नूरुल हक/ अगरतला
त्रिपुरा की 22 महीने की मासूम बच्ची मनश्री चौधरी जिंदगी और मौत के बीच कठिन लड़ाई लड़ रही है। वह स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी यानी एसएमए जैसी दुर्लभ और गंभीर बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी के इलाज के लिए विदेश से आने वाले एक विशेष इंजेक्शन की जरूरत है जिसकी कीमत करीब 18 करोड़ रुपये बताई जा रही है। मनश्री का परिवार आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं है कि वह इतनी बड़ी रकम जुटा सके।
ऐसे समय में पूरे त्रिपुरा से जो तस्वीर सामने आई है, उसने यह साबित कर दिया कि इंसानियत की पहचान धर्म, जाति या आर्थिक स्थिति से नहीं बल्कि संवेदनशीलता और सहयोग की भावना से होती है। मनश्री की जिंदगी बचाने के लिए समाज के अलग अलग वर्ग आगे आए हैं। सामाजिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएं, धार्मिक संस्थान, आम नागरिक और युवा लगातार आर्थिक सहयोग जुटा रहे हैं। इसी अभियान में एक ऐसा उदाहरण सामने आया है जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

विशालगढ़ स्थित जमिया मदानिया दारुल उलूम मदरसा ने अपनी सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद मनश्री की मदद के लिए जो कदम उठाया, वह मानवता की एक प्रेरक मिसाल बन गया है। यह मदरसा किसी सरकारी अनुदान पर नहीं चलता। इसका संचालन समाज के लोगों के सहयोग और दान पर निर्भर है। यहां पढ़ने वाले अधिकांश छात्र गरीब परिवारों से आते हैं। कई छात्र ऐसे भी हैं जिनके सिर से माता पिता का साया उठ चुका है। सीमित संसाधनों के बीच पढ़ाई कर रहे इन बच्चों ने जब मनश्री की बीमारी के बारे में जाना तो उन्होंने अपनी छोटी छोटी बचत और भोजन के खर्च से पैसे बचाकर मदद करने का फैसला किया।
मदरसे के शिक्षकों ने भी इस अभियान में बराबर की भागीदारी निभाई। सभी ने मिलकर करीब 11 हजार रुपये का सहयोग जुटाया। इसके बाद डिजिटल भुगतान के माध्यम से यह राशि मनश्री के परिवार तक पहुंचाई गई। आर्थिक दृष्टि से यह रकम बहुत बड़ी नहीं कही जा सकती, लेकिन इसके पीछे छिपी भावना और त्याग ने इसे बेहद खास बना दिया। जमिया मदानिया दारुल उलूम के प्रधानाचार्य मौलाना अब्दुर रहमान का कहना है कि इस्लाम इंसान की जान बचाने को पूरी मानवता की रक्षा के बराबर मानता है। उन्होंने कहा कि यही शिक्षा उन्हें समाज के हर जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करने की प्रेरणा देती है। उनके अनुसार धर्म का असली उद्देश्य इंसानियत की रक्षा करना है। इसी सोच के साथ शिक्षकों और छात्रों ने अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग किया।

मौलाना अब्दुर रहमान ने मनश्री के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हुए कहा कि वह ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि बच्ची जल्द स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी सके। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में ऐसे अवसर बार बार नहीं आते जब हर व्यक्ति अपनी संवेदनशीलता को कर्म के रूप में बदल सके। इस पूरी पहल का सबसे भावुक पक्ष उन छात्रों की भूमिका है जो खुद आर्थिक अभाव में जीवन बिता रहे हैं। कई छात्रों के पास रोजमर्रा की जरूरतें भी सीमित हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी जेब खर्च और भोजन के लिए मिलने वाली छोटी राशि में से कुछ हिस्सा बचाकर एक अनजान बच्ची की जिंदगी बचाने के अभियान में योगदान दिया। यह त्याग बताता है कि मदद करने के लिए केवल धनवान होना जरूरी नहीं होता। सच्ची इच्छा और संवेदनशील मन सबसे बड़ी पूंजी होती है।

मनश्री चौधरी की बीमारी ने पूरे त्रिपुरा को एक साझा उद्देश्य से जोड़ दिया है। राज्य के अलग अलग हिस्सों से लोग लगातार आर्थिक सहयोग कर रहे हैं। कई सामाजिक संस्थाएं जागरूकता अभियान चला रही हैं ताकि अधिक से अधिक लोग इस बच्ची की मदद के लिए आगे आएं। मंदिरों, मस्जिदों और अन्य धार्मिक संस्थानों से भी सहयोग की अपील की जा रही है। इस अभियान में सभी समुदायों की भागीदारी सामाजिक एकता की मजबूत तस्वीर पेश करती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है जिसमें शरीर की मांसपेशियां धीरे धीरे कमजोर होने लगती हैं। समय पर इलाज नहीं मिलने पर यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है। इसलिए मनश्री के इलाज के लिए समय सबसे महत्वपूर्ण है। जितनी जल्दी आवश्यक राशि जुटेगी, इलाज शुरू होने की संभावना उतनी ही बढ़ेगी।
मनश्री का परिवार लगातार लोगों से सहयोग की अपील कर रहा है। परिवार का कहना है कि इतनी बड़ी रकम जुटाना उनके लिए संभव नहीं है। लेकिन जिस तरह समाज के अलग अलग वर्ग आगे आ रहे हैं, उससे उन्हें उम्मीद मिली है कि उनकी बेटी के इलाज का रास्ता निकल सकता है। विशालगढ़ के इस मदरसे की पहल आज केवल एक आर्थिक सहयोग की कहानी नहीं रह गई है। यह समाज को यह संदेश भी देती है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। जब किसी की जान बचाने की बात आती है तो पहचान, विचार और मतभेद पीछे छूट जाते हैं। आगे रह जाती है केवल मदद करने की भावना।
आज मनश्री चौधरी केवल अपने माता पिता की बेटी नहीं है। वह पूरे त्रिपुरा की उम्मीद बन चुकी है। उसके लिए उठने वाला हर सहयोग का हाथ यह साबित करता है कि समाज में करुणा और संवेदनशीलता आज भी जीवित है। जमिया मदानिया दारुल उलूम मदरसे के शिक्षकों और छात्रों ने अपने छोटे से योगदान से एक बड़ा संदेश दिया है कि किसी की जिंदगी बचाने के लिए करोड़ों रुपये नहीं, बल्कि सबसे पहले बड़ा दिल चाहिए। मनश्री के लिए चल रहा यह अभियान आने वाले समय में भी लोगों को प्रेरित करता रहेगा। यह घटना याद दिलाती है कि समाज तब मजबूत बनता है जब लोग एक दूसरे के दुख को अपना दुख समझते हैं। यही भावना किसी भी सभ्य समाज की सबसे बड़ी पहचान होती है।