कर्नाटक में हिजाब वापसी, असम में यूसीसी की तैयारी

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 14-05-2026
Return of Hijab in Karnataka, Preparations for UCC in Assam
Return of Hijab in Karnataka, Preparations for UCC in Assam

 

नई दिल्ली/बेंगलुरु/गुवाहाटी

भारत की राजनीति में बुधवार का दिन बेहद हलचल भरा रहा। देश के दो अलग-अलग कोनों से आई खबरों ने सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दे दी है। एक तरफ दक्षिण के राज्य कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने हिजाब पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। दूसरी तरफ पूर्वोत्तर राज्य असम की बीजेपी सरकार ने समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को हरी झंडी दे दी है। ये दोनों फैसले देश की बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं।

कर्नाटक: हिजाब पर से हटा प्रतिबंध

सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार ने साल 2022 के उस विवादित आदेश को वापस ले लिया है। पिछला आदेश बसवराज बोम्मई की भाजपा सरकार ने लागू किया था। उस आदेश ने शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनने पर प्रभावी रूप से रोक लगा दी थी। अब नई सरकार ने एक ताजा ड्रेस कोड जारी किया है। इसके तहत छात्र स्कूल यूनिफॉर्म के साथ अपने पारंपरिक और धार्मिक प्रतीक पहन सकेंगे।

यह नई नीति कक्षा 1 से लेकर कक्षा 12 तक के सभी छात्रों पर लागू होगी। इसे मौजूदा शैक्षणिक सत्र से ही प्रभावी माना जाएगा। नए दिशा-निर्देशों के अनुसार छात्र हिजाब के अलावा जनीवारा, रुद्राक्ष, शिवधारा और पगड़ी जैसे धार्मिक प्रतीक भी पहन सकते हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये प्रतीक स्कूल की निर्धारित ड्रेस के पूरक होने चाहिए।

सरकार ने इस फैसले को समावेशी विचारधारा से जोड़ा है। आदेश में 12वीं सदी के समाज सुधारक बसवेश्वर के सिद्धांत 'इवा नम्मवा' का जिक्र किया गया है। इसका अर्थ है कि वह हमारा ही है। प्रशासन ने स्कूलों और कॉलेजों को निर्देश दिया है कि किसी भी छात्र को अपमान या भेदभाव का सामना न करना पड़े।

असम: यूसीसी की राह पर आगे बढ़ी सरकार

जब कर्नाटक में हिजाब को लेकर आदेश जारी हो रहा था, उसी वक्त असम में एक अलग कानून की नींव रखी जा रही थी। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की कैबिनेट ने राज्य में समान नागरिक संहिता को लागू करने की मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री ने बताया कि यूसीसी विधेयक को 26 मई को नई विधानसभा के सामने रखा जाएगा।

यह फैसला सरमा सरकार के दूसरे कार्यकाल की पहली कैबिनेट बैठक में लिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह चुनाव के दौरान किए गए वादे को पूरा करने की दिशा में बड़ा कदम है। असम से पहले उत्तराखंड, गोवा और गुजरात जैसे राज्य इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। हालांकि असम सरकार ने इसे राज्य की जरूरतों के हिसाब से ढाला है।

असम के यूसीसी में एक बड़ा बदलाव जनजातीय आबादी को लेकर है। मुख्यमंत्री सरमा ने साफ किया कि राज्य की जनजातीय आबादी को इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है। उनकी परंपराओं और रीति-रिवाजों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। यह कानून मुख्य रूप से उत्तराधिकार, विवाह, लिव-इन रिलेशनशिप और तलाक के अनिवार्य पंजीकरण पर केंद्रित होगा।

तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

इन दोनों फैसलों पर राजनीति गर्माना तय था। कर्नाटक में विपक्ष के नेता और भाजपा नेता आर. अशोक ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस केवल 'वोट बैंक' की राजनीति कर रही है। उनके अनुसार यह मुसलमानों के अत्यधिक तुष्टिकरण का मामला है।

आर. अशोक ने पश्चिम बंगाल और केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदू विरोधी राजनीति करने वालों को जनता सबक सिखाती है। उन्होंने सिद्धारमैया सरकार को 'हिंदू विरोधी' करार दिया। उन्होंने दावा किया कि आने वाले दिनों में जनता इस सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाएगी।

वहीं असम में मुस्लिम समुदाय और विपक्ष के एक धड़े ने यूसीसी का विरोध शुरू कर दिया है। उनका तर्क है कि यह उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और निजी कानूनों पर हमला है। हालांकि सरकार का कहना है कि यह कानून सभी समुदायों के बीच समानता लाने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी है।

 

विवाद की जड़ें और भविष्य

हिजाब का मुद्दा पहली बार उडुपी के एक सरकारी कॉलेज से शुरू हुआ था। देखते ही देखते यह पूरे देश में एक बड़ा मुद्दा बन गया। इसके विरोध में कुछ छात्रों ने भगवा शॉल पहनना शुरू कर दिया था। अब नए आदेश में हिजाब और पगड़ी का तो स्पष्ट उल्लेख है लेकिन भगवा शॉल पर स्थिति साफ नहीं है। इससे शैक्षणिक संस्थानों में फिर से बहस छिड़ने की आशंका बनी हुई है।

असम में यूसीसी का भविष्य भी कानूनी चुनौतियों से भरा हो सकता है। जनजातीय आबादी को बाहर रखने का फैसला रणनीतिक माना जा रहा है। सरकार चाहती है कि स्थानीय जनजातियों में कोई असंतोष पैदा न हो। लेकिन विवाह और तलाक के पंजीकरण को अनिवार्य बनाना एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव होगा।

कर्नाटक और असम के ये फैसले बताते हैं कि भारत में धर्म और कानून के बीच का संतुलन कितना नाजुक है। कर्नाटक जहां व्यक्तिगत पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता को शिक्षा के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है। वहीं असम नागरिक अधिकारों में एकरूपता लाने के लिए कानून बना रहा है। ये दोनों ही मुद्दे आने वाले समय में देश की राजनीति के केंद्र में बने रहेंगे।

इन फैसलों का असर केवल इन दो राज्यों तक सीमित नहीं रहेगा। यह राष्ट्रीय स्तर पर धर्मनिरपेक्षता और समान कानून की बहस को और तेज करेगा। जनता इन बदलावों को किस रूप में लेती है यह भविष्य के चुनावों में साफ हो जाएगा। फिलहाल दोनों राज्यों की सरकारों ने अपनी राजनीतिक विचारधारा और चुनावी वादों की दिशा में एक बड़ा दांव खेल दिया है।