Dr. Ambedkar's views on Islam and its implications for the Pasmanda community
अब्दुल्लाह मंसूर
भारतीय समाज के इतिहास में अगर किसी शख्सियत ने बराबरी, इंसाफ और इंसानी इज्ज़त की सबसे बुलंद आवाज़ उठाई, तो वे बिना किसी शक के डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। बाबा साहब सिर्फ भारत के संविधान बनाने वाले नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे गहरे और निडर सोचने वाले इंसान थे जो हर धर्म, रिवाज और समाजी ढांचे को दलील और नैतिकता की कसौटी पर परखते थे।
उनकी सोच का खास केंद्र हमेशा यह सवाल रहा कि कौन सा रास्ता इंसान को असली बराबरी और आज़ादी देता है। शुरुआत में इस्लाम की तरफ उनका नजरिया पूरी तरह नकारात्मक नहीं था। 1920 के दशक के दौरान वे इस्लाम को एक ऐसे मुमकिन विकल्प के तौर पर देखते थे जहाँ सैद्धांतिक तौर पर जात-पात के भेदभाव की कमी महसूस होती थी।
उन्हें एक उम्मीद थी कि शायद इस्लाम दलितों के लिए सामाजिक आज़ादी का एक बेहतर रास्ता साबित हो सकता है। लेकिन, जैसे-जैसे उनके निजी और समाजी तजुर्बे बढ़े, उनकी यह सोच बदलने लगी। अपनी आपबीती ‘वेटिंग फॉर अ विज़ा’ (Waiting for a Visa) में उन्होंने उन कड़वे तजुर्बों को बताया है, जिनमें उन्होंने पाया कि जो इंसान हिंदू समाज में अछूत माना जाता है, मुसलमानों के बीच भी सामाजिक तौर पर अछूत ही बना रह जाता है। डॉ. आंबेडकर किसी भी धर्म की बढ़ाई उसकी पवित्र किताबों से नहीं, बल्कि उस धर्म को मानने वाले समाज के असली बर्ताव से तय करते थे।
डॉ. आंबेडकर का इस्लाम से उम्मीद और अलगाव
डॉ. आंबेडकर के नज़रिए में आए इस बदलाव की एक अहम कड़ी 1929 का 'शारदा बिल' था। जब उस वक्त के मुस्लिम नेताओं ने बाल विवाह जैसी बुराई को रोकने वाले इस तरक्कीपसंद कानून का कड़ा विरोध किया, तो आंबेडकर को गहरा दुख हुआ। उन्हें महसूस हुआ कि मुस्लिम लीडरशिप सामाजिक सुधारों की तरफ न सिर्फ बेपरवाह है, बल्कि उनके खिलाफ भी है।
अपनी मशहूर किताब 'पाकिस्तान और भारत का बंटवारा' (Pakistan or the Partition of India) में उन्होंने बहुत विस्तार से उन वजहों को समझाया है, जिनकी वजह से वे इस्लाम को दलितों की भलाई का रास्ता नहीं मान सके। उनका पहला बड़ा तर्क 'सीमित भाईचारे' (Limited Fraternity) के ख्याल पर टिका था। बाबा साहब की दलील थी कि इस्लाम में जो भाईचारा दिखाई देता है, वह सिर्फ 'उम्मा' तक सीमित है, यानी वह एक मुसलमान का सिर्फ दूसरे मुसलमान के लिए प्यार और साथ है।
जो शख्स इस मजहबी दायरे से बाहर है, उसके लिए इस व्यवस्था में एक तरह का अलगाव और परायापन शामिल है। उनके मुताबिक, यह छोटा नज़रिया एक साझे लोकतांत्रिक नैतिकता के विकास में बहुत बड़ी रुकावट है, क्योंकि एक अच्छी नागरिकता के लिए जिस बड़ी हमदर्दी और आपसी भाईचारे की ज़रूरत होती है, वह यहाँ तंग मज़हबी पहचान की भेंट चढ़ जाती है।
