आज जीवित कोई भी जीव ‘आदिम’ नहीं है, फिर भी कई जीवों को ऐसा क्यों कहा जाता है?

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 12-02-2026
No organism alive today is 'primitive', yet why are many organisms called so?
No organism alive today is 'primitive', yet why are many organisms called so?

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
हम मनुष्य लंबे समय से स्वयं को विकास (इवोल्यूशन) की पराकाष्ठा मानते रहे हैं। अन्य प्रजातियों को अक्सर “आदिम” या “प्राचीन” कहा जाता है और “उच्च” एवं “निम्न” जीव जैसे शब्दों का उपयोग किया जाता है।
 
मानव-केंद्रित इस दृष्टिकोण को 1866 में और बल मिला, जब जर्मन वैज्ञानिक अर्न्स्ट हैकेल ने जीवन-वृक्ष (ट्री ऑफ लाइफ) का एक प्रारंभिक चित्र बनाया, जिसमें “मनुष्य” को स्पष्ट रूप से शीर्ष पर दिखाया गया। इस चित्रण ने यह धारणा लोकप्रिय बनाई कि विकास का अंतिम लक्ष्य मनुष्य हैं।
 
आधुनिक विकासवादी जीवविज्ञान इस सोच को नकारते हैं। उनके अनुसार विकास में कोई पदानुक्रम नहीं है। आज जीवित सभी प्रजातियां-चिंपैंजी से लेकर बैक्टीरिया तक-एक-दूसरे की संबंधी हैं, जिनकी विकास-रेखाएं समान रूप से लंबी हैं; वे किसी की “पूर्वज” या “उत्तराधिकारी” नहीं हैं।
 
इसके बावजूद “आदिम” जैसी अवधारणाएं वैज्ञानिक पत्रिकाओं और विज्ञान पत्रकारिता में अब भी दिखाई देती हैं। मैंने अपनी नयी पुस्तक “अंडरस्टैंडिंग द ट्री ऑफ लाइफ” में लिखा है कि किसी भी वर्तमान प्रजाति को आदिम, प्राचीन या सरल कहना मूलतः भ्रामक है और विकास का इतिहास जटिल, गैर-पदानुक्रमित और परस्पर जुड़ा हुआ है।
 
अंडे देने वाले स्तनधारी मोनोट्रीम कहलाते हैं और उन्हें अक्सर “सबसे आदिम” जीवित स्तनधारी बताया जाता है। इस समूह में प्लैटिपस और चार प्रजातियों के इकिडना शामिल हैं। उनका अंडे देना एक प्राचीन विशेषता है, जो सरीसृपों में भी है।
 
लेकिन प्लैटिपस में कई विशिष्ट आधुनिक अनुकूलन यानी एडैप्टेशन भी हैं—जैसे तैरने के लिए जालीदार पैर और चोंच में विशेष इलेक्ट्रोरिसेप्टर, जो कीचड़ में शिकार का पता लगाते हैं। नर प्लैटिपस के पैरों में विषैले कांटे भी होते हैं।
 
इकिडना को भी अक्सर आदिम समझा जाता है, खासकर क्योंकि वे शिशु को जन्म नहीं देते लेकिन उनके पास सुरक्षात्मक कांटे, खोदने के लिए शक्तिशाली पंजे, संवेदनशील चोंच और लंबी चिपचिपी जीभ जैसी विशेषताएं हैं, जिनकी मदद से वे दीमक और चींटियों का शिकार करते हैं। दीमक के ढेर में भोजन खोजने की प्रतिस्पर्धा में इकिडना मनुष्य से कहीं बेहतर साबित होंगे।
 
ऑस्ट्रेलिया के अन्य स्तनधारी जैसे कंगारू, कोआला और वॉम्बैट, मार्सुपियल (थैलीदार स्तनधारी) हैं और वे भी कभी-कभी “आदिम” कहे जाते हैं। ये छोटे और कम विकसित शिशुओं को जन्म देते हैं, जो मां की थैली में विकसित होते हैं। हालांकि यह तरीका मनुष्य से अलग है, लेकिन इसके अपने फायदे हैं—जैसे कंगारू एक साथ विकास के अलग-अलग चरणों में तीन शिशुओं का पोषण कर सकते हैं।
 
विकास-वृक्ष (फाइलोजेनी) में मार्सुपियल या मोनोट्रीम को अक्सर नीचे या बाईं ओर दिखाया जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे अधिक प्राचीन या कम विकसित हैं।
 
ये वृक्ष संबंध दिखाते हैं, न कि श्रेष्ठता। जैसे आपका कोई दूर का चचेरा भाई आपसे “आदिम” नहीं होता, वैसे ही कोआला या इकिडना को भी केवल उनकी स्थिति के आधार पर आदिम कहना गलत है।
 
अक्सर इन वृक्षों का केंद्र प्लेसेंटल स्तनधारी (जैसे मनुष्य, प्राइमेट, मांसाहारी, कृंतक आदि) होते हैं, इसलिए तुलना के लिए कुछ मार्सुपियल प्रजातियों को शामिल किया जाता है।
 
मनुष्य को विकास का लक्ष्य मानना विकास प्रक्रिया की गलत समझ पैदा करता है। चूंकि विकास जीवविज्ञान की बुनियादी अवधारणा है, अत: यह दृष्टिकोण वैज्ञानिक अनुसंधान को भी प्रभावित कर सकता है।
 
उदाहरण के लिए, रीसस बंदर मनुष्यों से कैपुचिन बंदरों की तुलना में अधिक निकट संबंध रखते हैं, इसलिए मानव टीकों के प्रारंभिक परीक्षणों के लिए वे अधिक उपयुक्त माने जाते हैं।
 
ओपॉसम जैसे जीव अक्सर “आदिम” कहलाते हैं पर वे तंत्रिका-विज्ञान और वृद्धावस्था के अध्ययन में उपयोगी हैं क्योंकि वे हमसे दूर का संबंध रखते हैं, न कि इसलिए कि वे कम विकसित हैं।