कॉलेज छोड़ा, हौसला नहीं: कश्मीर की महिला बनी सफल उद्यमी

Story by  अर्सला खान | Published by  [email protected] | Date 12-02-2026
भेड़ पालन से आत्मनिर्भर बनीं मुमताज़ा बेगम
भेड़ पालन से आत्मनिर्भर बनीं मुमताज़ा बेगम

 

अर्सला खान/नई दिल्ली

उत्तर कश्मीर के बांदीपोरा जिले के वत्रीना गांव की रहने वाली 33 वर्षीय मुमताज़ा बेगम ने भेड़ पालन के ज़रिए अपनी ज़िंदगी को नई दिशा दी है। सीमित संसाधनों, सामाजिक चुनौतियों और कम उम्र में कॉलेज छोड़ने की मजबूरी के बावजूद मुमताज़ा ने हार नहीं मानी और आज वह इलाके की एक सफल महिला उद्यमी के रूप में पहचानी जाती हैं।
 
मुमताज़ा की कहानी उस संघर्ष की है, जिसमें हालात मुश्किल थे लेकिन हौसले मजबूत। आर्थिक परेशानियों के चलते उन्हें अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी, लेकिन बेहतर भविष्य का सपना कभी खत्म नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि उनके परिवार के पास पहले से ही 10 से 15 भेड़ें थीं, जिनका पालन पारंपरिक तरीके से किया जाता था। यहीं से उनके मन में भेड़ पालन को बड़े स्तर पर करने का विचार आया।
 
मुमताज़ा का सपना सिर्फ गुज़ारे तक सीमित नहीं था। वह इसे एक व्यवस्थित और सफल व्यवसाय बनाना चाहती थीं। इसी सोच के साथ उन्होंने बांदीपोरा के पशुपालन विभाग से संपर्क किया। विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने राज्य प्रायोजित सब्सिडी योजना ‘मिनी शीप फार्म’ के तहत आवेदन किया। फरवरी 2019 में उनका चयन हुआ और उन्हें 50 भेड़ों की यूनिट आवंटित की गई।
 
शुरुआत आसान नहीं थी। भेड़ पालन मेहनत और धैर्य का काम है, और अनुभव की कमी भी एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन मुमताज़ा ने हार नहीं मानी। लगातार मेहनत, सीखने की लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने धीरे-धीरे अपने काम को आगे बढ़ाया। समय के साथ उनका अनुभव बढ़ता गया और उनका फार्म भी फैलता चला गया।
 
मुमताज़ा अपनी सफलता का बड़ा श्रेय अपने परिवार, खासकर अपने पति को देती हैं। वह कहती हैं कि उनके पति हर कदम पर उनके साथ खड़े रहे। भावनात्मक सहयोग से लेकर काम में मदद तक, उनका समर्थन हमेशा बना रहा। मुमताज़ा का मानना है कि महिला उद्यमियों के लिए परिवार का सहयोग बहुत जरूरी होता है, खासकर तब जब उन्हें घर और काम दोनों की जिम्मेदारी निभानी हो।
 
 
अपने सफर में मुमताज़ा ने पशुपालन विभाग की भूमिका को भी अहम बताया। सही मार्गदर्शन, तकनीकी सलाह और सरकारी योजनाओं की जानकारी ने उन्हें कई मुश्किलों से उबरने में मदद की। विभाग की सहायता से वह अपने फार्म को बेहतर तरीके से चला सकीं और उत्पादन बढ़ा सकीं।
 
आज मुमताज़ा बेगम के पास 210 से अधिक भेड़ों का एक सफल फार्म है। वह सालाना 5 लाख रुपये से ज्यादा की शुद्ध आय अर्जित कर रही हैं। उनकी ज्यादातर भेड़ें ईद-उल-अज़हा के मौके पर बेची जाती हैं, जिससे उन्हें अच्छी आमदनी होती है। इस काम ने न सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति सुधारी है, बल्कि उन्हें आत्मसंतोष और आत्मविश्वास भी दिया है।
 
 
मुमताज़ा अब खुद को सिर्फ एक भेड़ पालक नहीं मानतीं, बल्कि वह दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बनना चाहती हैं। वह अपने अनुभव साझा कर महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उनका कहना है कि अगर महिलाएं उपलब्ध अवसरों का सही इस्तेमाल करें और खुद पर भरोसा रखें, तो वे अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति जरूर बेहतर बना सकती हैं।
 
 

 
मुमताज़ा कहती हैं कि मेहनत का असली सुख तब मिलता है, जब इंसान खुद को साबित करता है। उनके लिए भेड़ पालन सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान की राह है। बांदीपोरा की यह महिला आज यह साबित कर चुकी हैं कि सही सोच, मेहनत और सहयोग से कोई भी सपना हकीकत बन सकता है।