असम में हिंदू-मुस्लिम परिवारों की दिवाली, प्रेम और भाईचारे की रोशनी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 08-11-2026
Diwali among Hindu-Muslim families in Assam: A light of love and brotherhood
Diwali among Hindu-Muslim families in Assam: A light of love and brotherhood

 

मुन्नी बेगम / गुवाहाटी

दिवाली केवल दीये जलाने, घरों को रोशनी से सजाने और आतिशबाजी करने का त्योहार नहीं है। यह अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और दूरियों से निकटता की ओर बढ़ने का संदेश भी देता है। असम में कई ऐसे परिवार हैं, जिनकी जिंदगी इस संदेश को खूबसूरती से सामने रखती है। इन परिवारों में धर्म और आस्था अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन प्रेम, विश्वास और आपसी सम्मान ने उन्हें एक-दूसरे के करीब रखा है। उनके लिए दिवाली केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि परिवार के साथ खुशियां बांटने और रिश्तों को मजबूत करने का अवसर भी है।

असम के इन परिवारों की कहानियां बताती हैं कि धार्मिक पहचान अलग होने के बावजूद साथ रहने, एक-दूसरे की परंपराओं का सम्मान करने और त्योहारों की खुशियां साझा करने में कोई बाधा नहीं है।

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ऐसी ही एक मिसाल मशहूर माइम कलाकार मोइनुल हक और उनकी पत्नी डॉ. अंजना मोयी सैकिया का परिवार है। मोइनुल हक मुस्लिम हैं, जबकि उनकी पत्नी हिंदू परिवार से आती हैं। डॉ. अंजना ओडिसी और सत्त्रिया नृत्य की प्रतिष्ठित कलाकार होने के साथ गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में चिकित्सक भी हैं। दोनों ने अपने वैवाहिक जीवन में धार्मिक भिन्नताओं को कभी बाधा नहीं बनने दिया। आपसी समझ और सम्मान ने उनके रिश्ते को मजबूत बनाया है।

मोइनुल हक 1970 के दशक से मूक अभिनय यानी माइम कला से जुड़े हुए हैं। वर्ष 1991 में उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की पहली माइम संस्था 'माइम एकेडमी' की स्थापना की थी। इस कला में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें 2009 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

दूसरी ओर, डॉ. अंजना मोयी सैकिया ने प्रसिद्ध नृत्य गुरु केलुचरण महापात्र से ओडिसी नृत्य का प्रशिक्षण लिया है। सत्त्रिया नृत्य में भी उनकी विशेष पहचान है। गुवाहाटी में अपनी संस्था 'दर्पण डांस एकेडमी' के माध्यम से वह शास्त्रीय नृत्य परंपराओं के संरक्षण और प्रचार में योगदान दे रही हैं।

अपने घर में दिवाली मनाने के बारे में मोइनुल हक कहते हैं कि उनके परिवार में हर साल यह त्योहार पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। उनके लिए दिवाली किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। यह रोशनी का पर्व है, जो इंसान को अंधकार से निकलकर प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। वह मानते हैं कि इसका गहरा संदेश अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ना है।

दिवाली के दिन उनका परिवार पत्नी के रिश्तेदारों और परिजनों से मिलने जाता है। मिठाइयां और उपहार दिए जाते हैं। सभी लोग साथ बैठकर भोजन करते हैं और त्योहार की खुशियां साझा करते हैं। पटाखे भी जलाए जाते हैं। मोइनुल हक के अनुसार, किसी त्योहार को मनाना या न मनाना व्यक्तिगत निर्णय है, लेकिन उसकी खुशियों को दूसरों के साथ बांटना एक सुंदर अनुभव है।

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एल्विस अली हजारिका के घर ईद और दिवाली की रौनक

असम में सांप्रदायिक सद्भाव की एक और मिसाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले तैराक एल्विस अली हजारिका हैं। गुवाहाटी के भारलुमुख इलाके में जन्मे और पले-बढ़े एल्विस को बचपन से ही तैराकी का शौक था। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियां हासिल की हैं। वर्ष 2019 में कैटालिना चैनल पार करना उनके खेल जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है।