दूसरा बड़ा तर्क मुस्लिम समाज का सुधारों के खिलाफ विरोध को लेकर था। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि जहाँ तुर्की में कमाल अतातुर्क की तरक्कीपसंद लीडरशिप में समाज आधुनिकता की ओर बढ़ रहा था, वहीं भारत के मुस्लिम नेता पुराने दौर के मूल्यों और लकीर के फकीर बने हुए थे।
उन्होंने मुस्लिम समाज में औरतों की हालत, खासकर 'परदा प्रथा' की बहुत कड़वी आलोचना की। डॉ. आंबेडकर ने इसे समाज के आधे हिस्से (महिलाओं) को दिमागी और समाजी अंधेरे में कैद रखने वाला एक जुल्म का तरीका माना। इसके अलावा, उन्होंने मालाबार के मोपला विद्रोह का जायज़ा लेते हुए, उस वक्त के सरकारी कागजों के आधार पर इसे एक ऐसी दुखद घटना माना जहाँ मजहबी कट्टरपन ने इंसानी कद्रों और आपसी भाईचारे को कभी न भरने वाला नुकसान पहुँचाया था।
सबसे अहम बात, जिसे बाबा साहब ने पूरी मज़बूती के साथ सामने रखा, वह था भारतीय मुसलमानों के बीच मौजूद गहरी जात-पात की व्यवस्था। उन्होंने सबूतों और आंकड़ों से यह साबित किया कि इस्लाम अपनाने के बाद भी भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों में जाति का जहर खत्म नहीं हुआ।
उन्होंने 'अशराफ' (ऊंची जात) और 'अजलाफ' (पिछड़े/पसमांदा) के बीच की उस गहरी सामाजिक खाई को दुनिया के सामने रखा जिसे अक्सर दबा दिया जाता था। उन्होंने यहाँ तक साफ किया कि मुस्लिम समाज के अंदर 'अरज़ाल' (बेहद पिछड़े या अछूत की कैटेगरी) तबके की हालत बहुत खराब है, जिन्हें कई जगहों पर मस्जिदों और कब्रिस्तानों तक में बराबरी का हक नहीं दिया जाता।
डॉ. आंबेडकर का नतीजा साफ था कि अगर मजहब बदलने के बाद भी एक दलित को समाजी तौर पर अछूत और तिरस्कृत ही रहना है, तो ऐसे रूहानी बदलाव का कोई अमली मतलब नहीं रह जाता। उनकी रिसर्च के मुताबिक, मुस्लिम समाज में फैला जातिवाद हिंदू समाज के मुकाबले ज्यादा उलझा हुआ और खतरनाक था क्योंकि यहाँ इसे "मज़हबी बराबरी" के एक सुंदर पर्दे के पीछे चालाकी से छिपाया जाता था। इन्हीं ठोस सामाजिक और तर्कपूर्ण वजहों से उन्होंने आखिर में बौद्ध धर्म का रास्ता चुना, जिसे वे कहीं ज्यादा साइंटिफिक, समझदारी वाला और इंसानी मानते थे।
डॉ. आंबेडकर का दर्शन और पसमांदा आंदोलन की राह
जब हम आज के दौर में पसमांदा (पिछड़े) नज़रिए से बाबा साहब डॉ. आंबेडकर की इन आलोचनाओं का गहराई से अध्ययन करते हैं, तो एक बहुत बड़ी सच्चाई सामने आती है, जिसे बड़े इतिहासकारों ने अक्सर नजरअंदाज किया है। बाबा साहब ने उस दौर में मुस्लिम समाज की जिन कमियों, रिवाजों और सियासी रवैये पर वार किया था, वह असल में 'अशराफ' या मुस्लिम सवर्ण समाज का ही असली चेहरा था।
