Gen Z बनाम Millennials: क्या वाकई घट रही है इंसानी बुद्धिमत्ता या बदल रही है उसकी परिभाषा?

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 09-02-2026
Gen Z vs. Millennials: Is human intelligence actually declining, or is its definition simply changing?
Gen Z vs. Millennials: Is human intelligence actually declining, or is its definition simply changing?

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

आज की दुनिया में पीढ़ियों के बीच सबसे तीखी और सबसे ज़्यादा गलत समझी जाने वाली बहसों में से एक बुद्धिमत्ता को लेकर है। सोशल मीडिया से लेकर यूनिवर्सिटी कैंपस, न्यूज़रूम से लेकर कॉर्पोरेट ऑफिस तक एक सवाल लगातार दोहराया जा रहा है—क्या Gen Z, Millennials से ज़्यादा स्मार्ट है या हम एक ऐसी पीढ़ी को देख रहे हैं जिसकी संज्ञानात्मक क्षमताएँ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। यह सवाल केवल व्यक्तिगत राय या पीढ़ीगत अहंकार का नहीं है, बल्कि डेटा, वैज्ञानिक रिसर्च और रोज़मर्रा के अनुभवों से जुड़ा हुआ है। Millennials एक ऐसे दौर में बड़े हुए जहाँ टेक्नोलॉजी मौजूद थी लेकिन सर्वव्यापी नहीं थी। जानकारी सीमित थी, इंटरनेट धीमा था और सोच, याददाश्त तथा फोकस जीवन के ज़रूरी कौशल माने जाते थे। इसके विपरीत Gen Z ने एक ऐसी दुनिया में जन्म लिया जहाँ हर सवाल का जवाब कुछ ही सेकंड में उपलब्ध है, जहाँ स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस सोच का विस्तार नहीं बल्कि उसका विकल्प बनते जा रहे हैं। इसी अंतर ने आज की बहस को जन्म दिया है।

एक कैज़ुअल वर्कप्लेस बातचीत के दौरान सुनी गई टिप्पणी—“ये Millennials तो बेवकूफ हैं, इन्हें कुछ नहीं पता”—भले ही मज़ाक में कही गई हो, लेकिन यह उस मानसिकता को उजागर करती है जो आज कई जगह देखने को मिलती है। यह एक ऐसा आत्मविश्वास है जो कभी-कभी पिछली पीढ़ियों को नज़रअंदाज़ करने की हद तक चला जाता है। सवाल यह है कि क्या यह आत्मविश्वास वास्तविक बौद्धिक श्रेष्ठता पर आधारित है या केवल डिजिटल युग में बड़े होने से पैदा हुआ भ्रम है। इस बहस को गंभीर रूप से लेने की वजह तब बनती है जब वैज्ञानिक डेटा भी इसमें शामिल हो जाता है। न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी होर्वथ के अनुसार Gen Z वह पहली पीढ़ी है जिसने ध्यान अवधि, याददाश्त, पढ़ने की क्षमता, गणितीय सोच, समस्या-समाधान और कुल IQ जैसे पैमानों पर अपने माता-पिता की तुलना में कम स्कोर किया है। यह दावा इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि यह दशकों से चले आ रहे Flynn Effect के उलट है, जिसके अनुसार हर नई पीढ़ी पिछली पीढ़ी से ज़्यादा बुद्धिमान होती गई थी। अगर यह ट्रेंड सही है, तो यह केवल एक पीढ़ी की बात नहीं बल्कि मानव संज्ञानात्मक विकास के पैटर्न में बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है।

इस संदर्भ में यह भी नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है कि आज की तकनीकी क्रांति, विशेष रूप से आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, किसी अचानक हुई छलांग का नतीजा नहीं है। इसकी नींव 20वीं सदी के महान वैज्ञानिक दिमागों ने रखी थी। न्यूटन, आइंस्टीन, बोहर और अन्य वैज्ञानिकों द्वारा स्थापित सिद्धांतों पर ही आज की अधिकांश तकनीक आधारित है। हिग्स बोसोन की खोज को छोड़ दिया जाए, तो पिछले चार दशकों में विज्ञान ने बहुत कम ऐसी खोजें दी हैं जिन्हें सभ्यता बदल देने वाला कहा जा सके। यह सवाल उठता है कि क्या हम वास्तव में नई खोजें कर रहे हैं या केवल पुराने विचारों को बेहतर ढंग से पैकेज कर रहे हैं। यह ठहराव उस समय और ज़्यादा चिंताजनक लगता है जब हम देखते हैं कि सोचने, पढ़ने और गहरे अवलोकन की आदतें लगातार कम हो रही हैं।

