This picture taken 20 May 2007 shows some Hindu Ramayana epic depicted on stones at the Prambanan temple in Yogyakarta Photograph: (AFP)
डॉ. मनीष श्रीवास्तव
भारत और इंडोनेशिया के बीच संबंध केवल आधुनिक कूटनीति, दूतावासों, सरकारी समझौतों या उच्चस्तरीय यात्राओं की देन नहीं हैं। इन दोनों देशों का रिश्ता उससे कहीं अधिक पुराना, गहरा और मानवीय है। यह संबंध उन दिनों से शुरू होता है जब समुद्र व्यापार का मार्ग ही नहीं, बल्कि सभ्यताओं को जोड़ने वाला एक जीवंत पुल हुआ करता था। हजारों वर्ष पहले भारतीय व्यापारी, साधु, विद्वान, कारीगर, कथावाचक और तीर्थयात्री समुद्री मार्गों से दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर यात्रा करते थे। वे केवल मसाले, वस्त्र, धातुएँ या अन्य व्यापारिक वस्तुएँ ही नहीं ले जाते थे, बल्कि अपने साथ भाषा, लिपियाँ, दर्शन, देवी-देवताओं की अवधारणाएँ, धार्मिक विचार, महाकाव्य, सामाजिक परंपराएँ, खान-पान की आदतें और जीवन को देखने का भारतीय दृष्टिकोण भी लेकर जाते थे। इसी सतत आदान-प्रदान ने भारत और इंडोनेशिया के बीच एक ऐसी सांस्कृतिक नींव तैयार की, जिसकी छाप आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
इसी सांस्कृतिक प्रवाह के दौरान महर्षि अगस्त्य का नाम भी इंडोनेशिया की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन गया। विशेष रूप से जावा में उन्हें केवल एक ऋषि के रूप में नहीं, बल्कि हिंदू ज्ञान, अनुशासन, आध्यात्मिक शिक्षा और सांस्कृतिक परंपरा के वाहक के रूप में सम्मान दिया गया। प्रम्बानन जैसे प्रसिद्ध मंदिरों की परंपराओं में उनकी उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि भारतीय विचार कितनी गहराई तक इन द्वीपों में पहुँचे और समय के साथ स्थानीय समाज ने उन्हें अपने तरीके से अपनाकर एक विशिष्ट इंडोनेशियाई पहचान में रूपांतरित कर दिया।
समय के साथ प्राचीन साम्राज्यों ने इस सांस्कृतिक संबंध को और अधिक मजबूत बनाया। सुमात्रा का श्रीविजय साम्राज्य बौद्ध शिक्षा और अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया, जिसके भारत के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय से घनिष्ठ संबंध थे। उस समय विद्वानों, भिक्षुओं और छात्रों का आवागमन दोनों क्षेत्रों के बीच नियमित रूप से होता था, जिससे ज्ञान और दर्शन का आदान-प्रदान निरंतर जारी रहा।
इसी प्रकार जावा और बाली में भारतीय महाकाव्य—रामायण और महाभारत—ने एक नया जीवन प्राप्त किया। इन कथाओं को केवल पढ़ा या सुनाया ही नहीं गया, बल्कि स्थानीय संस्कृति में इस तरह आत्मसात किया गया कि वे नृत्य, नाटक, मूर्तिकला, मंदिर वास्तुकला, लोककथाओं, पारिवारिक नामों और सामाजिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा बन गईं। आज जब कोई भारतीय बोरोबुदुर या प्रम्बानन जैसे भव्य स्मारकों के सामने खड़ा होता है, तो उसे एक अनोखा अनुभव होता है। कहानियाँ परिचित लगती हैं, पात्र जाने-पहचाने लगते हैं, लेकिन उन्हें प्रस्तुत करने का तरीका पूरी तरह इंडोनेशियाई होता है। यही इस सांस्कृतिक संबंध की सबसे सुंदर विशेषता है—एक साझा विरासत, जिसे स्थानीय समाज ने अपनी आत्मा के अनुरूप नया रूप दिया।
