डॉलर कमाने की चाह में विदेशों में भारी निवेश कर रहे भारतीय

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 04-07-2026
Indians are investing heavily abroad in the pursuit of earning dollars.
Indians are investing heavily abroad in the pursuit of earning dollars.

 

राजीव नारायण

भारतीय निवेशकों के सोचने और पैसा लगाने का तरीका बहुत तेजी से बदल रहा है। अब लोग सिर्फ अपने देश के बाजारों तक सीमित नहीं हैं। मुंबई के छोटे रिटेल निवेशकों से लेकर बड़ी कंपनियों के खजाने तक का पैसा अब विदेशी संपत्तियों में लगाया जा रहा है। इस समय करीब 29 अरब डॉलर की भारी भरकम रकम विदेशों में भेजी जा चुकी है। भारतीय निवेशक बैंकों की फिक्स डिपॉजिट पर मिलने वाले 6 से 7 फीसदी के मुनाफे या घरेलू शेयर बाजार के 8 फीसदी रिटर्न से आगे देख रहे हैं। वे विदेशी तकनीकी कंपनियों में मिलने वाले 15 फीसदी से ज्यादा के तगड़े फायदे की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।

भारतीय रुपए पर लगातार बन रहे दबाव और देश में 20 करोड़ से ज्यादा डीमैट खातों के खुलने ने इस पूरी तस्वीर को बदल दिया है।भारतीय धन का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस समय अमेरिका और यूरोप के बाजारों की तरफ जा रहा है। इस पूरे निवेश के पीछे अमेरिकी डॉलर की मजबूती और उसमें कमाई करने की चाहत सबसे बड़ी वजह है।

विदेशी बाजारों में भी तकनीक से जुड़े शेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई पर काम करने वाली कंपनियां, सेमीकंडक्टर बनाने वाले ग्रुप और डेटा पर आधारित नए स्टार्टअप सबसे पसंदीदा ठिकाने बन गए हैं। हर निवेशक चाहता है कि उसका पैसा सुरक्षित रहे, जोखिम कम हो और रिटर्न अच्छा मिले। भारतीय निवेशक भी ठीक यही कर रहे हैं। घरेलू बाजार के उतार चढ़ाव के बीच वे वैश्विक स्तर पर स्थिरता की तलाश कर रहे हैं।
डिजिटल ऐप्स के जरिए अब विदेशी बाजारों में निवेश करना बेहद आसान हो गया है. 

फिक्स डिपॉजिट की सुरक्षा बनाम शेयर बाजार का जोखिम

यह नया ट्रेंड दिखाता है कि भारतीय निवेशकों की सोच अब काफी परिपक्व हो चुकी है। दशकों से भारत में बचत करने वालों का नजरिया बेहद रूढ़िवादी और सतर्क रहा है। आम परिवारों के लिए बैंक की फिक्स डिपॉजिट यानी एफडी का मतलब था पक्का भरोसा और मानसिक शांति।

आज भी जब दुनिया में राजनीतिक तनाव बढ़ता है या बाजार में सुस्ती आती है तो देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एफडी ही सबसे सुरक्षित ठिकाना लगती है। ज्यादातर बैंकों में इस समय ब्याज दरें 6 से 7 प्रतिशत के आसपास हैं जो बिना किसी जोखिम के एक तय आमदनी दे देती हैं।

इसके उलट शेयर बाजार का मिजाज पूरी तरह से अनिश्चित होता है। दुनिया भर में चल रहे भू राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार होने वाले बदलाव और देश के भीतर खपत के बदलते पैटर्न ने निवेशकों को फूंक फूंक कर कदम रखने पर मजबूर किया है।

ऐसे माहौल में अगर किसी के शेयर पोर्टफोलियो को 8 फीसदी का सालाना रिटर्न भी मिल जाता है तो उसे काफी अच्छा माना जाता है। हालांकि इस रिटर्न के पीछे डूबने का खतरा हमेशा बना रहता है। लोग जानते हैं कि घरेलू इक्विटी बाजार में अचानक आने वाले उतार चढ़ाव और नकदी की कमी कभी भी नुकसान करा सकती है। इसी वजह से अब विदेशी निवेश की एंट्री हुई है।

उदारीकृत प्रेषण योजना और बदलता परिदृश्य

विदेशी निवेश की तरफ यह झुकाव पिछले दो सालों में बहुत साफ तौर पर उभरा है। भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि उदारीकृत प्रेषण योजना यानी एलआरएस के तहत वित्त वर्ष 2026 में विदेशी प्रेषण 29 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। इस योजना के तहत कोई भी आम भारतीय नागरिक एक साल में ढाई लाख अमेरिकी डॉलर तक की रकम वैध तरीके से विदेश भेज सकता है या वहां निवेश कर सकता है। पहले जो विदेशी निवेश सिर्फ बहुत अमीर परिवारों या बड़े कॉर्पोरेट घरानों तक सीमित था, वह अब देश के शहरी मध्यम वर्ग की मुख्यधारा की निवेश रणनीति का हिस्सा बन चुका है।

