-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब में तीज-त्यौहारों को मिलजुल कर मनाने की पुरानी रवायत रही है। दिवाली पर मन्दिरों के साथ-साथ दरगाहों में भी दीये जलाने की परम्परा इस बात का सबूत है। दरगाहों पर दिवाली मनाने की शुरुआत सूफ़ियों ने की थी।
सूफ़ी दर्शन में 'नूर' को बहुत ऊंचा रुतबा दिया गया है। कायनात की तख़लीक़ एक नूर से ही की गई है। तेहरवीं से चौदहवीं सदी के दौरान सूफ़ी संतों ख़ासकर चिश्तिया सिलसिले के हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह और उनके प्यारे मुरीद हज़रत अमीर ख़ुसरो रहमतुल्लाह अलैह ने हिन्दुस्तानी लोक-संस्कृति और रीति-रिवाजों को खुले दिल से अपनाया। इस तरह उन्होंने देश में गंगा-जमुनी तहज़ीब की शीतल धारा प्रवाहित की। इस साझा संस्कृति से हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे के क़रीब आए और उन्हें एक दूसरे की संस्कृति को जानने और समझने का मौक़ा मिला।
सूफ़ी संतों का आदर-सत्कार करने वाले बादशाहों ने भी हिन्दुस्तानी लोक संस्कृति को अपनाया। मुस्लिम शासनकाल के दौरान दिवाली को रौशनी के त्यौहार के रूप में मनाया जाता था। इसे 'जश्न-ए-चिराग़ां' का नाम दिया गया था। हुकूमत के निर्देश पर महलों, क़िलों, दरगाहों और सार्वजनिक स्थलों पर चिराग़ जलाए जाते थे।
सूफ़ी संतों की ख़ानकाहों और दरगाहों पर आने वाले ज़ायरीन अपनी अक़ीदत ज़ाहिर करने के लिए यहां चिराग़ रौशन किया करते थे, अगरबत्तियां जलाते थे, फूल और चादरें चढ़ाते थे, तबर्रुक के रूप में हलवा, खीर और मिठाइयां आदि बांटते थे। सूफ़ियों ने उनकी अक़ीदत को दिल से क़ुबूल किया। गुज़रते वक़्त के साथ यह सब सूफ़ी परम्परा का अटूट हिस्सा बन गया। सूफ़ी संतों की दरगाहों पर लगने वाला लंगर भी जनसेवा और ज़ायरीनों की अक़ीदत से जुड़ा हुआ है। ज़ायरीन भी अपनी मन्नतें पूरी होने पर लंगर लगाते हैं।
बहुत सी जगह मुस्लिम सूफ़ी संतों और हिन्दू संतों में गहरी दोस्ती रही। वे एक-दूसरे के तीज- त्यौहारों में शामिल होते थे। उन सूफ़ी संतों के दौर में शुरू हुई परम्परायें सदियों बाद भी उनके आस्तानों पर बादस्तूर जारी हैं।
दिवाली पर शाम ढलते ही दरगाह परिसरों में मिट्टी के दीयों को रौशन किया जाता है। जैसे-जैसे दीये रौशन होते हैं, उनकी झिलमिलाती लौ माहौल को ख़ुशनुमा बना देती हैं। इसके साथ-साथ मज़ार को गुलाब और बेला आदि के फूलों से सजाया जाता है। लोबान और अगरबत्तियां जलाई जाती हैं, जिनकी ख़ुशबू से परिसर महक उठते हैं। इस मौक़े पर मिठाइयां बांटी जाती हैं। लोग एक-दूसरे को दिवाली की शुभकामनाएँ देते हैं। दरगाह परिसरों में क़व्वालियां होती हैं, जिन्हें सुनकर ज़ायरीन झूम उठते हैं।
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
देश की राजधानी दिल्ली में स्थित हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह में सदियों से दिवाली मनाई जा रही है। दरगाह परिसर को बल्बों की झालरों से सजाया जाता है। दिवाली की रात में मिट्टी के दीये रौशन किए जाते हैं। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह के हिन्दू मुरीद दिवाली की रात में मिट्टी के दीये जलाते हैं। इसे ईद-ए-चिराग़ां कहा जाता है यानी ख़ुशी के दीये। इसके बाद वे मिठाइयां बांटते हैं और एक दूसरे को दिवाली की शुभकामनाएं देते हैं।

