एसिड ने चेहरा जलाया, हौसला नहीं; रेशम फातिमा को मिली शेवनिंग स्कॉलरशिप

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 04-08-2026
Acid burned her face, not her spirit; Resham Fatima receives Chevening Scholarship.
Acid burned her face, not her spirit; Resham Fatima receives Chevening Scholarship.

 

नौशाद अख्तर / पटना-रांची

इंसान का शरीर टूट सकता है, पर अगर इरादे फ़ौलादी हों तो कोई भी ज़ुल्म किसी की रूह को नहीं तोड़ सकता। जमशेदपुर में जन्मी और रांची की रहने वाली 29 वर्षीया रेशम फातिमा की कहानी इसी अदम्य साहस, अनवरत संघर्ष और शिक्षा के दम पर रची गई कामयाबी की एक अद्भुत मिसाल है।

अपने नाम 'रेशम' की ही तरह कोमल लेकिन धागे की तरह बेहद मज़बूत रेशम फातिमा आज भारत की पहली ऐसी एसिड अटैक सर्वाइवर बन गई हैं, जिन्हें यूके (UK) सरकार की बेहद प्रतिष्ठित शेवनिंग स्कॉलरशिप (Chevening Scholarship) से नवाज़ा गया है।

वह दुनिया के शीर्ष संस्थानों में से एक लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस (LSE) में जेंडर, डेवलपमेंट और ग्लोबलाइज़ेशन विषय में मास्टर्स की पढ़ाई करेंगी।लेकिन इस सुनहरे मुकाम तक पहुँचने का रास्ता बेहद ख़ौफ़नाक और काँटों भरा था।

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वह काली रात: जब अपनों के ही भरोसे पर एसिड पड़ा

साल 2014 की बात है। तब 17 साल की रेशम 11वीं कक्षा में पढ़ते हुए लखनऊ में अपने दादा-दादी के पास रह रही थीं। उनकी माँ के चचेरे भाई रियाज़ (जो उम्र में उनसे लगभग 20 साल बड़े थे) ने उन पर जबरन शादी का दबाव बनाया। जब रेशम ने इस बेतुकी माँग को ठुकरा दिया, तो रियाज़ के सिर पर हैवानियत सवार हो गई।

फरवरी 2014 के एक दिन, कोचिंग क्लास के बाद रियाज़ ने रेशम को घर छोड़ने का भरोसा दिया। परिवार का सदस्य होने के नाते रेशम ने उस पर विश्वास कर लिया। लेकिन रियाज़ गाड़ी को सुनसान हाईवे की तरफ ले गया और अचानक रेशम के सिर पर एसिड की पूरी बोतल उड़ेल दी।

रेशम उस मंज़र को याद करते हुए बताती हैं,"पहले मुझे लगा कि यह पेट्रोल है, लेकिन अगले ही पल असहनीय जलन होने लगी। उसने चाकू निकालकर मेरी गर्दन पर रख दिया। मुझे आज भी याद है, मैंने सोचा था कि शायद मौत ऐसी ही होती है." 

लेकिन रेशम ने हार नहीं मानी। उन्होंने पूरी ताकत से उसे धक्का दिया और जलती हुई त्वचा के साथ सड़क पर भागीं। एक ऑटोरिक्शा चालक की मदद से वे किसी तरह बच पाईं, लेकिन इसके बाद समाज की बेरुखी और प्रशासनिक संवेदनहीनता का दौर शुरू हुआ। पास के पुलिस स्टेशन में लोगों की भीड़ लग गई, पर कोई भी उन्हें अस्पताल ले जाने को तैयार नहीं था। आखिरकार एक बुज़ुर्ग व्यक्ति की इंसानियत के सहारे उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया।

