नीलम गुप्ता
"अगर शादी ही करनी है तो किसी आईएएस से हो जाएगी, लेकिन पहचान अपनी बनानी है।" यह सोच हर किसी के बस की बात नहीं होती। खासकर तब, जब परिवार में पहले से सेना और प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हों और समाज की अपेक्षाएं तय कर चुकी हों कि एक लड़की का भविष्य क्या होना चाहिए। लेकिन फराह हुसैन ने तय कर लिया था कि वह किसी आईएएस अधिकारी की पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि खुद एक अधिकारी के रूप में अपनी पहचान बनाएंगी।
उन्होंने अपने इस सपने को सिर्फ देखा ही नहीं, बल्कि उसे पूरा भी किया। साल 2016 में दूसरे प्रयास में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा पास कर उन्होंने 267वीं रैंक हासिल की और भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) में चयनित हुईं। आज वे आयकर विभाग में संयुक्त आयुक्त (ज्वाइंट कमिश्नर) के रूप में भरतपुर में कार्यरत हैं। रेंज हेड के रूप में उनके अधीन चार जिले आते हैं।
प्रशासनिक माहौल में बचपन, लेकिन अपना रास्ता खुद चुना
फराह हुसैन का जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहां प्रशासनिक सेवाओं और अनुशासन का वातावरण स्वाभाविक था। उनकी मां रूखसाना हुसैन के परिवार में सेना के अधिकारी रहे हैं, जबकि पिता अशफाक हुसैन के परिवार में कई आईएएस अधिकारी हैं।
स्वयं उनके पिता राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) के अधिकारी रहे, जो बाद में पदोन्नत होकर आईएएस बने। ऐसे माहौल में अधिकांश लोग यह मान लेते कि बेटी भी किसी प्रशासनिक अधिकारी के परिवार में विवाह कर लेगी। लेकिन फराह का सपना अलग था। वे कहती हैं कि उनके पिता हमेशा कहते थे, "अगर बनना है तो खुद आईएएस बनो।" यही बात उनके भीतर गहराई से बैठ गई।
अजमेर से मुंबई तक की पढ़ाई
पिता की सरकारी नौकरी के कारण उनकी परवरिश मुख्य रूप से अजमेर में हुई। प्रारंभिक और स्कूली शिक्षा अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों में हुई। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने मुंबई का रुख किया और प्रतिष्ठित गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से पांच वर्षीय बीएलएस-एलएलबी की पढ़ाई पूरी की।
कानून की पढ़ाई के दौरान और उसके बाद उन्हें देश के प्रतिष्ठित कानूनी विशेषज्ञों और संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी, न्यायमूर्ति रोहल दलवी, ट्राइलीगल तथा अशोक प्रताप एंड कंपनी जैसी प्रसिद्ध लॉ फर्मों के साथ काम किया। हालांकि वकालत का भविष्य उज्ज्वल था, लेकिन उनका लक्ष्य कुछ और था। वे कहती हैं, "मैंने कभी अपनी अलग प्रैक्टिस शुरू नहीं की, क्योंकि मेरा सपना प्रशासनिक सेवा में जाना था।"'
बिना कोचिंग के यूपीएससी की तैयारी
मुंबई से लौटकर उन्होंने पूरी तरह यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी। खास बात यह रही कि उन्होंने किसी कोचिंग संस्थान का सहारा नहीं लिया। पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली। अंक उम्मीद के अनुसार नहीं आए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। दूसरे प्रयास में वर्ष 2016 में 267वीं रैंक के साथ उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) में हुआ। वे कहती हैं, "मेहनत तो बहुत करनी पड़ी, लेकिन मेहनत करना मेरे स्वभाव में शुरू से रहा है।"
रिश्तेदारों की बातें, लेकिन परिवार बना ढाल
