साकिब सलीम
1872की शुरुआत का वह दौर भारत में ब्रिटिश हुकूमत के लिए एक बड़ा झटका लेकर आया था। अंडमान की सेल्युलर जेल में एक ऐसी घटना घटी जिसने लंदन तक को हिला कर रख दिया। भारत के वायसराय लॉर्ड मेयो की चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्या करने वाले शख्स का नाम शेर अली अफरीदी था। अंग्रेजों ने तुरंत इस मामले पर पर्दा डालना शुरू किया। उन्होंने शेर अली को एक अकेला और सिरफिरा अपराधी घोषित कर दिया।
ब्रिटिश सरकार के अनुसार इस हत्या के पीछे कोई राजनीतिक साजिश नहीं थी। लेकिन इतिहास के पन्ने और खुद अंग्रेजों के दस्तावेज एक अलग ही कहानी बयां करते हैं। यह कहानी सीधे तौर पर बिहार के पटना और भारतीय राष्ट्रवाद से जुड़ी हुई है।
रॉबर्ट हेनरी इलियट ने 1872में अपनी एक किताब लिखी थी। इस किताब का नाम 'कंसर्निंग जॉन्स इंडियन अफेयर्स' था। इसमें इलियट ने इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से बात की है। वह इस आंदोलन को पूरी तरह खत्म करना चाहता था।
इलियट के लिखे शब्दों से साफ होता है कि शेर अली कोई अकेला हमलावर नहीं था। वह एक बहुत बड़े और संगठित नेटवर्क का हिस्सा था। अंग्रेज इस पूरे आंदोलन को 'वहाबीवाद' कहकर खारिज करते थे। उनके लिए यह सिर्फ एक धार्मिक कट्टरता थी। लेकिन असल में यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीयों का एक सोचा-समझा राजनीतिक संघर्ष था।

सर सैयद अहमद खान ने भी अंग्रेजों के इस वर्गीकरण का विरोध किया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि वहाबी शब्द अंग्रेजों की एक चाल है। ब्रिटिश सरकार हर उस मुसलमान को वहाबी कह देती थी जो उनके खिलाफ आवाज उठाता था। इस नाम के सहारे वे देशभक्तों को आम जनता की नजरों में चरमपंथी साबित करना चाहते थे। पटना इस पूरे आंदोलन का एक बहुत बड़ा केंद्र बनकर उभरा था।
गंगा नदी के किनारे बसा पटना शहर कलकत्ता से करीब चार सौ मील दूर था। इलियट के मुताबिक अंग्रेजों की नजर में यह भारत का सबसे खतरनाक इलाका बन चुका था। 1857की क्रांति के समय पटना के कमिश्नर विलियम टेलर थे।
टेलर को खुफिया जानकारी मिल रही थी कि शहर के कुछ लोग गुप्त बैठकें कर रहे हैं। वे लोग अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़े विद्रोह की योजना बना रहे थे। टेलर ने चालाकी से काम लेने का फैसला किया। उसने सुरक्षा व्यवस्था पर चर्चा के बहाने अपने घर पर शहर के रईसों की एक बैठक बुलाई।
इस बैठक में तीन मुख्य संदिग्ध भी शामिल होने पहुंचे। इनमें आध्यात्मिक नेता मोहम्मद हुसैन, उनके शिष्य अहमद उल्लाह और मौलवी वाइज़ुल हक शामिल थे। टेलर ने इन तीनों को वहीं पर गिरफ्तार कर लिया।
इस गिरफ्तारी की वजह से 1857के गदर के दौरान पटना में कोई बड़ा विद्रोह नहीं हो सका। एक छोटा सा प्रयास हुआ भी तो उसे तुरंत दबा दिया गया। लेकिन इस कामयाबी के बाद भी अंग्रेजों ने टेलर के साथ अजीब बर्ताव किया। टेलर को गलत फैसला लेने के आरोप में पद से हटा दिया गया। उसके भारतीय डिप्टी मौला बुक्श को भी शहर से बाहर कर दिया गया।
पटना के नए कमिश्नर बनकर श्री सैमुअल्स आए। उन्होंने आते ही घोषणा की कि इन लोगों के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं। सैमुअल्स ने अहमद उल्लाह को जेल से रिहा कर दिया। इतना ही नहीं उन्हें पटना में एक सरकारी पद भी दे दिया गया।
अहमद उल्लाह कई सालों तक ब्रिटिश अधिकारियों के साथ बैठकों में हिस्सा लेते रहे। वह बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर और गवर्नर जनरल से भी मिले। अंग्रेज मान चुके थे कि अब स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है।