हाजी अली
महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई के वर्ली तट के समीप एक टापू पर स्थित सैयद हाजी अली शाह बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह परिसर में भी दिवाली पर ख़ूब रौशनी की जाती है। आपको हाजी अली के नाम से भी जाना जाता है। आप अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं। दिवाली पर दरगाह की ख़ूबसूरती देखने के क़ाबिल होती है. यहां की सफ़ेद रंग की मस्जिद भी रौशनी से दमक उठती है.
शेख़ सलाउद्दीन चिश्ती
महाराष्ट्र के पुणे में स्थित हज़रत शेख़ सलाउद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह परिसर में भी दिवाली पर दीये जलाए जाते हैं। हिन्दू श्रद्धालु दीये जलाकर मन्नतें मांगते हैं और मिठाइयां भी बांटते हैं। यह दरगाह भी साम्प्रदायिक सद्भाव की प्रतीक है।

ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती
राजस्थान के अजमेर में स्थित हज़रत ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह परिसर में भी दिवाली पर दीये रौशन करने की पुरानी परम्परा चली आ रही है। आप भी अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं। आपने हिन्दुस्तान में सूफ़ियों के चिश्तिया सिलसिले को फैलाया। क़ाबिले ग़ौर है कि ईरान के शहर चश्त के रहने वाले हज़रत इसहाक़ शामी रहमतुल्लाह अलैह ने यह सिलसिला शुरू किया था, जो अब दुनियाभर में फैल चुका है।

क़मरुद्दीन शाह
राजस्थान के झुंझुनूं ज़िले में स्थित हज़रत क़मरुद्दीन शाह रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह परिसर में भी दिवाली पर दीये जलाए जाते हैं। यह दरगाह भी गंगा जमुनी तहज़ीब की अनूठी मिसाल है।यहां के बाशिन्दों का कहना है कि हज़रत क़मरुद्दीन शाह रहमतुल्लाह अलैह की चंचलनाथ टीले के संत चंचलनाथ के साथ गहरी मित्रता थी। वे मिलकर एक-दूसरे के तीज-त्यौहार मनाया करते थे। अब भी यहां सभी तीज-त्यौहार मिलजुल कर मनाए जाते हैं।

देवा शरीफ़
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के देवा नामक क़स्बे में स्थित देवा शरीफ़ दरगाह में भी दिवाली पर ख़ूब रौशनी की जाती है। यह हाजी वारिस अली शाह रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह है। आप भी अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलादों में से हैं. आपके वालिद क़ुर्बान अली शाह रहमतुल्लाह अलैह भी जाने-माने औलिया थे।

किछौछा शरीफ़ दरगाह
उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर ज़िले के क़स्बे अशरफ़पुर किछौछा में सुल्तान सैयद मख़दूम अशरफ़ जहांगीर सेमनानी रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह परिसर में भी दिवाली पर दीये जलाए जाते हैं। उनका जन्म ईरान के सेमन में हुआ था। उन्होंने हिन्दुस्तान में चिश्तिया सिलसिले का प्रचार-प्रसार किया।
साबिर पाक
उत्तराखंड के रुड़की के कलियर शरीफ़ में हज़रत मख़दूम अलाउद्दीन अली अहमद रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह परिसर में भी दिवाली पर रौशनी की जाती है। आपको साबिर पाक और साबिर पिया कलियरी के नाम से भी जाना जाता है। दिवाली की रात में यह दरगाह रौशनी से दमक उठती है।

दावल शाह वली
मध्य प्रदेश के इंदौर में स्थित हज़रत दावल शाह वली रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह परिसर में भी दिवाली पर दीये जाले जाते हैं। उनके हिन्दू श्रद्धालु दिवाली की रात में यहां दीये जलाकर मन्नतें मांगते हैं। वे यहां मिठाइयां भी बांटते हैं। देशभर में ऐसी असंख्य दरगाहें हैं, जो दिवाली पर दीयों की रौशनी से जगमग हो उठती हैं। लोबान और अगरबत्तियों की ख़ुशबू से महकती दरगाहें हिन्दुस्तान की साझा संस्कृति का जीवंत प्रमाण हैं।
सूफ़ियों ने जनमानस को प्रेम, भाईचारे, सद्भाव और समभाव का संदेश दिया। उनके मुरीदों में सभी मज़हबों के मानने वाले लोग शामिल थे। वे अपने अक़ीदे के मुताबिक़ उनके दर पर हाज़िर होते थे और सबके साथ अपनी ख़ुशियां साझा करते थे। वे दिवाली पर ख़ानकाहों में मिट्टी के दीये जलाते थे। तभी से दिवाली पर दरगाहों में दीये जलाने की रवायत चली आ रही है।
(डॉ. फ़िरदौस ख़ान इस्लामी विदुषी, शायरा, कहानीकार, लेखिका, पटकथा लेखिका, निबंधकार, पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक हैं)