फराह का पैतृक गांव राजस्थान के झुंझुनूं जिले का नवां गांव है। जब वे कानून की पढ़ाई के लिए मुंबई गईं तो परिवार के कुछ रिश्तेदारों ने इसका विरोध भी किया। उन्हें कहा गया कि लड़की को इतने दूर पढ़ने भेजना ठीक नहीं है। इससे शादी में दिक्कत आएगी। लेकिन फराह और उनके माता-पिता ने इन बातों को कभी महत्व नहीं दिया। वे याद करती हैं, "शादी की बात मैंने कभी अपने दिमाग पर हावी नहीं होने दी। मुझे हमेशा लगता था कि शादी तो समय आने पर हो जाएगी। अभी जरूरी है पढ़ना और अपने पैरों पर खड़ा होना।"
विभाग में महिलाएं अब भी कम
आईआरएस अधिकारी बनने के बाद उनकी पहली नियुक्ति उदयपुर में सहायक आयुक्त (असिस्टेंट कमिश्नर) के रूप में हुई। इसके बाद उन्होंने जोधपुर और जयपुर में भी सेवाएं दीं और वर्तमान में भरतपुर में संयुक्त आयुक्त के रूप में कार्यरत हैं। वे बताती हैं, "मुझे विभाग में कहीं भी काम करने में कोई परेशानी नहीं हुई। सभी सहयोगी रहे। लेकिन एक बात जरूर महसूस होती है कि हमारे विभाग में महिलाओं की संख्या अभी भी काफी कम है, चाहे उच्च स्तर हो या निचला।"
राजस्थान की पहली मुस्लिम महिला
आयकर विभाग में राजस्थान से इस स्तर तक पहुंचने वाली वे पहली मुस्लिम महिला अधिकारियों में गिनी जाती हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उनकी सफलता मुस्लिम समाज की लड़कियों को प्रेरित करेगी, तो वे बेहद संतुलित जवाब देती हैं।
"मैं निश्चित रूप से यह नहीं कह सकती कि कितना बदलाव आएगा। हमारे अपने परिवार में भी प्रशासनिक अधिकारियों की कमी नहीं थी, लेकिन बेटियों में से सबसे पहले मैंने ही सेवा में आने का निर्णय लिया। यह व्यक्तिगत इच्छा और जुनून की बात होती है। फिर भी, जब महिलाएं ऊंचे पदों पर दिखाई देती हैं, तो समाज में सकारात्मक बदलाव जरूर आता है।"
पहले अधिकारी बनीं, फिर शादी
फराह की प्राथमिकता हमेशा उनका करियर रहा। यूपीएससी में सफलता मिलने के एक वर्ष बाद, 2017 में उनका विवाह आईएएस अधिकारी कमर उल जमान चौधरी से हुआ। वे मुस्कुराते हुए कहती हैं, "ससुराल में भी कभी किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। मेरी सास मुझसे घर के काम की अपेक्षा नहीं रखतीं। उल्टा कई बार मना ही करती हैं। लेकिन मुझे खाना बनाना पसंद है, इसलिए मैं अपनी इच्छा से बनाती हूं।"
मां होने की जिम्मेदारी भी पूरी
फराह दो बच्चों की मां हैं एक बेटा और एक बेटी। व्यस्त प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई और उनके विकास पर विशेष ध्यान देती हैं। वे कहती हैं, "मेरे दोनों बच्चे अभी छोटे हैं। मैं यह तय नहीं करना चाहती कि मेरी बेटी या बेटा आगे क्या बनेंगे। मैं बस चाहती हूं कि दोनों अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और सबसे पहले अच्छे इंसान बनें। अपने जीवन का निर्णय वे स्वयं लें, जैसे मैंने लिया था। परिवार का सहयोग उन्हें भी मिलेगा।"
पहचान अपने नाम से
फराह हुसैन की कहानी केवल एक अधिकारी बनने की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें बेटियां अपने जीवन का रास्ता स्वयं चुनती हैं। यह कहानी बताती है कि सामाजिक दबाव, रिश्तेदारों की राय और परंपराओं से ऊपर उठकर यदि परिवार साथ खड़ा हो और व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे, तो सफलता की मंजिल दूर नहीं रहती।
उन्होंने साबित किया कि किसी बड़े अधिकारी की पत्नी कहलाने से कहीं अधिक संतोष अपनी मेहनत से उस मुकाम तक पहुंचने में है, जहां पहचान आपके नाम से होती है। आज फराह हुसैन न केवल एक सफल आईआरएस अधिकारी हैं, बल्कि उन हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा भी हैं जो अपने सपनों को सामाजिक सीमाओं से बड़ा मानती हैं। उनका संदेश स्पष्ट है शिक्षा, आत्मविश्वास और मेहनत से हर मंजिल हासिल की जा सकती है।