लेकिन यह शांति ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी। कैप्टन पार्सन्स नाम के एक अधिकारी पंजाब से सीधे इस नेटवर्क की जांच करने पहुंचे। उन्होंने नए सिरे से सबूत इकट्ठा किए। इसके बाद अहमद उल्लाह को दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया।
इस बार अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। बाद में इस सजा को बदलकर अंडमान की जेल में काले पानी की सजा कर दिया गया। अहमद उल्लाह को पोर्ट ब्लेयर भेज दिया गया। वहां पहुंचकर भी उनका प्रभाव कम नहीं हुआ। वह अंडमान में मौजूद सभी कैदियों के नेता बन गए।
लॉर्ड मेयो की हत्या की पटकथा इन्हीं घटनाओं के बीच लिखी जा रही थी। अहमद उल्लाह को सजा मिलने के बाद पटना के क्रांतिकारियों में भारी गुस्सा था। उन्होंने बदला लेने के लिए कई प्रयास किए। सबसे पहले पटना में सजा सुनाने वाले जज आइंसली पर हमला किया गया।
इसके बाद कलकत्ता में मुख्य न्यायाधीश नॉर्मन की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। नॉर्मन ने इन कैदियों की कुछ अपीलों को खारिज किया था। जब नॉर्मन के हत्यारे को पकड़ा गया तो अंग्रेजों ने उसके शव को दफनाने के बजाय जला दिया। इस घटना ने भारतीय मुसलमानों के गुस्से को और भड़का दिया।
लॉर्ड मेयो ने खुद इस अमानवीय कृत्य को अपनी मंजूरी दी थी। इतिहासकार मानते हैं कि वायसराय के इस फैसले ने उनकी खुद की मौत का रास्ता तैयार किया। पोर्ट ब्लेयर की जेल में बंद कैदियों का संपर्क भारत में बैठे अपने साथियों से कभी नहीं टूटा था। जेल के ढीले अनुशासन का फायदा उठाकर वे लगातार पत्र भेज रहे थे। अंग्रेजों को बाद में तलाशी के दौरान ऐसे कई पत्र मिले जो पटना से अंडमान भेजे गए थे।
जब शेर अली ने लॉर्ड मेयो पर हमला किया तो अंग्रेजों ने इसे निजी दुश्मनी का नाम दिया। लेकिन शेर अली द्वारा अपने चचेरे भाई अरसला खान को लिखा गया एक पत्र इस दावे को झुठलाता है। पत्र से पता चलता है कि शेर अली जेल में किसी बात से निराश नहीं था।
Sher Ali Afridi has a unique distinction as the only Indian to kill a Viceroy of British India. He killed "Lord Mayo" on 8th February 1872 in Andaman island while he was serving a life sentence and Viceroy was on official visit. (1/2)#AmritMahotsav #MainBharatHoon pic.twitter.com/RUa3zWhxTZ
— Amrit Mahotsav (@AmritMahotsav) March 11, 2023
उसे सरकार से जल्दी रिहाई की उम्मीद थी। एक व्यक्ति जो अपनी रिहाई की उम्मीद कर रहा हो वह निजी गुस्से में आकर वायसराय की हत्या नहीं करेगा। वह पूरी तरह से अपने संगठन के आदेश का पालन कर रहा था।
शेर अली का यह कदम किसी व्यक्तिगत सनक का नतीजा नहीं था। वह पटना के क्रांतिकारियों द्वारा शुरू किए गए स्वतंत्रता संग्राम की आखिरी कड़ी थे। अंग्रेजों ने पहले इस आंदोलन को दबाने की कोशिश की। जब वे नाकाम रहे तो उन्होंने नेताओं को दूर द्वीपों पर निर्वासित कर दिया। लेकिन आजादी की यह चिंगारी वहां भी नहीं बुझी।
सालों बाद अंग्रेजों को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने मौला बख्श को 'स्टार ऑफ इंडिया' के सम्मान से नवाजा। यह इस बात का सबूत था कि 1857में पटना को लेकर टेलर का अंदेशा बिल्कुल सही था।
इलियट ने अपनी किताब में लिखा था कि वह इस विद्रोह से जुड़े हर व्यक्ति को फांसी पर लटकते देखना चाहता था। वह उनकी संपत्तियां जब्त करना चाहता था। एक ब्रिटिश अधिकारी की यह घबराहट बताती है कि यह आंदोलन कितना मजबूत था।
अंग्रेज जिसे वहाबी आंदोलन कहकर बदनाम कर रहे थे वह असल में भारतीय राष्ट्रवाद का ही एक रूप था। शेर अली का वह एक वार ब्रिटिश साम्राज्य के अहंकार पर सीधा प्रहार था। इसने साबित कर दिया कि भारत के लोग अपनी आजादी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। पटना से शुरू हुआ यह संघर्ष अंडमान के समंदर को पार करके इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।