धन का प्रबंधन करने वाली वेल्थ मैनेजमेंट फर्मों और सलाहकारों का कहना है कि वैश्विक म्यूचुअल फंड, अमेरिका पर केंद्रित ट्रेडेड फंड और सीधे विदेशी शेयर खरीदने वाले प्लेटफॉर्म की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है। सॉफ्टवेयर कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और स्टार्टअप में काम करने वाले युवा पेशेवर इसमें सबसे आगे हैं।

इंटरनेट और नए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इस पहुंच को बहुत आसान बना दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वैश्विक बाजार में आई सुस्ती के बावजूद विदेशी पोर्टफोलियो ने हाल के समय में 12 से 15 प्रतिशत से ज्यादा का बेहतरीन रिटर्न दिया है।वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर की मजबूती भारतीय निवेशकों को आकर्षित कर रही हैi 

मुद्रा पर बढ़ता दबाव और रिजर्व बैंक की चुनौती

वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की जो नई लहर आई है, उसने पूरी दुनिया के व्यापार, काम करने के तरीके और संचार को बदल दिया है। अमेरिकी टेक दिग्गज और सेमीकंडक्टर बनाने वाली कंपनियां इस समय पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का केंद्र बन चुकी हैं। भारतीय निवेशक इस ऐतिहासिक बदलाव का हिस्सा बनना चाहते हैं। कॉर्पोरेट कंपनियां भी अपने वित्तीय संतुलन और रणनीतिक मजबूती के लिए डॉलर में अपनी संपत्तियां बनाना चाहती हैं।

हालांकि इस पूरे मामले का एक दूसरा पहलू भी है जो देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। जब भी बहुत बड़ी मात्रा में पैसा देश से बाहर जाता है तो विदेशी मुद्रा यानी डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है। इस समय दुनिया भर के संकटों के बीच डॉलर हर किसी के लिए सबसे सुरक्षित निवेश बना हुआ है। इसका सीधा असर भारतीय रुपए जैसी उभरते बाजारों की मुद्राओं पर पड़ता है। पिछले एक साल में रुपए की कीमत में जो गिरावट आई है उसके पीछे केवल देश के हालात जिम्मेदार नहीं हैं। बल्कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दाम, विदेशी पूंजी का बाहर जाना और महंगाई जैसी बड़ी वजहें भी काम कर रही हैं।

यह स्थिति देश के नीति निर्माताओं के लिए एक बहुत ही नाजुक संतुलन बनाने जैसी है। भारत खुद को एक बड़ी आर्थिक ताकत बनाना चाहता है। ऐसे में वह अपने नागरिकों या कंपनियों को वैश्विक स्तर पर हाथ पैर फैलाने से नहीं रोक सकता। लेकिन अगर देश का पैसा लगातार इसी तरह बाहर जाता रहा तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा। इससे महंगाई को काबू में करना मुश्किल हो जाता है और रुपए में कमजोरी आने से देश के लिए आयात होने वाला सामान और कच्चा तेल बहुत महंगा हो जाता है।

रोकने की जगह अवसर देने की जरूरत

भारतीय रिजर्व बैंक इस समय महंगाई को काबू में रखने, आर्थिक विकास को रफ्तार देने और मुद्रा बाजार में बहुत ज्यादा उतार चढ़ाव को रोकने के लिए लगातार काम कर रहा है। आरबीआई का मकसद हर कीमत पर रुपए को गिरने से बचाना नहीं है। वह सिर्फ यह सुनिश्चित करना चाहता है कि बाजार में कोई अफरा तफरी न मचे और बदलाव की प्रक्रिया पूरी तरह से नियंत्रण में रहे।

हमें यह भी समझना होगा कि भारतीयों का विदेश में निवेश करना देश की किसी कमजोरी को नहीं दिखाता है। यह असल में भारतीय निवेशकों की बढ़ती समझ, उनकी परिपक्वता और वैश्विक स्तर पर उनके बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक है। विदेशी निवेश करने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि लोग अपने देश से मुंह मोड़ रहे हैं।

ज्यादातर समझदार निवेशक अपने कुल पैसे का एक छोटा हिस्सा ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लगा रहे हैं ताकि उनका पोर्टफोलियो संतुलित रहे। भारत आज भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। देश में मौजूद मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचा, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की महत्वाकांक्षाएं और युवाओं की बड़ी आबादी लंबी अवधि में विकास की गारंटी देती है।

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नीति निर्माताओं के सामने असली चुनौती विदेशी निवेश को डराकर या नियम बनाकर रोकने की नहीं है। चुनौती यह है कि भारत के भीतर निवेश के माहौल को इतना शानदार, पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जाए कि न सिर्फ विदेशी पूंजी बल्कि भारत का अपना पैसा भी यहीं रुका रहे और बाहर गया पैसा वापस लौट आए।

इसके लिए सिर्फ बड़े नारे लगाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए हमें अपने देश के भीतर रेगुलेटरी सिस्टम को बेहतर करना होगा। नियमों में बार-बार बदलाव को रोकना होगा और कॉरपोरेट गवर्नेंस को बहुत मजबूत बनाना होगा। मजबूत और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्थाएं वे नहीं होतीं जो पैसे को बाहर जाने से रोकने के लिए दीवारें खड़ी करती हैं। बल्कि वे होती हैं जो निवेशकों को अपने घर में ही सबसे बेहतरीन अवसर देती हैं।

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