जब मुस्लिम शायरों के कलाम में जगमगाई दिवाली

Story by  फिरदौस खान | Published by  [email protected] | Date 08-11-2026
When Diwali shines in the poetry of Muslim poets
When Diwali shines in the poetry of Muslim poets

 

-डॉ. फ़िरदौस ख़ान 

दिवाली सिर्फ़ किसी एक धर्म विशेष का त्यौहार न होकर हिन्दुस्तान की साझी संस्कृति का एक अनूठा प्रतीक रही है। उर्दू, हिन्दी और खड़ी बोली के अनेक मुस्लिम शायरों और कवियों ने दिवाली की जगमगाहट, रौशनी, आतिशबाज़ी और बाज़ारों की रौनक़ परअसंख्य रचनाएं लिखी हैं। दरअसल मुस्लिम शायरों और कवियों ने दिवाली को एक सांस्कृतिक उत्सव के रूप में अपनाया और इससे उतना लगाव रखा, जितना उन्हें अपने त्यौहारों से रहा है।   

कार्तिक में मौसम सुहाना होना शुरू हो जाता है। दिन बहुत छोटे और रातें लम्बी होने लगती हैं। शामें भी ख़ूबसूरत हो जाती हैं। इस ख़ुशनुमा माहौल का ज़िक्र करते हुए शायर मोहम्मद सिद्दीक़ मुस्लिम कहते हैं-

छुप गया ख़ुर्शीद-ए-ताबां आई दीवाली की शाम

हर तरफ़ जश्न-ए-चराग़ां का है कैसा एहतिमाम

डेवढ़ियों पर शादयाने ऐश के बजने लगे

और रंगीं कुमकुमों से बाम-ओ-दर सजने लगे

इत्र-ओ-अंबर से हवा है किस क़दर महकी हुई

ख़ुशनुमा महताबियों से है फ़ज़ा दहकी हुई

फुलझड़ी से फूल यूं झड़ते हैं जैसे कहकशां

हर तरफ़ फैला फ़ज़ा में है पटाख़ों का धुआं

क्या मज़े की आतिश-अफ़्शानी है अग्नि-बान की

देखकर अश-अश करे जिसको नज़र इंसान की

हैं सितारों की ये लड़ियां या चराग़ों की क़तार

कूचा-ओ-बाज़ार के दीवार-ओ-दर हैं नूर-बार

बढ़ रहा है सूरत-ए-सैलाब लोगों का हुजूम

हर दुकां पर गाहकों का शोर-ओ-ग़ुल है बिल-उमूम

रौशनी बनकर ख़ुशी हर सम्त है छाई हुई

एक ख़िल्क़त जिसके जल्वों की तमाशाई हुई

उर्दू अदब में दिवाली के माहौल का जैसा जीवंत चित्रण नज़ीर अकबराबादी ने किया है, वैसा मिलना बहुत मुश्किल है। उन्होंने दिवाली और इनकी रौनक़ पर कई नज़्में लिखी हैं। वे कहते हैं-

हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का

हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का

सभी के दिल में समां भा गया दिवाली का

किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का

अजब बहार का है दिन बना दिवाली का

जहां में यारो अजब तरह का है ये त्यौहार

नज़ीर अकबराबादी ने अपनी रचनाओं में मिठाइयों, खिलौने, बताशे, इमरती, लड्डू आदि का बहुत बारीकी से ज़िक्र किया है। उनकी नज़्म देखें-

हमें अदाएं दिवाली की ज़ोर भाती हैं

कि लाखों झमकें हर एक घर में जगमगाती हैं

चिराग़ जलते हैं और लौएं झिलमिलाती हैं

मकां-मकां में बहारें ही झमझमाती हैं

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं

बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं

गुलाबी बर्फ़ियों के मुंह चमकते-फिरते हैं

जलेबियों के भी पहिये ढुलकते-फिरते हैं

हर एक दाँत से पेड़े अटकते-फिरते हैं

इमरती उछले हैं लड्डू ढुलकते-फिरते हैं

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं।

बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं...