सन 1927 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने जावा और बाली की यात्रा की। एक कवि होने के कारण उनकी दृष्टि केवल ऐतिहासिक स्मारकों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने उन सूक्ष्म बातों को देखा, जिन्हें अक्सर सामान्य पर्यटक नज़रअंदाज़ कर देते हैं। उन्होंने मंदिरों, नृत्य, संगीत, धार्मिक अनुष्ठानों, गाँवों के जीवन और स्थानीय समाज का अवलोकन किया, लेकिन सबसे अधिक जिस बात ने उन्हें प्रभावित किया, वह था दैनिक जीवन में घुला हुआ शांत अनुशासन और सहज सौंदर्य।
टैगोर को वहाँ भारत की झलक अवश्य दिखाई दी, लेकिन वह किसी नकल के रूप में नहीं थी। हर चीज़ में इंडोनेशियाई आत्मा स्पष्ट दिखाई देती थी। रामायण और महाभारत की कथाएँ वही थीं, किंतु उनमें जावा की अपनी कोमलता और कलात्मकता जुड़ चुकी थी। हिंदू दर्शन जीवित था, परंतु बाली में वह स्थानीय पूजा-पद्धतियों, सामुदायिक जीवन, चढ़ावे, प्रकृति के प्रति सम्मान और स्थानीय परंपराओं के माध्यम से अभिव्यक्त होता था।
गैमेलन संगीत में धैर्य, संतुलन और गहराई थी। नृत्य में अद्भुत शांति थी। कलाकारों का शरीर अत्यंत धीमी गति से चलता था, चेहरा शांत बना रहता था, लेकिन कथा सीधे दर्शकों के हृदय तक पहुँच जाती थी। यह अनुभव किसी भी भारतीय को यह एहसास कराता है कि संस्कृति केवल संरक्षित नहीं रहती, बल्कि समय के साथ नए रूप भी ग्रहण करती है। मुझे स्वयं भी इंडोनेशिया में अक्सर यही अनुभव हुआ। वहाँ अतीत का प्रदर्शन शोर-शराबे के साथ नहीं किया जाता। वह लोगों के नामों, पारिवारिक परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों, मंदिरों, स्थानीय उत्सवों और यहाँ तक कि लोगों के समय को देखने के तरीके में भी चुपचाप जीवित रहता है।
इसके बाद दोनों देशों के स्वतंत्रता संग्राम ने इस ऐतिहासिक संबंध को और भी गहरी भावनात्मक अर्थवत्ता प्रदान की। भारत और इंडोनेशिया दोनों ने औपनिवेशिक शासन का लंबा अनुभव किया था। दोनों देशों के लोग समझते थे कि विदेशी शासन का अर्थ केवल राजनीतिक नियंत्रण नहीं होता, बल्कि भूमि, व्यापार, शिक्षा, आवाजाही, सम्मान और आत्मनिर्णय पर बाहरी अधिकार भी होता है। इंडोनेशिया ने 1945 में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने के लिए लंबा संघर्ष किया। भारत ने दो वर्ष बाद 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की। उस समय पूरे एशिया में उपनिवेशवाद के विरुद्ध नई चेतना जन्म ले रही थी और अनेक समाज अपनी पहचान तथा स्वाभिमान को पुनः स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
भारत द्वारा इंडोनेशिया का समर्थन केवल कूटनीतिक नीति का हिस्सा नहीं था। इसके पीछे साझा ऐतिहासिक अनुभव और सांस्कृतिक आत्मीयता भी थी। एक प्राचीन सभ्यता दूसरी प्राचीन सभ्यता का साथ दे रही थी, जो विश्व मंच पर अपना सम्मानजनक स्थान पुनः प्राप्त करने का प्रयास कर रही थी। दोनों देशों के बीच समुद्र का विशाल विस्तार था, उनकी भाषाएँ अलग थीं, औपनिवेशिक अनुभवों की परिस्थितियाँ भी पूरी तरह समान नहीं थीं, लेकिन स्वतंत्रता की भावना और आत्मसम्मान की आकांक्षा दोनों में समान रूप से विद्यमान थी।
