पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और देशज पसमांदा समाज

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 12-05-2026
Chandrashekhar and indigenous Pasmanda society
Chandrashekhar and indigenous Pasmanda society

 

ffडॉ फैयाज अहमद फैजी

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जन्मशताब्दी के अवसर पर उन्हें याद करना केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि भर नहीं है,बल्कि उनके विचारों को पुनः जीवित करने का अवसर है। मुस्लिम समाज के प्रति उनका दृष्टिकोण आज के 'पसमांदा विमर्श' की तरह ही प्रगतिशील था। उन्होंने अल्पसंख्यकों की समस्या को केवल धार्मिक चश्मे से नहीं, बल्कि विकास, सामाजिक न्याय और वर्गीय असमानता के धरातल पर देखा। उनका मानना था कि मुस्लिम समाज को एक अखंड मोनोलिथ समूह मानने के बजाय उसके भीतर की आर्थिक और ढांचागत चुनौतियों को समझना अनिवार्य है।

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चंद्रशेखर जी का मानना था कि 1947के विभाजन ने भारतीय मुस्लिम समाज के भीतर एक बड़ी खाई पैदा की। वे स्पष्ट कहते थे कि विभाजन के समय मुस्लिम समाज का 'सम्पन्न वर्ग' (अशराफ़) तो पाकिस्तान चला गया, लेकिन गरीब और मेहनतकश मुसलमान (पसमांदा) यहीं रह गया।  पीछे छूटे हुए गरीब मुसलमानों के पास सत्ता के गलियारों में अपनी बात पहुँचाने के लिए कोई आवाज़ नहीं बची।

चाहे हिंदू हो या मुसलमान, देश के विकास का फल सम्भ्रांत वर्ग को ही मिलता है। मुस्लिम आबादी का विशाल भाग जो विभाजन के पहले शोषण का शिकार और गरीबी रेखा के नीचे था, वहाँ गरीबी अभी भी उसी स्थिति में है।यह अवलोकन केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक संरचना को समझने की कुंजी है।यह बात पसमांदा विमर्श के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे तौर पर मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद वर्गीय असमानता को पहचानती है और यह भी बताती है कि हर मुसलमान की स्थिति एक जैसी नहीं है।

चंद्रशेखर जी ने बड़ी सूक्ष्मता से इस बात को रेखांकित किया था कि मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा जिसे अब देशज पसमांदा कहा जाने लगा है,ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पारंपरिक उद्योगों से जुड़ा है।  चंद्रशेखर जी के अनुसार, ब्रिटिश शासन ने इन उद्योगों को बर्बाद किया, लेकिन स्वतंत्र भारत में भी इन्हें पुनर्जीवित करने के ठोस प्रयास नहीं हुए।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मुस्लिम समाज के भीतर जो कारीगर, श्रमिक और छोटे पेशेवर हैं, वे देश की आर्थिक रीढ़ का हिस्सा रहे हैं,ग्रामीण उद्योगों में अल्पसंख्यक श्रमिकों की भूमिका पर उनका ध्यान इस बात का प्रमाण है कि वे मुस्लिम समाज को समरूप इकाई नहीं मानते थे और इनके विभेद से भलीभांति परिचित थे और उन्हें केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि श्रम और उत्पादन की ताकत के रूप में देखते थे,वे मानते थे कि जब तक इन पारंपरिक उद्योगों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक सामाजिक न्याय और वास्तविक आर्थिक उत्थान का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।

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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने अल्पसंख्यक प्रश्न को केवल धार्मिक पहचान के दायरे में सीमित करने का विरोध किया। उनका मानना था कि किसी भी समुदाय की समस्याओं को सांप्रदायिक चश्मे से देखने के बजाय उसके आर्थिक, सामाजिक और मानवीय पक्ष को समझना अधिक जरूरी है।

