पानी के राजा: अकबर अली मीर की वो कहानी जो लहरों ने लिखी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 19-05-2026
Bilal Ahmed's Major Battle Against Drug Abuse Through Music in Kashmir
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शांतिप्रिया रॉय चौधरी

कहते हैं कि समंदर की लहरें उन्हीं का रास्ता छोड़ती हैं जिनके हौसलों में जान होती है। बंगाल की मिट्टी ने खेल जगत को एक से बढ़कर एक नगीने दिए हैं। लेकिन तैराकी के पानी में जिस नाम ने सबसे लंबी और सुनहरी लकीर खींची। वो नाम है अकबर अली मीर। दक्षिण 24परगना के तलदी जैसे छोटे से इलाके से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का तिरंगा लहराना कोई मामूली बात नहीं थी। यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं है। यह कहानी एक ऐसे जुनून की है जिसने पानी को अपनी जागीर बना लिया।

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90 के दशक में जब बंगाल में तैराकी का जिक्र होता था। तब अकबर अली मीर एक चमकता सितारा बनकर उभरे। उन्होंने करीब बीस सालों तक बंगाल के लिए तैराकी की। यह बीस साल सिर्फ समय का गुजरना नहीं था। यह रिकॉर्ड बनाने और उन्हें तोड़ने का दौर था। अकबर ने जूनियर नेशनल से लेकर सीनियर नेशनल तक कामयाबी के वो झंडे गाड़े जो आज भी मिसाल हैं। उनके करियर का सबसे यादगार साल 2000रहा। उस साल सीनियर नेशनल में उन्होंने अकेले 7स्वर्ण पदक जीतकर सबको हैरान कर दिया। आज भी उनके घर की अलमारियों में सजे वो पदक उनके कठिन संघर्ष की गवाही देते हैं।

अकबर अली मीर की रफ्तार सिर्फ राज्य स्तर तक सीमित नहीं रही। साल 2000 से 2007 के बीच उन्होंने अखिल भारतीय रेलवे के लिए आठ बार व्यक्तिगत चैंपियन का खिताब जीता। रेलवे की पटरियों पर दौड़ती गाड़ियों की तरह उनकी रफ्तार भी पानी में अजेय थी। उन्होंने 1999से 2008तक पूर्वी रेलवे और सीनियर नेशनल में अनगिनत पदक अपनी झोली में डाले। लेकिन अकबर का सपना सिर्फ देश के भीतर ही पदक जीतना नहीं था। वो दुनिया को दिखाना चाहते थे कि बंगाल के बेटों में कितना दम है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी चमक 1999से 2007के बीच पूरी दुनिया ने देखी। साल 2000में दक्षिण कोरिया में एशियाई खेल आयोजित हुए। वहां 100मीटर बैकस्ट्रोक स्पर्धा में अकबर ने नौवां स्थान हासिल किया। भले ही वो पदक से चूक गए। लेकिन दुनिया के दिग्गजों के बीच नौवें नंबर पर आना भारत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इसके बाद तो उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। 2004में पाकिस्तान में हुए सैफ (SAFF) खेलों में उन्होंने अपनी ताकत का लोहा मनवाया। वहां उन्होंने एक नहीं बल्कि तीन स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया।

एशियाई स्तर पर भी उनकी धमक बरकरार रही। 2001की जूनियर एशियाई तैराकी चैंपियनशिप में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। फिर 2002में चीन की धरती पर जाकर जूनियर तैराकी चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल पर कब्जा किया। यह वो दौर था जब अकबर अली मीर का नाम सुनकर प्रतिद्वंद्वी भी सहम जाते थे।

2003में हैदराबाद में आयोजित अफ्रीकी-एशियाई खेलों में उन्होंने दो कांस्य पदक जीतकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी उनकी बहुत चर्चा रही। 2007में वहां आयोजित भारत-बांग्ला खेलों में उन्होंने पांच स्वर्ण पदक जीते। इसके अगले साल 2008में जब ये खेल कोलकाता में हुए। तब भी उन्होंने अपने घरेलू मैदान पर पांच स्वर्ण पदकों की झड़ी लगा दी।

