डॉ. शाइस्ता यूसुफ को किसी एक दायरे में नहीं बांधा जा सकता। वो शायरा हैं, उपन्यासकार हैं और अनुवादक भी। वो एक बिजनेसवुमन हैं, मंच की कलाकार हैं और समाज सुधारक भी। उनकी जिंदगी की कहानी किसी सीधी लकीर जैसी नहीं, बल्कि उनके उपन्यास 'सदियों का रक्स' की तरह कई परतों में लिपटी हुई है।
उनका जन्म मुंबई में एक पढ़े-लिखे और संस्कारी खानदान में हुआ। उनके पिता अब्दुल रहमान कॉन्ट्रैक्टर मुंबई के मशहूर उद्योगपति थे। शाइस्ता को साहित्य विरासत में नहीं मिला, बल्कि उन्होंने इसे खुद संवारा। सातवीं क्लास में उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी।

दसवीं तक आते-आते उनकी शादी मुंबई के कार डीलर और आर्किटेक्ट इम्तियाज यूसुफ से हो गई। कम उम्र में शादी की जिम्मेदारियों ने उनकी आवाज को दबाया नहीं, बल्कि उसे और गहरा बना दिया। उन्होंने 1970 में लिखना शुरू किया। उस दौर को याद करते हुए वो कहती हैं कि एक वक्त ऐसा आया जब उन्हें लगा कि उनकी बात दुनिया तक पहुंचनी चाहिए। बस, यहीं से उनके सफर की नींव पड़ी।
उनकी पढ़ाई उनकी काबिलियत का सबूत है। उन्होंने दर्शनशास्त्र (Philosophy), मनोविज्ञान (Psychology) और उर्दू में एम.ए. किया। कॉस्मेटोलॉजी में डिप्लोमा लिया। बाद में तुमकुर यूनिवर्सिटी ने उन्हें उर्दू साहित्य और समाज सेवा में उनके योगदान के लिए डॉक्टरेट की मानद उपाधि से नवाजा। उन्होंने अपनी प्रेगनेंसी के दौरान परीक्षाएं दीं। उन्होंने घर और अपने सपनों को एक साथ संभाला।
शाइस्ता की साहित्यिक दुनिया बहुत बड़ी है। 'गुल-ए-खुदरो', 'सूनी परछाइयां' और 'आब-ए-आइना' जैसी किताबों ने उन्हें एक गंभीर शायरा के रूप में पहचान दी। मशहूर विद्वान शम्सुर्रहमान फारूकी ने बेंगलुरु यूनिवर्सिटी में उनकी किताब का विमोचन किया था।

जब मशहूर लेखिका कुर्रतुलएन हैदर ने उन्हें 'गुल-ए-खुदरो' (खुद से खिला जंगली फूल) कहा, तो यह नाम उनकी पहचान बन गया। हैदर ने उन्हें सलाह दी थी कि वो मुशायरों की भीड़ में खुद को जाया न करें, बल्कि ठोस साहित्य लिखने पर ध्यान दें।
शाइस्ता ने निदा फाजली, अख्तरुल ईमान और बाकर मेंहदी जैसे बड़े लेखकों के साथ वक्त बिताया। उन्होंने 'लड़की का सिगरेट पीना' जैसे अनछुए विषय पर भी कविता लिखी। बेंगलुरु में रहने के बावजूद उन्हें इस बात पर हैरानी होती है कि दिल्ली और मुंबई के लोग उन्हें ज्यादा पहचानते हैं।
गद्य (Prose) के क्षेत्र में भी उनका काम बड़ा है। उन्होंने 'आने वाले कल की कहानियां' के नाम से अंग्रेजी कहानियों का उर्दू में अनुवाद किया। उनका उपन्यास 'सदियों का रक्स' वक्त और समाज की परतों को खोलता है।
शाइस्ता का मंच और कला से भी गहरा जुड़ाव रहा। उन्होंने IPTA में ड्रामा आर्टिस्ट के तौर पर काम किया। वो ख्वाजा अहमद अब्बास के नाटकों का हिस्सा रहीं और कादर खान जैसे दिग्गजों के साथ जुड़ी रहीं। उन्होंने रेडियो बॉम्बे में भी दो साल काम किया। मंच ने उन्हें आत्मविश्वास दिया, रेडियो ने आवाज को सलीका और साहित्य ने उन्हें अमर बना दिया।

उनकी कहानी सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है। उन्होंने ब्यूटी इंडस्ट्री में कदम रखा और 'मिस्टिक हर्बल कॉस्मेटिक्स' की शुरुआत की। बाद में उनके बेटे ने इसे 'क्लारिस' (Clarice) नाम से नया रूप दिया। उन्होंने 'शाइस्ता की खुबानी का मीठा' और 'उरूजम' जैसे हेल्थ प्रोडक्ट्स भी लॉन्च किए। वो बड़ी सादगी से कहती हैं कि बिजनेस दिमाग से चलता है और शायरी दिल से।
उर्दू के लिए उनका जुनून सिर्फ लिखने तक नहीं रहा। वो कई बड़े ट्रस्ट से जुड़ी रहीं। 2012 में उन्होंने 'महफिल-ए-निसा' की स्थापना की। यह संस्था उर्दू, महिलाओं और विरासत के लिए काम करती है। उन्होंने सरकारी स्कूलों को गोद लिया और उर्दू की रैलियां निकालीं। वो मानती हैं कि काम चाहे छोटा हो, लेकिन उसका स्तर हमेशा ऊंचा होना चाहिए।

आज उनके काम कर्नाटक बोर्ड के सिलेबस का हिस्सा हैं। उन्हें कर्नाटक उर्दू अकादमी अवार्ड समेत कई बड़े सम्मान मिल चुके हैं। उनकी जिंदगी यह सिखाती है कि साहित्य और रोजी-रोटी दो अलग रास्ते नहीं हैं। दर्शन और व्यापार साथ चल सकते हैं। अगर इंसान की अपनी कोई आवाज है, तो उसे कभी दबाया नहीं जा सकता।