नई दिल्ली।
भारत की सर्वोच्च अदालत ने एक अहम और संवेदनशील मुस्लिम तलाक़ मामले में हस्तक्षेप करते हुए आदेश दिया है कि मुस्लिम पति द्वारा अपनी निरक्षर पत्नी को दिया गया तलाक़-ए-हसन तत्काल प्रभाव से स्थगित रहे। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक तलाक़ वैध सिद्ध नहीं होता, पति-पत्नी को वैध रूप से विवाहित माना जाएगा। यह मामला केवल एक तलाक़ विवाद नहीं, बल्कि महिला अधिकार, मानवाधिकार और संवैधानिक सुरक्षा के महत्वपूर्ण सवालों को सामने लाता है।
मामला कर्नाटक की राजधानी बेलगावी से जुड़ा है, जहाँ 2021 में विवाहिता हेना की शादी हुई थी। हेना, जो एक गृहिणी हैं और निरक्षरता के कारण लिख- पढ़ नहीं सकती, ने कोर्ट में यह दावा किया कि उसके पति ने तलाक़-ए-हसन के माध्यम से उसे एकतरफा रूप से तलाक़ देने की कोशिश की। आरोपों के अनुसार, पति ने उसकी सहमति या हस्ताक्षर लेने के लिए अवैध तरीकों का इस्तेमाल किया और कभी न्यायालय में अपनी उपस्थिति नहीं दी।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमल्या बागची की बेंच ने की। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील एमआर शामशाद ने यह तर्क दिया कि तलाक़-ए-हसन मुस्लिम तलाक़ का मान्य तरीका है। इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अदालत तलाक़-ए-हसन को अमान्य नहीं कर रही है, बल्कि पति की गैर-हाजिरी और पत्नी द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों के कारण तलाक़ के क्रियान्वयन को रोकना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि पति द्वारा तलाक़ को साबित किया जाने तक दोनों पक्षों को वैध रूप से विवाहित माना जाएगा। अदालत ने संबंधित एसएचओ को निर्देश दिया कि वह पति की उपस्थिति सुनिश्चित करें और उसका पता लगाएं। चीफ जस्टिस ने कहा कि यह मामला संवेदनशील है क्योंकि इसमें मानव भावनाएँ और पारिवारिक जीवन सीधे जुड़े हुए हैं।
हेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी ने कोर्ट को बताया कि तलाक़ के लिए पति ने ईमेल, व्हाट्सएप और रजिस्टर्ड पोस्ट जैसे डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कोर्ट से यह अनुरोध किया कि जब तक संसद या विधायिका की ओर से कोई स्थायी कानून नहीं बनता, मुस्लिम महिलाओं को “अवैध तलाक़, प्रतिशोधात्मक आपराधिक कार्रवाई और पुलिस पक्षपात” से सुरक्षा देने के लिए मार्गदर्शन जारी किया जाए।
इस मामले के साथ एक और केस भी चल रहा है जिसमें तलाक़-ए-हसन को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के उल्लंघन के रूप में चुनौती दी गई है। यह दर्शाता है कि तलाक़-ए-हसन न केवल एक पारंपरिक प्रथा है, बल्कि यह आधुनिक भारतीय कानून और मानवाधिकार के संदर्भ में गंभीर बहस का विषय भी बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि तलाक़-ए-हसन की प्रक्रिया को अक्सर एकतरफा और न्यायिक प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। हेना के मामले में भी यही हुआ—पति ने तलाक़ देने के लिए गैर-कानूनी तरीके अपनाए, जबकि महिला को अपनी बात रखने का अधिकार सीमित था। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में न्याय की आवश्यकता अत्यंत संवेदनशील है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थता (मेडिएशन) का आदेश दिया। इसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कुरियन जोसेफ को सौंपा गया, ताकि पति-पत्नी के बीच समाधान निकाला जा सके। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जस्टिस जोसेफ चार सप्ताह के भीतर विवाद का निष्पादन करने का प्रयास करें। इस पहल से यह स्पष्ट संदेश गया कि तलाक़ मामले में केवल कानूनी प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि पारिवारिक और मानवीय दृष्टिकोण भी जरूरी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि यह मामला “थोड़ा संवेदनशील” है। चीफ जस्टिस ने कहा कि मानव भावनाओं से जुड़े मामलों में न्याय सिर्फ कानून तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उसमें सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। अदालत ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे जस्टिस जोसेफ से संपर्क करें और मध्यस्थता की तारीख तय करें।
हेना की ओर से अधिवक्ता डॉ. रिजवान अहमद ने अदालत को बताया कि पिछले आदेश के बावजूद, पति ने फिर से अवैध तरीके से तलाक़ देने की कोशिश की। इसे देखते हुए कोर्ट ने पहले से दिए गए तलाक़ के सभी आदेशों को रोकते हुए यह सुनिश्चित किया कि मध्यस्थता पूरी तरह से निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से हो।
हालांकि कोर्ट ने इस स्तर पर डिजिटल माध्यमों (व्हाट्सएप, ईमेल आदि) से तलाक़ पर अस्थायी रोक लगाने का आदेश नहीं दिया, लेकिन चीफ जस्टिस ने संकेत दिया कि भविष्य में उचित आदेश दिए जा सकते हैं। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यह मामला केवल कानून का नहीं, बल्कि भावनाओं और संवेदनशील मानवीय परिस्थितियों का मिश्रण है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से यह भी संदेश गया कि तलाक़-ए-हसन के माध्यम से महिलाओं को एकतरफा रूप से हानि नहीं पहुँचाई जा सकती। कानून केवल पारंपरिक प्रथाओं की पुष्टि नहीं करता, बल्कि आधुनिक समाज में महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित करता है।
इस मामले की सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शामशाद ने पति का पक्ष रखा, जबकि जयना कोठारी और डॉ. रिजवान अहमद ने हेना की ओर से उसके अधिकारों और सुरक्षा की बात उठाई। अदालत ने अंततः इस विवाद को हल करने के लिए मध्यस्थता का मार्ग चुना, जिससे पति-पत्नी के बीच वैध समाधान निकाला जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न केवल हेना के मामले के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि पूरे देश में मुस्लिम तलाक़ मामलों में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए मिसाल बन सकता है। यह मामला यह दर्शाता है कि कानून और मानवता का संतुलन बनाए रखना अत्यंत जरूरी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक़ केवल विधि की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक दृष्टि से भी निपटाया जाना चाहिए।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि तलाक़-ए-हसन की प्रक्रिया को किसी भी महिला के खिलाफ अवैध या अन्यायपूर्ण तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। यह आदेश महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, न्याय और संवैधानिक सुरक्षा के महत्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
इस मामले की सुनवाई और मध्यस्थता प्रक्रिया देश में मुस्लिम तलाक़ कानून, महिलाओं के अधिकार और मानवाधिकार के संदर्भ में एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण पेश करती है। यह न केवल कानूनी दृष्टि से बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अहम माना जाएगा।