वे बार-बार कहते थे कि “बात भावनाओं को समझने की है”, इसलिए पिछड़े और वंचित तबकों की आवाज़ को विद्रोह नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और सम्मान की न्यायपूर्ण मांग के रूप में देखा जाना चाहिए। चंद्रशेखर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि अल्पसंख्यकों के मामले को हमेशा धार्मिक मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि उसके आर्थिक और सामाजिक आयामों की उपेक्षा हुई।

यही दृष्टि उन्हें आज के पसमांदा विमर्श के अत्यंत करीब ले आती है, जो मुस्लिम समाज की समस्याओं को केवल “मुस्लिम बनाम गैर-मुस्लिम” नहीं, बल्कि “वंचित बनाम विशेषाधिकार प्राप्त” के संदर्भ में समझने की बात करता है। इस प्रकार चंद्रशेखर का दृष्टिकोण प्रतीकात्मक राजनीति से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय और संरचनात्मक परिवर्तन की राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है।

साथ ही वे अल्पसंख्यक प्रश्न को मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के दायरे में सीमित कर देने को उचित नहीं मानते थे। चंद्रशेखर की राजनीति कभी भी संकुचित तुष्टीकरण की मोहताज नहीं रही।इसका सबसे बड़ा प्रमाण खाड़ी संकट के दौरान देखने को मिला जब राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस, मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति और तत्कालीन 'अशराफ नेतृत्व' के भारी दबाव में इराक का पक्ष ले रही थी तब चंद्रशेखर ने संभावित राजनीतिक नुकसान और अपनी सरकार की अस्थिरता के खतरे के बावजूद अपेक्षाकृत संतुलित, विवेकपूर्ण और राष्ट्रहित केंद्रित रुख अपनाया।

यह निर्णय केवल विदेश नीति का सवाल नहीं था, बल्कि यह दर्शाता है कि वे किसी भी प्रकार के संकीर्ण पहचान-आधारित दबाव, विशेषकर राजीव गांधी और अशराफ नेतृत्व के प्रभाव, से परे देश और समाज हित मे सोचने की क्षमता रखते थे।यह वही दृष्टि है जो उनके अल्पसंख्यक संबंधी विचारों में भी दिखती है जहाँ वे पूरे समुदाय को एकसमान मानने के बजाय उसके भीतर के वंचित वर्गों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।उन्होंने अपने निर्णयों को किसी सांप्रदायिक दबाव से संचालित नहीं होने दिया ।

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चंद्रशेखर का दृष्टिकोण आज के पसमांदा विमर्श के लिए एक मजबूत वैचारिक आधार प्रदान करता है।गरीब मुसलमान, हाशिये के कारीगर, और नेतृत्व-विहीन समुदाय के बारे में उनकी चिंता दिखाती है कि वे भारत को बहुसंख्यक–अल्पसंख्यक के संकीर्ण फ्रेम में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की व्यापक भाषा में देखते थे। उन्होंने मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद असमानताओं को पहचाना और समाधान के लिए आर्थिक-सामाजिक न्याय का रास्ता सुझाया।

यही कारण है कि उनकी जन्मशती केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री की याद नहीं, बल्कि एक ऐसे लोकतांत्रिक विवेक की याद भी बनती है जो कहता है कि उपेक्षित समुदायों की तरक्की बिना आर्थिक बराबरी और सामाजिक सम्मान के संभव नहीं।

आज जब पसमांदा विमर्श भारतीय राजनीति में अधिक स्पष्ट और मुखर हो रहा है, तब चंद्रशेखर की बातें सिर्फ उद्धरण नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दिशा भी देती हैं। वे यह समझते थे कि समाज के निचले तबकों को चुप कराने से नहीं, उनकी पीड़ा को समझने और उनके साथ खड़े होने से देश मजबूत होता है। इसी वजह से चंद्रशेखर को पसमांदा-हितैषी सोच वाले नेताओं में गिना जा सकता है।

( लेखक अनुवादक स्तंभकार मीडिया पैनलिस्ट पसमांदा -सामाजिक कार्यकर्ताहैं)