शायर मजीद-उल-बक़री दिवाली की रात दीये जलाने और यादों के चिराग़ रौशन करने करने का ज़िक्र करते हैं। वे कहते हैं-

बीस बरस से एक तारे पर मन की जोत जगाता हूं

दिवाली की रात को तू भी कोई दिया जलाया कर

दिवाली का ज़िक्र उर्दू के मशहूर शायर हैदर बयाबानी की नज़्म के बिना अधूरा लगता है। यक़ीन न हो, तो उनकी नज़्म देखें-

यार से मिलने यार चले हैं

चारों जानिब धूम-धड़ाका

छोटे रॉकेट और पटाख़ा

घर में फुल-झड़ियां छूटे

मन ही मन में लड्डू फूटे

दीप जले हैं घर आंगन में

उजियारा हो जाए मन में

अपनों की तो बात अलग है

आज तो सारे ग़ैर भले हैं

दीवाली के दीप जले हैं

राम की जय-जय-कार हुई है

रावन की जो हार हुई है

सच्चे का हर बोल है बाला

झूटे का मुंह होगा काला

सच्चाई का डंका बाजे

सच के सर पर सहरा साजे

झूट की लंका ख़ाक बना के

राम अयोध्या लौट चले हैं

दीवाली के दीप जले हैं

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई

मिलकर खाएं यार मिठाई

भूल के शिकवे और गिले सब

हँसते गाते आज मिले सब

कहने को हर धर्म जुदा है

लेकिन सब का एक ख़ुदा है

इक माटी के पुतले 'हैदर'

इस साँचे में ख़ूब ढले हैं

दीवाली के दीप जले हैं...

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मशहूर शायर शकील बदायूंनी ने भी दिवाली पर दिलकश कलाम लिखा है। उनका गीत देखें-

आई दीवाली दीप जला जा

आई दीवाली दीप जला जा

ओ मतवाले साजना

ओ मतवाले साजना

घर-घर ऐसे दीप चमके जैसे चांद सितारे

घर-घर ऐसे दीप चमके जैसे चांद सितारे

आजा आजा खड़ी मैं पुकारूं साजन के द्वारे

आजा आजा खड़ी मैं पुकारूं साजन के द्वारे...

नाज़िम पानीपती ने भी दिवाली पर बहुत ख़ूबसूरत गीत लिखा है। गीत के बोल हैं-

आई है दिवाली सखि आई

सखि आई रे, आई है दिवाली

आज सखि री उजियारो ने

घर-घर ली अंगड़ाई रे

आज सखी री उजियारो ने

घर-घर ली अंगड़ाई रे

आई है दिवाली सखि आई...

दिवाली के बारे में वसीम बरेलवी कहते हैं-

दिवाली की रात आई है, तुम दीप जलाए बैठी हो 

मासूम उमंगों को अपने सीने से लगाए बैठी हो

नज़ीर बनारसी कहते हैं-

मिरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है

ये दिवाली है सबको जीने का अंदाज़ देती है

अज़्म शाकरी कहते हैं-

आज की रात दिवाली है दिये रौशन हैं

आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूं

डॉ. असलम इलाहाबादी कहते हैं-

तमन्नाओं की पामाली रहेगी

जलेंगे अश्क दिवाली रहेगी

एहसान दानिश कहते हैं-

रो रहा था गोद में अम्मा की इक तिफ़्ल-ए-हसीं

इस तरह पलकों पे आंसू हो रहे थे बे-क़रार

जैसे दिवाली की शब हल्की हवा के सामने

गांव की नीची मुंडेरों पर चराग़ों की क़तार

शहज़ाद अहमद कहते हैं-

जलते हैं इक चराग़ की लौ से कई चराग़

दुनिया तेरे ख़याल से रौशन हुई तो है

रहमान ख़ावर कहते हैं-

बुझा भी हो तो उजाला मिरी नज़र में रहे

कोई चराग़ तो ऐसा भी मेरे घर में रहे

हसन जमील कहते हैं-  

ये रौशनी यूं ही आग़ोश में नहीं आती

चराग़ बनके मुंडेरों पे जलना पड़ता है

शाकेब जलाली कहते हैं-

प्यार की जोत से घर-घर है चराग़ां वर्ना

एक भी शमा न रौशन हो हवा के डर से

मोहम्मद अल्वी कहते हैं-

खिड़कियों से झांकती है रौशनी

बत्तियां जलती हैं घर-घर रात में

उबैद आज़म आज़मी कहते हैं-

राहों में जान घर में चराग़ों से शान है

दीपावली से आज ज़मीन आसमान है

मुमताज़ गुर्मानी का अंदाज़े बयां भी कुछ कम नहीं है. वे कहते हैं-

मेले में गर नज़र न आता रूप किसी मतवाली का

फीका-फीका रह जाता त्यौहार भी इस दीवाली का