उस वक्त के इतिहास को देखें तो पाएंगे कि मुस्लिम लीग से लेकर कांग्रेस के ऊंचे पदों तक जो भी मुस्लिम लीडरशिप एक्टिव थी, उसमें पसमांदा समाज का कोई असली हिस्सा० नहीं था। डॉ. आंबेडकर जिन सामाजिक बर्तावों को देखकर अपनी राय बना रहे थे, वे सभी बर्ताव ऊंचे तबके और ऊंची जात के 'अशराफ' मुसलमानों के थे, जो अपनी सामंती सोच और खानदानी बड़प्पन के घमंड में डूबे हुए थे।
पसमांदा समाज, जो भारतीय मुसलमानों का करीब 85 फीसदी हिस्सा है, उस दौर में न तो सियासी गिनती में शामिल था और न ही उसका दुख-दर्द मुख्यधारा की चर्चा तक पहुँच पा रहा था। पसमांदा समाज की भाषा, उसकी मेहनत की संस्कृति और उसकी दिक्कतों का उस वक्त की तथाकथित 'मुस्लिम बहस' में कोई जगह नहीं थी।
इसलिए बाबा साहब डॉ. आंबेडकर की आलोचनाएँ दरअसल उस 'अशराफ कयादत' (ऊंची जात की लीडरशिप) पर सीधा हमला थीं, जो इस्लाम के बराबरी के असली पैगाम के खिलाफ अपनी जातिवादी और पितृसत्तात्मक ताकत को बचाए रखना चाहती थी। पसमांदा नज़रिए से यह समझना ज़रूरी है कि बाबा साहब का विरोध इस्लाम के मूल रूहानी उसूलों से नहीं, बल्कि उस 'अशराफियत' से था जिसने मजहब की आड़ में जातिवाद को फलने-फूलने का मौका दिया।
आज भी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे इदारों में, जहाँ 90 फीसदी से ज्यादा कब्ज़ा सवर्ण मर्दों का है, डॉ. आंबेडकर की बातें सही साबित होती हैं क्योंकि यह लीडरशिप सुधारों के प्रति एक जन्मजात दुश्मनी का भाव रखती है और पसमांदा समाज की संवैधानिक अधिकारों व औरतों के हक की मांग को 'मज़हबी एकता' के खिलाफ बताकर खारिज कर देती है। चूँकि शरीयत कानून खुदा की आवाज़ नहीं बल्कि इंसानी व्याख्या है, इसलिए अशराफिया मौलवी तबका अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए दलीलों के बजाय पुरानी बातों को अहमियत देता है ताकि समाज हमेशा अपनी पहचान को लेकर डरा रहे।
मुस्लिम समुदाय की आज़ादी कभी भी व्यक्ति की निजी आज़ादी और इंसानी इज्ज़त से बड़ी नहीं हो सकती; इसीलिए पसमांदा आंदोलन हर उस कानून के खिलाफ खड़ा है जो मज़हब की आड़ में औरतों पर जुल्म करता है या जातिवाद को बढ़ावा देता है, क्योंकि निजी हक ही किसी भी इंसाफ पसंद समाज की असली कसौटी हैं। यही वजह है कि पसमांदा तीन तलाक़ के खिलाफ आए कानून का समर्थक था और एक समान नागरिक संहिता का भी समर्थक है।
डॉ. आंबेडकर के 'सीमित भाईचारे' के विचार को अगर पसमांदा नज़रिए से देखें, तो यह 'अशरफ भाईचारे' जैसा नज़र आता है, जहाँ हक और ताकत सिर्फ ऊंचे तबके तक सिमट कर रह जाते हैं और गरीब या पिछड़े मुसलमानों को महज भीड़ की तरह इस्तेमाल किया जाता है। आज के दौर में 'उम्मा' का नारा किताबी लगता है क्योंकि तमाम मुस्लिम देश अपनी राष्ट्रीय सीमाओं में बँटे हैं, जबकि असल में कुरान के मुताबिक उम्मा एक ऐसे समाज का नाम था जो ऊंच-नीच से परे साझा यकीन पर टिका था।
