किसी दूर-दराज़ के गाँव में भी अगर किसी पसमांदा भाई या बहन के साथ कोई जुल्म या भेदभाव होता है, तो सोशल मीडिया के जरिए वह खबर कुछ ही घंटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुँच जाती है और शासन-प्रशासन पर दबाव बन जाता है।

अब हमें अपनी बात कहने के लिए किसी बड़े अखबार के संपादक या चैनल के मालिक की इजाजत नहीं चाहिए। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि केवल सोशल मीडिया पर लाइक और शेयर बटोरने से जमीनी हकीकत नहीं बदलेगी। हमें डिजिटल क्रांति का जश्न मनाने से आगे बढ़कर अपनी रणनीति को ज्यादा मजबूत और असरदार बनाना होगा।

भविष्य की राह यही है कि हमें डिजिटल और ज़मीनी संघर्ष का एक मजबूत मेल तैयार करना होगा। सबसे पहले, पसमांदा युवाओं को एक-दूसरे की ढाल बनना होगा और एक ऐसा डिजिटल नेटवर्क खड़ा करना होगा जो किसी भी कार्यकर्ता पर होने वाले साइबर हमले या ट्रोलिंग का संगठित और तार्किक जवाब दे सके।

इसके साथ ही सोशल मीडिया के जरिए जुड़ने वाले नए युवाओं को 'ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़' जैसे ज़मीनी संगठनों से जोड़ना होगा, ताकि यह डिजिटल ऊर्जा असली सामाजिक और राजनीतिक ताकत में बदल सके।

इसके अलावा, हमारी सबसे बड़ी लड़ाई नीतिगत बदलाव और सरकारी योजनाओं में अपनी हकमारी को रोकने की है। सरकार जो भी योजनाएं 'अल्पसंख्यकों' के नाम पर चलाती है, उनका बड़ा हिस्सा आज भी वही अगड़ा वर्ग ले जाता है जो पहले से साधन-संपन्न है।

हमारी सीधी और स्पष्ट मांग है कि सरकार की अल्पसंख्यक योजनाओं और बजट में पसमांदा मुसलमानों के लिए उनकी 85प्रतिशत आबादी के हिसाब से अलग हिस्सा तय होना चाहिए। यह मांग किसी से भीख या खैरात की नहीं है, बल्कि अपनी जायज आबादी के मुताबिक अपना हक पाने की है।

डिजिटल मीडिया ने हमारी सोई हुई चेतना को जगाने का काम कर दिया है, अब इस चेतना के सहारे हमें अपनी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हिस्सेदारी हासिल करनी है। यह लड़ाई भले लंबी हो, लेकिन अब पसमांदा समाज अपनी खामोशी तोड़ चुका है और पीछे हटने वाला नहीं है।