स्वतंत्रता के बाद भारत और इंडोनेशिया के संबंधों को औपचारिक रूप मिला। दूतावास स्थापित हुए, सरकारी यात्राएँ शुरू हुईं और अनेक समझौते हुए। किंतु उन लोगों के लिए जिन्होंने दोनों देशों में जीवन बिताया है, यह रिश्ता हमेशा केवल सरकारी दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं रहा। यह संबंध रोजमर्रा के छोटे-छोटे अनुभवों में जीवित दिखाई देता है। आज इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा मुस्लिम-बहुल देश है। वहाँ इस्लामी जीवनशैली अभिवादन, नमाज़, त्योहारों, खान-पान, पारिवारिक जीवन और सामाजिक व्यवहार में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसके साथ ही सदियों पुरानी सांस्कृतिक परतें भी पूरी मजबूती से जीवित हैं। वे लोगों के नामों, लोककथाओं, मंदिरों, पारंपरिक नृत्यों, गाँवों की जीवनशैली, बड़ों के प्रति सम्मान, जावानीस शिष्टाचार, बाली की धार्मिक परंपराओं और समुद्री संपर्कों से आए विविध सांस्कृतिक प्रभावों में दिखाई देती हैं।
मुझे यही बात हमेशा सबसे अधिक "इंडोनेशियाई" लगी। वहाँ अतीत और वर्तमान को अलग-अलग खानों में नहीं बाँटा जाता। बल्कि विभिन्न ऐतिहासिक परतों को एक साथ, स्वाभाविक रूप से, दैनिक जीवन का हिस्सा बनने दिया जाता है। मैंने यह भावना लोगों के नामों—देवी, पुत्री, इंद्र, विष्णु और सूर्य—में देखी है। मैंने इसे जावा में रामायण के मंचन के दौरान महसूस किया, जहाँ कथा भारत से उत्पन्न होती है, लेकिन उसका संगीत, उसकी गति, उसकी रंग-सज्जा और उसका वातावरण पूरी तरह इंडोनेशिया का होता है।
मैंने इसे बाली में देखा, जहाँ भारत से आया व्यक्ति परिचित मंत्र तो सुन सकता है, लेकिन पूजा-पद्धति, चढ़ावे, मंदिरों का दैनिक जीवन और सामुदायिक अनुशासन उसे एक बिल्कुल नया अनुभव देते हैं। मैंने इसे जकार्ता में भी महसूस किया, जहाँ भारतीय भोजन, भारतीय फ़िल्में, योग, आयुर्वेद, व्यापार, शिक्षा और भारतीय परिवारों के नेटवर्क सहज रूप से इंडोनेशियाई समाज की बहासा भाषा, स्थानीय शिष्टाचार, अपनापन और मेहमाननवाज़ी के साथ घुल-मिल जाते हैं।
जुलाई में भारत से इंडोनेशिया की यात्रा भी मुझे इसी जीवंत परंपरा का हिस्सा प्रतीत होती है। मेरे लिए यह केवल एक आधिकारिक या व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक संबंध को फिर से महसूस करने का अवसर है जिसे मैंने वर्षों तक अपने दैनिक जीवन में अनुभव किया है। जब मैं पहली बार एक सामान्य भारतीय पेशेवर के रूप में इंडोनेशिया पहुँचा, तब सबसे पहले जिस चीज़ ने मुझे चुनौती दी, वह थी मेरी अपनी कार्यशैली। मैं भारत की उस कार्यसंस्कृति के साथ आया था जहाँ जल्दी प्रश्न पूछना, जल्दी निर्णय लेना, तुरंत फ़ॉलो-अप करना और यह मान लेना कि यदि मुझे कोई बात स्पष्ट है तो वह दूसरों को भी तुरंत स्पष्ट हो जानी चाहिए, एक सामान्य आदत है।
इंडोनेशिया ने मेरी इस आदत का विरोध नहीं किया। उसने केवल मुझे धैर्य का महत्व सिखाया। वहाँ अधिकांश बातचीत एक कप चाय से शुरू होती थी। कई अनौपचारिक मुलाकातों और छोटी-छोटी चर्चाओं के बाद जाकर कोई निर्णय सामने आता था। यहाँ तक कि "हाँ" कहने में भी समय लिया जाता था। "नांती" अर्थात "बाद में" का अर्थ परिस्थिति के अनुसार कई अलग-अलग बातें हो सकती थीं।
