मंजर भोपाली की शायरी के 50 साल: भोपाल में सजी यादों और गज़लों की महफिल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 28-09-2026
50 Years of Manzar Bhopali’s Poetry: An Evening of Memories and Ghazals in Bhopal
50 Years of Manzar Bhopali’s Poetry: An Evening of Memories and Ghazals in Bhopal

 

अब्दुल वसीम अंसारी/ भोपाल

फ़िल्मों या किसी बड़े अभिनेता के सफर के 25 या 50 साल पूरे होने पर अक्सर भव्य जश्न देखने को मिलते हैं। सिनेमा जगत की यह परंपरा काफी पुरानी है। लेकिन अब यही अंदाज़ साहित्य और शायरी की दुनिया में भी अपनी जगह बना रहा है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में इसकी एक बेहद खूबसूरत बानगी देखने को मिली। मशहूर शायर मंजर भोपाली की शायरी के पचास वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर एक गरिमामयी अदबी जलसा आयोजित किया गया।

‘मोहब्बतों के 50 साल’ शीर्षक से आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्य, कला और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी कई प्रमुख हस्तियों ने शिरकत की। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, विधायक आरिफ मसूद, अजय सिंह 'राहुल भैया' सहित देश-प्रदेश की तमाम सियासी और अदबी शख्सियतों की मौजूदगी ने इस शाम को बेहद खास बना दिया।

मंजर भोपाली के इस पांच दशक लंबे सफर का जश्न महज़ एक सालगिरह का औपचारिक कार्यक्रम नहीं था। मंच पर गज़लें थीं, नज़्में थीं और पुराने दौर के आत्मीय रिश्तों की गर्माहट थी। यह एक ऐसे शायर की अनवरत साधना को सलाम करने का अवसर था, जिसने आधी सदी तक अपनी शायरी से भोपाल का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया।

‘मोहब्बतों के 50 साल’ बना जलसे का केंद्र

27 सितंबर को भोपाल में सजी इस महफिल का नाम ‘मोहब्बतों के 50 साल’ रखा गया था। यह नाम ही मंजर भोपाली के कलाम और उनके स्वभाव का मिज़ाज बयां करने के लिए काफी था।

कार्यक्रम में राजनीतिक दिग्गजों की मौजूदगी को लेकर जब चर्चाएं शुरू हुईं, तो खुद मंजर भोपाली ने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि इस आयोजन के पीछे कोई सियासी एजेंडा या खास मकसद नहीं था। यह शुद्ध रूप से उनकी आधी सदी की शायरी का जश्न था। मंच पर आने वाले तमाम मेहमानों से उनके निजी और दशकों पुराने संबंध हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की उपस्थिति पर मंजर भोपाली ने बताया कि उनसे उनका जुड़ाव सालों पुराना है। वहीं अजय सिंह राहुल भैया के परिवार से भी उनके तीन पीढ़ियों के संबंध रहे हैं। विधायक आरिफ मसूद और आतिफ अकील को उन्होंने अपने छोटे भाइयों और करीबियों की तरह बताया, जो हर सुख-दुख में साथ खड़े रहते हैं।

 

शायरी के बहाने रिश्तों का समागम

 

अदबी दुनिया की महफिलों का रंग हमेशा जुदा होता है। यहाँ मंच पर बैठा हर इंसान सिर्फ एक मेहमान नहीं होता, बल्कि उसके साथ बीते दिनों की यादें और पुरानी दोस्ती का सिलसिला भी जुड़ा होता है।

मंजर भोपाली की इस ऐतिहासिक शाम में शायरी के साथ-साथ इन्हीं आत्मीय रिश्तों की छाप दिखाई दी। यहाँ पुराने साथियों का ज़िक्र हुआ और नई पीढ़ी के लिए उर्दू अदब की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने की सीख भी मिली। देश भर से आए बड़े शोरा-ए-किराम के साथ-साथ भोपाल के स्थानीय शायरों को भी इस मंच पर पूरा सम्मान मिला, जो इस कार्यक्रम की एक बड़ी खासियत रही।

मंच पर गूंजे नामचीन शायरों के कलाम

मंजर भोपाली के 50 सालों के इस यादगार सफर पर आयोजित मुशायरे में देश के कई मशहूर और नामचीन शायरों ने हिस्सा लिया। डॉ. नवाज देवबंदी, इकबाल अशहर, ज़फर सहबाई, जौहर कानपुरी, महशर आफरीदी, डॉ. सुनील पवार, डॉ. तारिक कमर, शबीना अदीब, डॉ. अंजुम बाराबंकवी और हिमांशी बाबरा जैसे दिग्गज मंच की शोभा बने।

इन शायरों की मौजूदगी ने शाम को गज़लों और नज़्मों के विविध रंगों से सराबोर कर दिया। भोपाल के वरिष्ठ शायर ज़फर सहबाई और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डॉ. अंजुम बाराबंकवी ने जब अपना कलाम पढ़ा तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। वहीं स्थानीय और युवा शायरों ने भी अपनी गज़लों के माध्यम से मंजर भोपाली को मुबारकाबाद पेश की।

कार्यक्रम का सफल संयोजन और संचालन

किसी भी मुशायरे या अदबी जलसे की सफलता केवल शायरों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसे सूत्रबद्ध करने और मंच संचालन का तरीका भी उतना ही अहम होता है। भोपाल के साजिद रिजवी ने इस पूरे कार्यक्रम को बहुत खूबसूरती से एक लड़ी में पिरोया, जबकि मंच संचालन की कमान डॉ. महताब आलम ने संभाली। शायरी के अलग-अलग स्वादों और मिज़ाज के बीच संतुलन बनाए रखते हुए उन्होंने पूरी महफिल को देर रात तक बांधे रखा।

वरिष्ठ पत्रकार आरफा खानम शेरवानी की मौजूदगी

इस अदबी महफिल में देश की जानी-मानी पत्रकार और एंकर आरफा खानम शेरवानी की मौजूदगी भी विशेष चर्चा का केंद्र रही। जानकारी के अनुसार, वे मंजर भोपाली की शायरी के 50 साल पूरे होने के इस खास मौके पर अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए एक विशेष पॉडकास्ट करेंगी।

कार्यक्रम के दौरान आयोजकों की ओर से आरफा खानम शेरवानी का शॉल, श्रीफल, स्मृति चिह्न (ट्रॉफी) और सम्मान राशि भेंट कर अभिनंदन किया गया। इस उपस्थिति से कार्यक्रम का दायरा सिर्फ शायरी तक सीमित न रहकर साहित्य और पत्रकारिता के सुंदर संवाद में बदल गया।

भोपाल की सांस्कृतिक पहचान को नई दिशा

भोपाल की सरज़मीं हमेशा से उर्दू अदब, शायरी और फनकारों की सरपरस्ती के लिए जानी जाती रही है। यहाँ के मुशायरे और अदबी बैठकें हमेशा से शहर की फिज़ा का हिस्सा रहे हैं।मंजर भोपाली का यह 50 साल का जश्न इसी महान परंपरा की अगली कड़ी है।

पांच दशक का समय किसी भी रचनाकार के लिए बहुत बड़ा होता है। इस लंबे दौर में वक्त बदला, नस्लें बदलीं और ज़बान के तेवर भी बदले, लेकिन मंजर भोपाली का अपनी शायरी और ज़मीन से रिश्ता वैसा ही अटूट रहा। यह आयोजन भोपाल की इसी जीवंत सांस्कृतिक विरासत को एक बार फिर दुनिया के सामने मजबूती से रखता है।