एल्विस ऐसे परिवार से आते हैं, जहां धार्मिक विविधता को हमेशा सम्मान मिला। उनके पिता अल्बान अली हजारिका और मां दीपिका अली हजारिका का भी अंतरधार्मिक विवाह हुआ था। इसी माहौल में पले-बढ़े एल्विस ने बचपन से ही अलग-अलग धर्मों और उनकी परंपराओं का सम्मान करना सीखा।

बाद में उन्होंने हिंदू परिवार से आने वाली प्रणमी से विवाह किया। दोनों के बीच धार्मिक मान्यताओं का अंतर कभी प्रेम और आपसी समझ के आड़े नहीं आया।

एल्विस इस्लाम की धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं। वह रमजान में रोजा रखते हैं, नमाज अदा करते हैं और जरूरतमंदों की सहायता करते हैं। इसके साथ ही वह हिंदू धार्मिक परंपराओं का भी सम्मान करते हैं। वह गुवाहाटी के ऐतिहासिक कामाख्या मंदिर और मां बगलामुखी मंदिर में दर्शन और प्रार्थना के लिए जाते हैं। उनकी पत्नी प्रणमी भी मां बगलामुखी मंदिर में पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में उनके साथ शामिल होती हैं।

उनके परिवार में ईद और दिवाली दोनों त्योहार समान उत्साह से मनाए जाते हैं। ईद पर परिवार के सदस्य एक साथ खुशियां बांटते हैं और रमजान के दौरान इफ्तार का आयोजन होता है। दिवाली पर घर दीयों और रोशनी से सज जाता है।

एल्विस का कहना है कि उन्हें दिवाली हमेशा से पसंद रही है। यह त्योहार हर घर में एक अलग खुशी लेकर आता है। उनके अनुसार, दिवाली की सबसे अच्छी बात यह है कि परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और दोस्त एक साथ आते हैं।

इससे रिश्तों में अपनापन बढ़ता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह त्योहार देश और दुनिया के लोगों के जीवन में शांति, स्वास्थ्य, खुशहाली और समृद्धि लेकर आए। साथ ही उन्होंने पटाखे जलाते समय सुरक्षा और दूसरों की सुविधा का ध्यान रखने की अपील भी की।

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उस्ताद अमजद अली खान के परिवार में भी साझा त्योहारों की परंपरा

असम से गहरा जुड़ाव रखने वाले विश्वप्रसिद्ध सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान और उनकी पत्नी सुभालक्ष्मी बरुआ खान का परिवार भी धार्मिक सद्भाव की सुंदर मिसाल है। सुभालक्ष्मी असम के एक प्रतिष्ठित बरुआ परिवार से आती हैं और भरतनाट्यम की कुशल नृत्यांगना हैं।

उन्होंने चेन्नई के कलाक्षेत्र में प्रसिद्ध नृत्य गुरु रुक्मिणी देवी अरुंडेल के मार्गदर्शन में लगभग 15 वर्षों तक प्रशिक्षण लिया। उस्ताद अमजद अली खान भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रमुख कलाकारों में शामिल हैं। संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।

दोनों की धार्मिक पृष्ठभूमि अलग है, लेकिन संगीत और कला के प्रति साझा लगाव ने उन्हें करीब लाया। उनके वैवाहिक जीवन में प्रेम, सम्मान और सांस्कृतिक समझ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

जिस तरह यह परिवार ईद मनाता है, उसी तरह दिवाली भी पूरे उत्साह से मनाई जाती है। इस वर्ष दिवाली की तैयारियों के बारे में सुभालक्ष्मी बरुआ खान ने बताया कि स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानियों के बावजूद उनके घर में त्योहार हमेशा की तरह मनाया जाएगा।

उनके अनुसार, त्योहार परिवार के लोगों को एक साथ बैठने और यादगार पल बिताने का अवसर देते हैं।यह परिवार इस बात का उदाहरण है कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का रिश्ता नहीं होता। इसके साथ दो परिवारों, संस्कृतियों और परंपराओं का भी जुड़ाव होता है।