बदसूरत समाज, दया की नज़रें और शिक्षा की ढाल

एसिड अटैक ने रेशम के शरीर और चेहरे पर गहरे ज़ख्म छोड़ दिए थे। अगले कई साल अस्पताल के चक्करों और खौफ़नाक सर्जरियों में गुज़रे। समाज से मिलना-जुलना बंद हो गया, लेकिन रेशम ने खुद को घर के किसी अंधेरे कोने में बंद करने के बजाय पढ़ाई को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।

असहनीय दर्द और तनाव के बीच भी उन्होंने 12 वीं की परीक्षा में 87 %अंक हासिल किए। वर्ष 2015 में उन्हें बच्चों के लिए देश के सर्वोच्च राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार 'नेशनल ब्रेवरी अवॉर्ड' (भारत अवॉर्ड) से सम्मानित किया गया।

आगे चलकर उन्होंने दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया से फ़िज़िक्स (ऑनर्स) में स्नातक किया और फिर प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) से राजनीति एवं अंतरराष्ट्रीय संबंध (Politics & IR) में मास्टर्स की डिग्री हासिल की।

रेशम कहती हैं,"लोग घूरते थे, अजीब सवाल पूछते थे, और सबसे बुरा था उनकी 'दया'। मुझे किसी की दया नहीं चाहिए थी। मैं चाहती थी कि लोग मुझे मेरी काबिलियत से पहचानें, मेरे निशानों से नहीं।"

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असगर का साथ और 'एब्राह फ़ाउंडेशन' का जन्म

ज़िंदगी के इस सफ़र में जहाँ एक मर्द की हैवानियत ने उनके जीवन में अंधेरा भरा था, वहीं बाद में उनके पति असगर के प्यार और समर्थन ने उन्हें नए पंख दिए। 2024 में असगर से शादी के बाद, उन्होंने ही रेशम को शेवनिंग स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करने के लिए प्रेरित किया।

रेशम केवल अपने लिए नहीं लड़ रहीं। 2023में JNU में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने 'एब्राह फ़ाउंडेशन' (Ebrah Foundation) की शुरुआत की। यह संस्था युवा मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा, करियर और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है।

रेशम का मानना है कि मुस्लिम महिलाओं को दोहरा भेदभाव सहना पड़ता है-एक महिला होने के नाते और दूसरा अल्पसंख्यक होने के नाते। यदि वे आर्थिक रूप से आज़ाद होंगी, तो अपने फ़ैसले खुद ले सकेंगी।

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"मैं चाहती थी कि वह मुझे कामयाब होते देखे"

हमलावर रियाज़ को जेल भेज दिया गया था, जहाँ 2015 में ट्रायल के दौरान ही उसने आत्महत्या कर ली। जब रेशम को यह ख़बर मिली, तो उनकी प्रतिक्रिया चौंकाने वाली थी।रेशम उस मंज़र को याद करते हुए बताती हैं।

रेशम कहती हैं,"मैं नहीं चाहती थी कि वह मरे। मैं चाहती थी कि वह ज़िंदा रहे और मुझे कामयाब होते देखे। मैं चाहती थी कि वह देखे कि वह मेरी ज़िंदगी को तबाह नहीं कर सका।"

 

 

एक नई शुरुआत: लंदन का सफ़र

ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रायोजित 'शेवनिंग स्कॉलरशिप' के तहत रेशम की पढ़ाई, रहने, खाने और यात्रा का पूरा ख़र्च यूके सरकार उठाएगी। कई चरणों के कठिन इंटरव्यू और चयन प्रक्रिया को पार करने के बाद यह सफलता हासिल हुई है।

लंदन जाने के बाद भी रेशम का एब्राह फ़ाउंडेशन के ज़रिए वंचित लड़कियों के लिए काम जारी रहेगा। रेशम फातिमा की यह जीत केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि यह देश की हर उस लड़की और सर्वाइवर के लिए उम्मीद की एक किरण है, जिसे लगता है कि उसके सपने बहुत बड़े हैं। रेशम कहती हैं, "यह मेरी मंज़िल नहीं है, यह एक बड़े मक़सद की महज़ शुरुआत है।"