शुरुआत में यह सब मुझे बेचैन करता था। मुझे लगता था कि काम धीमा हो रहा है। लेकिन धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि लोग मेरी कार्यक्षमता की परीक्षा नहीं ले रहे थे। वे यह देख रहे थे कि क्या मुझ पर भरोसा किया जा सकता है, क्या मैं दूसरों की बात धैर्य से सुन सकता हूँ, और क्या मैं तब भी शांत रह सकता हूँ जब परिस्थितियाँ मेरे तय किए हुए समय के अनुसार न चलें।
मेरी पहली ईद-उल-फ़ित्र के दौरान मैंने लोगों को एक-दूसरे से कहते सुना—"मोहोन माफ़ लाहिर दान बातिन" अर्थात "तन और मन से क्षमा चाहता हूँ।" इस वाक्य ने मुझे तुरंत जैन धर्म के प्रसिद्ध वाक्यांश "मिच्छामि दुक्कड़म" की याद दिला दी, जिसका अर्थ है—यदि मैंने जानबूझकर या अनजाने में किसी को दुख पहुँचाया हो, तो उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।
दोनों की भाषा अलग थी। धार्मिक परंपराएँ अलग थीं। किंतु उनके पीछे छिपी मानवीय भावना बिल्कुल एक जैसी थी। मैंने देखा कि लोग अपने परिवारों के साथ बुज़ुर्गों से मिलने जाते हैं, भोजन लेकर पहुँचते हैं, क्षमा माँगते हैं, प्रेमपूर्वक बातचीत करते हैं और रिश्तों को अहंकार से ऊपर रखते हैं। यही मूल्य मैंने अपने भारतीय परिवारों और समाज में भी देखे थे—त्योहारों के अवसर पर, पारिवारिक मतभेदों के बाद और विशेष रूप से बुज़ुर्गों के प्रति उस मौन सम्मान में, जिसे किसी औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती।
इन्हीं छोटे-छोटे अनुभवों ने धीरे-धीरे मेरी पुस्तक "सब्र, सांबल और सर्वाइवल" का आधार तैयार किया। आज जब मैं भारत और इंडोनेशिया के संबंधों के बारे में सोचता हूँ, तो मुझे उनका वास्तविक स्वरूप किसी सरकारी दस्तावेज़ या औपचारिक घोषणा में नहीं, बल्कि इन्हीं छोटे मानवीय क्षणों में दिखाई देता है।
वह तब दिखाई देता है जब कोई भारतीय किसी इंडोनेशियाई परिवार के घर में प्रवेश करने से पहले सम्मानपूर्वक बहासा भाषा के कुछ शब्द सीखने का प्रयास करता है। वह तब दिखाई देता है जब कोई इंडोनेशियाई मित्र बिना किसी विदेशी को असहज महसूस कराए अपने स्थानीय रीति-रिवाज़ धैर्यपूर्वक समझाता है।
वह तब दिखाई देता है जब एक ही भोजन की मेज़ पर भारतीय व्यंजनों के साथ इंडोनेशिया का प्रसिद्ध सांबल भी रखा होता है और दोनों बिल्कुल स्वाभाविक लगते हैं। वह तब दिखाई देता है जब किसी त्योहार की शुभकामना में क्षमा, विनम्रता और आत्मीयता की वही भावना होती है जिसे मैंने अपने देश में किसी दूसरी भाषा में सुना था।
इंडोनेशिया ने मुझे लोगों को समझने का एक नया दृष्टिकोण दिया। उसने मुझे सामाजिक संबंधों, सम्मान, हास्य, भोजन, आस्था, परिवार, भाषा और अपनत्व को देखने का नया तरीका सिखाया। भारत में मैंने बचपन से एक कहावत सुनी थी—"सब्र का फल मीठा होता है।"
इंडोनेशिया में रहने के बाद मैंने इस कहावत का अर्थ नए ढंग से समझा। वहाँ धैर्य पर भाषण नहीं दिए जाते। वहाँ धैर्य एक कप चाय के साथ आता है। वह शांत प्रतीक्षा में आता है। परिवार के साथ बैठने में आता है। साझा भोजन में आता है। मुस्कान में आता है। कभी-कभी थोड़ा-सा सांबल भी उसके साथ होता है। और जब तक वह आपके जीवन का हिस्सा बनता है, तब तक वह केवल मीठा नहीं रह जाता— उसमें जीवन का पूरा स्वाद समा जाता है।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार पूर्णतः लेखक के निजी विचार हैं।)
सौजन्य: WION