यह बदलाव केवल रिसर्च रिपोर्ट्स तक सीमित नहीं है, बल्कि घरों के भीतर भी साफ दिखाई देता है। Millennials के बचपन में लंबी बातचीत, बहस, चीज़ों को खुद से समझने और बिना बाहरी मदद के समस्याएँ सुलझाने की आदत आम थी। ध्यान लंबे समय तक बना रहता था और कल्पना सोच का अहम हिस्सा थी। इसके विपरीत Gen Z के लिए जवाब चाहिए तो सर्च है, स्पष्टता चाहिए तो AI है। जानकारी हमेशा उपलब्ध होने की वजह से याद रखने की ज़रूरत कम हो गई है। 23 साल की आयुषी उनियाल इस बदलाव को खुले तौर पर स्वीकार करती हैं और कहती हैं कि उनका दिमाग अब स्टोरेज डिवाइस नहीं बल्कि प्रोसेसिंग टूल की तरह काम करता है। कॉग्निटिव साइंटिस्ट इस प्रवृत्ति को memory outsourcing कहते हैं, जहाँ इंसान जानकारी याद रखने के बजाय उसे तुरंत एक्सेस करने की क्षमता पर निर्भर हो जाता है।

हालाँकि हर कोई इस बदलाव को गिरावट नहीं मानता। कुछ लोगों के लिए यह अनुकूलन है। 30 वर्षीय मिलेनियल शोभित त्यागी का मानना है कि समस्या IQ स्कोर की नहीं बल्कि संदर्भ की है। उनके अनुसार, अगर इंसानियत को आगे बढ़ना है तो नई पीढ़ियों को अलग तरह से सोचना ही होगा। वहीं 21 साल की मान्या चौहान मानती हैं कि डिजिटल टेक्नोलॉजी ने Gen Z को कमज़ोर नहीं बल्कि ज़्यादा जिज्ञासु और रचनात्मक बनाया है। उनके लिए स्क्रीन दीवारें नहीं बल्कि पुल हैं जो उन्हें दुनिया से जोड़ते हैं। इसी तरह 26 वर्षीय खुशी शर्मा इस बहस को संतुलित दृष्टिकोण से देखती हैं और कहती हैं कि जिसे अक्सर कम फोकस या ध्यान की कमी समझा जाता है, वह असल में cognitive flexibility हो सकती है। Gen Z एक ऐसी दुनिया में जी रही है जो लगातार बदल रही है, जहाँ जानकारी की मात्रा अभूतपूर्व है और अनिश्चितता स्थायी है। ऐसे माहौल में तेज़ी से सीखना, अनुकूलन करना और स्थापित प्रणालियों पर सवाल उठाना भी बुद्धिमत्ता का ही एक रूप है।

19 साल की गौरी तिवारी इस बात को स्वीकार करती हैं कि उनकी पीढ़ी में धैर्य की कमी है और टेक्नोलॉजी पर निर्भरता ज़्यादा है, लेकिन साथ ही वे रिस्क लेने से नहीं डरते और अपनी बात खुलकर रखते हैं। कई लोग यह भी मानते हैं कि Gen Z की असली ताकत भावनात्मक बुद्धिमत्ता, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और व्यक्तिगत सीमाओं को समझने में है। ये ऐसी क्षमताएँ हैं जिन्हें पारंपरिक IQ टेस्ट शायद पूरी तरह माप ही नहीं पाते। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि क्या Gen Z कम बुद्धिमान है, बल्कि यह है कि क्या हम आज भी बुद्धिमत्ता को पुराने पैमानों से मापने की कोशिश कर रहे हैं। डॉ. होर्वथ के निष्कर्ष चेतावनी देते हैं कि ध्यान घट रहा है, गहरी पढ़ाई कम हो रही है और याददाश्त बाहरी टूल्स पर निर्भर होती जा रही है, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि सोच के नए रूप उभर रहे हैं—तेज़ सिंथेसिस, मल्टीटास्किंग और सिस्टम-लेवल सोच।

इतिहास की सबसे बड़ी खोजें लगातार नोटिफ़िकेशन या त्वरित जवाबों से नहीं बल्कि धैर्य, गहरे अवलोकन और प्रकृति के साथ सक्रिय जुड़ाव से आई थीं। अगर भविष्य में मानव समझ को बदलने वाली कोई नई क्रांति आनी है, तो वह तभी संभव है जब तकनीक इंसान की सोच का विकल्प नहीं बल्कि उसका सहायक बने। इंटेलिजेंस अब सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ रही है। यह बदल रही है, रूप बदल रही है और शायद खुद को फिर से परिभाषित कर रही है। और ठीक इसी तरह, Gen Z और Millennials के बीच चल रही यह बहस भी अभी खत्म नहीं हुई है।

साभार: इंडिया टुडे