शेहनाज और राहुल के लिए पहली दिवाली होगी खास

गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में फिजियोथेरेपिस्ट शेहनाज और उनके पति राहुल के लिए इस साल की दिवाली खास है। राहुल हिंदू परिवार से हैं, जबकि शेहनाज मुस्लिम परिवार से आती हैं। दोनों ने पिछले साल विवाह किया था।

शुरुआत में उनके रिश्ते को लेकर दोनों परिवारों में कुछ असहमति थी। हालांकि, समय के साथ परिवारों के बीच दूरियां कम हुईं और आपसी समझ बढ़ी।इस जोड़े के लिए इस बार की दिवाली इसलिए भी खास है, क्योंकि वे पहली बार अपने घर में साथ मिलकर यह त्योहार मनाएंगे। दोनों का पेशेवर जीवन व्यस्त रहता है। ऐसे में दिवाली की छुट्टी उन्हें परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने का अवसर दे रही है।

उन्होंने बताया कि वे अपने रिश्तेदारों और करीबी दोस्तों को घर बुलाने की योजना बना रहे हैं। उनके लिए यह केवल दिवाली का उत्सव नहीं, बल्कि परिवारों को करीब लाने और पुराने मतभेद पीछे छोड़कर नई शुरुआत करने का अवसर भी है।

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अफसाना बेगम के लिए दिवाली पति की यादों से जुड़ी

गुवाहाटी के मछखोवा इलाके की पूर्व निवासी अफसाना बेगम के जीवन में भी दिवाली का विशेष स्थान है। उनके दिवंगत पति शैलेंद्र कंवर दत्ता हिंदू परिवार से थे। अफसाना बचपन से दिवाली मनाती आ रही थीं, लेकिन हिंदू परिवार में विवाह के बाद इस त्योहार से उनका जुड़ाव और गहरा हो गया।

अफसाना बताती हैं कि शादी के बाद उन्होंने दिवाली को पहले से अधिक उत्साह के साथ मनाना शुरू किया। उनके पति को भी यह त्योहार बहुत पसंद था। आज वह उनके बीच नहीं हैं, लेकिन परिवार उनकी यादों और पुरानी परंपराओं को बनाए रखते हुए दिवाली मनाता है।

अफसाना के लिए यह त्योहार केवल खुशियां मनाने का अवसर नहीं है। यह अपने जीवनसाथी की यादों को संजोने और परिवार की साझा परंपराओं को आगे बढ़ाने का दिन भी है। वह कामना करती हैं कि दिवाली लोगों के जीवन से नकारात्मकता दूर करे और उन्हें प्रकाश, ज्ञान तथा सकारात्मकता की ओर ले जाए।

रोशनी से आगे, रिश्तों को जोड़ने का त्योहार

असम के इन परिवारों की कहानियां किसी एक त्योहार तक सीमित नहीं हैं। इनके भीतर भारतीय समाज की उस साझा संस्कृति की झलक मिलती है, जहां अलग-अलग धर्मों और परंपराओं के लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं।

मोइनुल हक और डॉ. अंजना मोयी सैकिया का रिश्ता हो, एल्विस अली हजारिका और प्रणमी का परिवार हो, उस्ताद अमजद अली खान और सुभालक्ष्मी बरुआ खान का जीवन हो या शेहनाज और राहुल की नई शुरुआत, हर कहानी अपने तरीके से प्रेम और सम्मान का संदेश देती है। अफसाना बेगम का अनुभव यह भी बताता है कि साझा त्योहार परिवार की यादों और परंपराओं को पीढ़ियों तक जीवित रखते हैं।

धर्म और पूजा के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन परिवार, प्रेम, अपनापन और खुशियों की चाह हर इंसान में समान होती है। दिवाली का असली संदेश भी शायद यही है कि रोशनी केवल अपने घर तक सीमित न रहे। वह दूसरों के जीवन में भी उम्मीद, विश्वास और खुशियां लेकर पहुंचे।