इतनी बड़ी उपलब्धियों के बाद भी अकबर के पैर हमेशा जमीन पर रहे। उन्होंने 1999 में पूर्वी रेलवे में अपनी नौकरी की शुरुआत की थी। 2014तक वह लगातार रेलवे की हर छोटी-बड़ी प्रतियोगिता में हिस्सा लेते रहे। लेकिन एक खिलाड़ी का करियर हमेशा के लिए नहीं होता। उम्र के साथ रफ्तार कम होने लगती है। मगर अकबर के भीतर का गुरु कभी शांत नहीं बैठा। 2016में उन्हें पूर्वी रेलवे के वरिष्ठ तैराकों का कोच नियुक्त किया गया। उन्होंने अपनी तकनीक और अनुभव को नई पीढ़ी को सौंपना शुरू किया।

आजकल अकबर अली मीर पूर्वी रेलवे की बेहाला तैराकी अकादमी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। 2023से वह यहां के मुख्य कोच के तौर पर काम कर रहे हैं। इस अकादमी में बंगाल के कोने-कोने से आए युवा लड़के कड़ी ट्रेनिंग ले रहे हैं। अकबर खुद कड़ी धूप और पानी के बीच खड़े होकर घंटों बच्चों को बारीकियां सिखाते हैं। वह जानते हैं कि बंगाल में प्रतिभा की कमी नहीं है। बस उसे सही दिशा दिखाने वाले हाथ चाहिए।

एक बातचीत के दौरान अकबर ने अपने भविष्य के सपनों का जिक्र किया। उन्होंने बहुत ही सादगी से कहा कि जब वह अपनी नौकरी से रिटायर हो जाएंगे। तब भी वह घर पर आराम नहीं करेंगे। उनका एकमात्र लक्ष्य बंगाल के उन बच्चों के लिए एक वर्ल्ड क्लास स्विमिंग ट्रेनिंग सेंटर खोलना है। जिनके पास साधन कम हैं लेकिन सपना बड़ा है। वह चाहते हैं कि बंगाल का तैराकी जगत फिर से वही पुराना गौरव हासिल करे। वह अपनी पूरी जिंदगी इस खेल के नाम कर देना चाहते हैं।

अकबर अली मीर की शख्सियत में एक खास बात है। वो अपनी जीत का शोर नहीं मचाते। उनकी खामोशी में भी एक गहराई है। उनके छात्रों का कहना है कि सर जब पानी में उतरने का तरीका सिखाते हैं। तो लगता है जैसे कोई जादू हो रहा हो। वह सिर्फ एक कोच नहीं बल्कि एक बड़े भाई की तरह सबका ध्यान रखते हैं। बेहाला की अकादमी में उनसे प्रशिक्षण ले रहे लड़के अब धीरे-धीरे राज्य स्तर पर अपनी पहचान बनाने लगे हैं।

बंगाल के खेल गलियारों में अकबर अली मीर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। वह एक ऐसे नायक हैं जिन्होंने गुमनामी के अंधेरे में जाने के बजाय रोशनी बांटना चुना। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि जीतना महत्वपूर्ण है। लेकिन जीतकर दूसरों को जीतना सिखाना उससे भी बड़ा काम है। 2000के वो सात स्वर्ण पदक हों या 2024में बेहाला की अकादमी में बच्चों को सिखाती उनकी आवाज। अकबर अली मीर आज भी पानी के वही बेताज बादशाह हैं।

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आने वाले समय में बंगाल की तैराकी किस दिशा में जाएगी। यह काफी हद तक अकबर जैसे कोचों पर निर्भर करता है। उनका सपना है कि बंगाल का कोई बच्चा ओलंपिक के पोडियम पर खड़ा हो। और उस दिन अकबर के संघर्ष को सही मायनों में इनाम मिलेगा। फिलहाल तो वह अपनी बेहाला अकादमी में नए सितारों को तराशने में जुटे हैं। अकबर अली मीर की यह जीवन यात्रा हर उस युवा के लिए सबक है। जो सोचता है कि छोटी जगहों से निकलकर बड़ी सफलता नहीं पाई जा सकती। उन्होंने दिखाया कि मेहनत की लहरों पर सवार होकर दुनिया के किसी भी किनारे को छुआ जा सकता है।