हिंदी प्रकाशन में नए प्रयोग, पेंगुइन भारतीय भाषाओं में आई तो वेस्टलैंड ने डिजिटल का थामा दामन

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  [email protected] • 2 Months ago
हिंदी के दिग्गज प्रकाशकों की हिंदी प्रकाशन पर बात
हिंदी के दिग्गज प्रकाशकों की हिंदी प्रकाशन पर बात

 

मंजीत ठाकुर

आमतौर पर चिंता जताई जाती है कि हिंदी में पाठक कम हो रहा है. लेकिन एक निजी समाचार चैनल आजतक के साहित्य समारोह में जुटे प्रकाशकों की राय थोड़ी जुदा है.

पाठक, लेखक और प्रकाशकों के साझा संवाद के एक सत्र में हिंदी जगत के चार दिग्गज प्रकाशकों ने मंच साझा किया. भारत सरकार के समर्थन से चल रहे नैशनल बुक ट्रस्ट की ओर से निदेशक युवराज मलिक, पेंगुइन-स्वदेश की संपादक वैशाली माथुर, वेस्टलैंड की एडिटर मीनाक्षी ठाकुर और प्रभात प्रकाशन के पीयूष कुमार शामिल थे.

बातचीत की शुरुआत बेशक लेखकों और प्रकाशकों के बीच दूरी को पाटने से शुरू हुई लेकिन अधिकतर प्रकाशकों की राय थी कि लेखक तयशुदा मापदंडों का पालन नहीं करते.

एनबीटी के निदेशक युवराज मलिक के मुताबिक, “किताबों की दुनिया के तीन तत्व होते हैं. एक तरफ प्रकाशक है बाकी दो कोणों पर पाठक और लेखक. पाठकों और लेखक को मिलाने का काम प्रकाशक करता है. इस एलिमेंट को हटा देने से पूरा का पूरा इकोसिस्टम ध्वस्त हो जाएगा.”

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उन्होंने किताबों की अहमियत और पढ़ाई-लिखाई के माहौल पर अलग से टिप्पणी देते हुए कहा कि भारत को विश्वगुरु इमारतों और बाकी चीजों के लिए नहीं मिली थी, बल्कि ज्ञान परंपरा की वजह से मिली थी और इसलिए पढ़ने-लिखने की संस्कृति बची रहेगी तो हम विश्वगुरु बनने की राह पर दोबारा चल सकते हैं.

प्रकाशन जगत में पेंगुइन-स्वदेश ने एक नई पहल की है और वह है भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य का दूसरी भारतीय भाषा में अनुवाद का. पेंगुइन-स्वदेश की संपादक वैशाली माथुर कहती हैं, “अनुवाद एक बहुत शानदार मौका होता है किसी एक भाषा के अच्छे साहित्य को दूसरी भाषा के पाठकों तक पहुंचाने का. जब हमने पेंगुइन में सभी क्लासिक्स का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया है और तब हमें महसूस हुआ कि भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशन को पेशेवर रुख अपनाए जाने की जरूरत है, जिससे यह पता चल सके कि सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं है जिसमें प्रकाशन कायदे का हो सकता है.”

माथुर ने प्रकाशन जगत में पेशेवर रुख अपनाने की वकालत करते हुए यह भी कहा कि बाजार उपलब्ध है पर असली समस्या उस बाजार में प्रोफेशनल तरीके से अपनी किताबें पेश करने की है.

उन्होंने कहा कि अंग्रेजी में प्रकाशित होते ही लेखकों को गौरव का अनुभव होता है लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद के जरिए प्रकाशित होने पर भी खुशी होनी चाहिए. गौरतलब है कि पेंगुइन-स्वदेश ने हाल ही में मराठी में प्रकाशन शुरू किया है.

इधर, हिंदी प्रकाशन जगत में पेंगुइन-स्वदेश के साथ दूसरे प्रयोग भी हो रहे हैं. वेस्टलैंड और प्रतिलिपि ने मिलकर आम लोगों को लेखन का मौका दिया है जो डिजिटल है और इसमें आम लोग लिखकर पाठक भी पा रहे हैं और कमाई का अच्छा जरिया भी है.

वेस्टलैंड की पब्लिशर मीनाक्षी ठाकुर कहती हैं, “हमें स्टार्टअप के साथ काम करने का मौका मिला, वह हमारे लिए आंखें खोलने वाला अनुभव रहा है.”

मीनाक्षी बताती हैं कि किताबों की पारंपरिक दुनिया में नए प्रयोग के साथ ही ऐप आधारित प्रकाशन को शुरू किया गया है. प्रतिलिपि ऐप पर बारह भाषाओं में 2.6 करोड़ से अधिक रोज पढ़ते हैं और रोजाना साठ से नब्बे मिनट की औसतन पढ़ाई लोग करते हैं.

मीनाक्षी कहती हैं, “प्रतिलिपि पर अधिकतर लोग कथा साहित्य पढ़ते हैं इसमें भी अपराध, फैमिली ड्रामा और सुपर नैचुरल जॉनर को तरजीह देते हैं. पारंपरिक प्रकाशन में बहुत बड़े लेखक की किताबें भी हिंदी में 10,000 से अधिक प्रतियां प्रकाशित नहीं होतीं. लेकिन प्रतिलिपि पर कोई गृहिणी हो या आम आदमी लिख सकता है. ऐसे उपन्यास भी हैं जिनकी पाठक संख्या 5 लाख हैं.”

पाठकों की यह संख्या बताती है कि हिंदी में रीडरशिप कम नहीं है. बदलते जमाने के साथ नए प्रयोग पारंपरिक प्रकाशन में भी हो रहे हैं, जिसमें पेंगुइन की भारतीय भाषाओं के अनुवाद की बड़ी पहल शामिल है तो दूसरी तरफ तकनीक के जहाज पर सवार नए किस्म का कॉन्टैंट भी है.

हालांकि, एनबीटी के निदेशक ने रोज पांडुलिपियों के आने की बात तो मानी पर उनकी शिकायत थी कि नई पीढ़ी की भाषा कई बार प्रकाशन योग्य नहीं होती और भाषायी तौर पर वह ऐसे ही शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जिनको मेसेजिंग टेक्स्ट कहा जाता है.

बहरहाल, हिंदी के दिग्गज प्रकाशकों ने एक सुर में कहा कि मौजूदा दौर हिंदी के लिए सुनहरा वक्त है जिसमें थोड़े पेशेवर रुख के साथ अच्छी किताबें पेश की जा सकती हैं, फॉर्मेट भले ही उनका छपी किताबों के रूप में हो या फिर डिजिटल रूप में.