भारत की आाजादी, एसवाई कुरैशी और अब्बा का सौ रूपये घंटा वाला ‘ग्रामर स्कूल'

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 05-08-2026
SY Quraishi and his father’s ‘Grammar School’ that charged a hundred rupees an hour.
SY Quraishi and his father’s ‘Grammar School’ that charged a hundred rupees an hour.

 

मलिक असगर हाशमी

यह उस दौर की बात है जब पुरानी दिल्ली आज की तरह शोर-शराबे और व्यापारिक आपाधापी से भरी नहीं थी। आबादी कम थी, मगर लोगों का तालीम और पढ़ाई-लिखाई से राब्ता कुछ खास नहीं था। उसी दौर की एक ज़मीनदोज़ हकीकत यह भी थी कि उस इलाके में एक ऐसा इंसान रहता था, जिसे लोग मौलाना जुबैर कुरैशी के नाम से जानते थे।

मौलाना जुबैर कोई आम उस्ताद नहीं थे। वे ‘कुरैशी स्कूल ऑफ़ लैंग्वेजेज’ नाम से एक अदद अंग्रेजी सिखाने वाला मदरसा-ए-तालीम चलाते थे। उस ज़माने में उनकी फीस हुआ करती थी पूरे 100 रुपये,जो आज के लगभग दस हजार रुपयों के बराबर बैठती है।

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चुटकी लेकर आजादी की कहानी सुनाते एसवाई कुरैशी

दिल्ली के आम लोग उन्हें ‘बेहद महंगा उस्ताद’ कहकर बुलातेथे। लेकिन इस 100 रुपये की फीस के पीछे छुपा था एक ऐसा विज़न, जो बाद में जाकर पुरानी दिल्ली के सैकड़ों बच्चों का भविष्य सँवारने वाला साबित हुआ।

इस दिलचस्प दास्तान का पर्दा उठाइये तो मालूम होता है कि मौलाना जुबैर कुरैशी कोई और नहीं, बल्कि भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शहाबुद्दीन याकूब कुरैशीयानी एस.वाई. कुरैशी के पिता थे।

एस.वाई. कुरैशी का जन्म देश को आजादी मिलने से ऐन दो महीने पहले, 11 जून 1947 को इसी पुरानी दिल्ली की ऐतिहासिक आवोहवा में हुआ था। गिटार बजाने के शौकीन और दिल से बेहद ज़िंदादिल एस.वाई. कुरैशी आज भी चुटकी लेते हुए कहते हैं, "जो काम बड़े-बड़े स्वतंत्रता सेनानी न कर सके, मैंने तो दुनिया में आने के महज़ दो महीने बाद ही कर दिखाया--देश आज़ाद हो गया!"

कुरैशी परिवार का रिश्ता दिल्ली से कोई नया नहीं। करीब पांच सौ बरसों से उनकी जड़ें इसी शहर की मिट्टी में रची-बसी हैं। इस घराने ने वक्त-वक्त पर कई नामचीन आलिम और शिक्षाविद दिए। 1947 में जब मुल्क का बटवारा हुआ, तो खानदान के कुछ रिश्तेदार सीमा पार पाकिस्तान ज़रूर चले गए।

लेकिन एस.वाई. कुरैशी के दादा और अब्बा ने अपनी सरज़मीन छोड़ने से साफ़ इनकार कर दिया। उनका मानना था कि जिस मिट्टी में उनके पुरखों की सदियों पुरानी यादें दफ़्न हैं, उसे छोड़कर जाना मुमकिन नहीं।

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कस्तूरबा गांधी मार्ग पर मैक्स मूलर भवन( ग्योथे इंस्टीट्यूट) की लाइब्रेरी में किताबों में खोए युवा

मौलाना जुबैर कुरैशी को अंग्रेजी ग्रामर का एक जुनून-सा था। पुरानी दिल्ली की तीन-तीन पीढ़ियों ने उनसे अंग्रेजी के पैंतरे सीखे थे। उनका यह जुनून उम्र के ढलने के साथ कम नहीं हुआ। साठ साल की उम्र में जब वे लाठी के सहारे चलने लगे थे, तब भी उनका रुख मैक्स मूलर भवन (ग्योथे इंस्टीट्यूट) की तरफ रहता था- वही जर्मन सांस्कृतिक केंद्र जो प्रसिद्ध भारतविद् फ्रेडरिक मैक्स मूलर की याद में स्थापित किया गया था।

वहाँ जाकर उन्होंने खुद जर्मन भाषा सीखी और फिर अपने स्कूल में बेहद आसान तरीकों से जर्मन ग्रामर पढ़ाना शुरू कर दिया। वे ‘64 टेंस’ के अपने अनोखे फॉर्मूले से अंग्रेजी और जर्मन, दोनों जुबानों की जटिलताओं को चुटकियों में सुलझा दिया करते थे। बाद के दिनों में उनके नक्श-ए-कदम पर चलते हुए उनके बेटे एस.वाई. कुरैशी भी मैक्स मूलर भवन से जुड़े।

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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लेकिन उस '100 रुपये फीस' का रहस्य क्या था?

एस.वाई. कुरैशी ने हाल ही में प्रकाशित अपनी किताबइंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज़...’(India and I: A Hundred Memories, Not a Memoir) में इस राज़ से पर्दा उठाया। उन्होंने बताया कि उनके अब्बा पूरे महीने (रोजाना एक घंटा पढ़ाने) के सिर्फ 100 रुपये लेते थे, पर उनका गणित थोड़ा अलग था।

अगर क्लास में सिर्फ एक बच्चा होता, तो फीस 100 रुपये होती। अगर दो बच्चे होते, तो पचास-पचास रुपये। और अगर क्लास में पचास बच्चे आ जाते, तो हर बच्चे के हिस्से सिर्फ दो-दो रुपये आते!

इस अनोखी तरकीब के पीछे मौलाना का एक ही मकसद था,पुरानी दिल्ली के ज्यादा से ज्यादा बच्चों को तालीम के रास्ते पर लाना। वे जानते थे कि अगर बच्चे एक साथ आएंगे तो फीस सस्ती होती जाएगी और कोई भी बच्चा तालीम से महरूम नहीं रहेगा।

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घर के लाॅन में आराम करते एसवाई कुरैशी

उनका मानना था कि अगर एक बार इंसान किसी भाषा की 'ग्रामर' समझ जाए, तो वह दुनिया की कोई भी भाषा सीख सकता है। उनकी इस दरगाह-ए-इल्म में हिंदू और मुसलमान, दोनों समुदायों के चिराग एक साथ रोशन होते थे। पिता के इसी इल्म, अनुशासन और दूरदर्शिता की छांव में पलकर एस.वाई. कुरैशी और उनकी बहन, दोनों भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के सर्वोच्च पदों तक पहुँचे। मौलाना जुबैर कुरैशी ने पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में तालीम की जो अलख जगाई थी, उसकी रोशनी आज भी इतिहास के पन्नों में जगमगा रही है।

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