पैगंबर मुहम्मद ने मदीना के संविधान (मीसाक-ए-मदीना) के जरिए इस भाईचारे को कानूनी शक्ल दी, जिसने पुराने कबीलाई भेदभाव और 'असबीय्या' (खानदानी पक्षपात) को खत्म कर दिया। इस व्यवस्था में सिर्फ मुसलमान ही नहीं, बल्कि यहूदी और अन्य समुदाय भी बराबर के शरीक थे, जिसका मकसद खून के रिश्तों के बजाय इंसाफ और ऊंचे अखलाक के आधार पर एक ऐसा भाईचारा बनाना था जिसमें हर नस्ल और समाज के इंसान को बराबरी का मुकाम हासिल हो।
बाबा साहब की परदा प्रथा की आलोचना का समाजशास्त्रीय उत्तर यह है कि हिजाब या नकाब ऐतिहासिक तौर पर कभी भी आम पसमांदा (मेहनतकश) औरतों के लिए ज़रूरी नहीं था। यह असल में अमीर अशराफ औरतों का एक 'स्टेटस सिंबल' या उनकी सामाजिक बड़ाई की पहचान था।
खेती-किसानी और मज़दूरी करने वाली पसमांदा औरतें नकाब कैसे लगाएंगी। मशहूर लेखक राही मासूम रज़ा के नॉवेल 'आधा गाँव' में भी यह सच्चाई साफ दिखती है कि जहाँ सैयदानियाँ कड़े पर्दे में रहती थीं, वहीं पसमांदा औरतें बिना किसी रोक-टोक के खेतों, भठ्ठों और बाजारों में अपनी मेहनत से रोटी कमाती थीं। इसलिए बाबा साहब जिन रिवाजों को समाज की सुस्ती का प्रतीक मान रहे थे, वे असल में अशराफ तबके द्वारा थोपे गए बोझ थे।
डॉ. आंबेडकर ने मुस्लिम समाज में फैली जातिवाद और छुआछूत की जो चर्चा की, वह आज भी पसमांदा समाज का सबसे कड़वा और ज़िंदा सच है। उन्होंने 'अशराफ' और 'अजलाफ' के बीच की जिस माली और समाजी खाई को उस समय दिखाया था, वह आज भी मौजूद है। इसकी बड़ी वजह यह है कि अशराफ लीडरशिप ने "इस्लाम में जाति नहीं है" का एक झूठा और रूमानी नारा बुलंद करके पसमांदा समाज को उनके संवैधानिक और सामाजिक हक से दूर रखा।
जब तक समस्या को माना ही नहीं जाएगा, तब तक उसके हल की तरफ कदम बढ़ाना नामुमकिन हहै यद्यपि कुरान में जातिवाद की कोई जगह नहीं है, लेकिन भारत में इस्लामी धर्मशास्त्र और सामाजिक ढांचे के भीतर 'ज़ात-पात' की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं।
हकीकत यह है कि देवबंदी और बरेलवी जैसे बड़े मसलकों के उलेमाओं ने भी 'अशराफ' यानी ऊंची जाति के वर्चस्व को बढ़ावा दिया है, जहाँ फतवों और मौलाना अशरफ अली थानवी की 'बहिश्ती ज़ेवर' जैसी और दूसरी मशहूर किताबों के जरिए निचली बिरादरी के मुसलमानों के साथ बराबरी के निकाह और मेल-जोल को गलत बताया गया है।
आलम यह है कि आज भी मुस्लिम तंज़ीमों, संस्थाओं और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे इदारों में सैयद और शेख जैसे सवर्णों का ही बोलबाला है, जबकि दलित और पिछड़े मुसलमानों को नेतृत्व से महरूम रखा जाता है। मसूद आलम फलाही और अली अनवर जैसे जानकारों के मुताबिक, यह भेदभाव इतना गहरा है कि कुछ जगहों पर तथाकथित 'रज़ील' या पेशावर बिरादरियों को मस्जिदों तक में जाने से रोका गया है, जो यह साबित करता है कि भारतीय इस्लाम कुरानी बराबरी के बजाय पूरी तरह से जातिवादी व्यवस्था की गिरफ्त में है।
एक पसमांदा मुसलमान के लिए बाबा साहब डॉ. आंबेडकर का सबसे कीमती और ऐतिहासिक योगदान भारत का 'संविधान' है। यह हमारा संविधान ही है जिसने हमें पढ़ाई-लिखाई से लेकर जिंदगी के हर हिस्से में इज्ज़त के साथ खड़े होने का बुनियादी हक दिया है। आज पसमांदा समाज के अंदर जो भी थोड़ी-बहुत तालीमी, माली या समाजी तरक्की दिखती है, वह किसी मजहबी कानून या पुराने दौर की व्यवस्था की देन नहीं है, बल्कि आधुनिक भारतीय संविधान की ताकत का नतीजा है।
ऐतिहासिक तथ्य इस सच्चाई के गवाह हैं कि पुराने दौर के इस्लामी साम्राज्यों और खासकर मुगल सल्तनत के दौरान, आम पसमांदा मुसलमानों (जुलाहे, धुनिया, कसाई, हज्जाम वगैरह) की सामाजिक और माली हालत बहुत खराब थी। उन्हें राज-काज में कोई जगह नहीं मिली थी और उन्हें तब तक कोई भी बुनियादी इंसानी हक नहीं मिले, जब तक कि आधुनिक संवैधानिक ढांचे और लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद नहीं पड़ी।
बाबा साहब ने बहुत पहले ही यह चेतावनी दी थी कि अगर दलित वर्ग सिर्फ मजहब बदलकर मुसलमान बन जाता है, तो भी उनकी बुनियादी समाजी हालत में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा। आधुनिक शोधकर्ता प्रशांत के. त्रिवेदी (2016) के सर्वे के आज के आँकड़े इस दूरदर्शिता को सच साबित करते हैं।
आज भी भारत के कई हिस्सों में दलित मुसलमानों को साझे कब्रिस्तानों में इज्ज़त की जगह नहीं मिलती और शुरुआती स्तर पर उनके बच्चों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। समाजशास्त्री गौस अंसारी और सामाजिक कार्यकर्ता अली अनवर जैसे जानकारों की दलील के मुताबिक, पसमांदा समाज फिलहाल 'दोहरी मार' का शिकार है। एक तरफ वे समाज के अंदर जातिगत छुआछूत और भेदभाव झेल रहे हैं, तो दूसरी तरफ मजहब की आड़ लेकर उन्हें उनके संवैधानिक आरक्षण (खासकर अनुसूचित जाति के दर्जे) से दूर रखा गया है। बाबा साहब का दर्शन हमें सिखाता है कि समाजी नीतियां और सुधार किसी किताबी आदर्श के आधार पर नहीं, बल्कि समाज की ठोस, नग्न और कड़वी हकीकत को ध्यान में रखकर किए जाने चाहिए।
यह बिना किसी विवाद के सच है कि पसमांदा समाज के लिए तालीम, आत्म-सम्मान और इंसानी इज्ज़त का असली और हमेशा रहने वाला जरिया कोई पुरानी दकियानूसी व्यवस्था नहीं, बल्कि बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा लिखा गया भारतीय संविधान और उनकी तर्कपूर्ण विचारधारा ही है। डॉ. आंबेडकर के विचार आज भी पसमांदा आंदोलन के लिए एक रोशनी के मीनार की तरह हैं, जो उन्हें पहचान की राजनीति से ऊपर उठकर असली सामाजिक इंसाफ की तरफ बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
( अब्दुल्लाह मंसूर एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे 'पसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हैं।)