मलिक असगर हाशमी
हाल ही में दिल्ली के एक अस्पताल में चार अलग राज्यों के चार परिवारों ने एक दूसरे को अपनी किडनी दान की. इस अनोखे फोर वे किडनी ट्रांसप्लांट ने पूरे देश का ध्यान खींचा. जम्मू कश्मीर, दिल्ली, बिहार और नागालैंड के ये परिवार अलग अलग धर्मों के थे. उनके पास अपने डोनर तो थे लेकिन मेडिकल कारणों से वे सीधे एक दूसरे को किडनी नहीं दे पा रहे थे. इस मुश्किल समस्या का समाधान निकाला एक खास सॉफ्टवेयर ने. इस सॉफ्टवेयर का नाम है अलायंस फॉर पेयर्ड किडनी डोनेशन यानी एपीकेडी.
जब किसी मरीज के परिवार में डोनर तो होता है लेकिन ब्लड ग्रुप या एंटीबॉडी मैच नहीं होते, तब यह सॉफ्टवेयर उम्मीद की नई किरण बनता है. यह सिर्फ एक कंप्यूटर प्रोग्राम नहीं है. यह एक ऐसा वैश्विक नेटवर्क है जिसने अब तक दुनिया भर में बारह सौ से ज्यादा मरीजों को नया जीवन दिया है. आइए गहराई से समझते हैं कि एपीकेडी सॉफ्टवेयर क्या है, यह कैसे काम करता है और अंगदान की दुनिया में यह क्या बड़े बदलाव ला रहा है.

क्या है अलायंस फॉर पेयर्ड किडनी डोनेशन (एपीकेडी)
अलायंस फॉर पेयर्ड किडनी डोनेशन एक अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संस्था है. इसकी स्थापना साल 2006 में हुई थी. इस संस्था का मुख्य उद्देश्य किडनी फेलियर की समस्या को खत्म करना है. यह संस्था आधुनिक तकनीक, नवोन्मेष और जागरूकता अभियानों के जरिए काम करती है.
एपीकेडी एक वैश्विक किडनी रजिस्ट्री और मैचिंग नेटवर्क का संचालन करता है. जब किसी मरीज को अपने परिवार से मैचिंग डोनर नहीं मिलता, तब इस संस्था का डेटाबेस काम आता है. यह संस्था उन्नत कंप्यूटर एल्गोरिदम की मदद से ऐसे जोड़ों को आपस में मिलाती है जो एक दूसरे की मदद कर सकते हैं.
पेयर्ड किडनी एक्सचेंज कैसे काम करता है
किडनी ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में सबसे बड़ी रुकावट ब्लड ग्रुप या टिशू का मैच न होना है. मान लीजिए कि मरीज ए का रिश्तेदार डोनर ए उसे किडनी देना चाहता है. लेकिन मेडिकल जांच में दोनों का मैच नहीं होता. इसी तरह मरीज बी का रिश्तेदार डोनर बी भी मैच न होने से परेशान है.
एपीकेडी का सॉफ्टवेयर ऐसे सभी बेमेल जोड़ों का डेटा अपने विशाल डेटाबेस में दर्ज करता है. इसके बाद सॉफ्टवेयर जटिल गणितीय गणनाएं करता है. यह देखता है कि क्या डोनर ए की किडनी मरीज बी को लग सकती है और क्या डोनर बी की किडनी मरीज ए को दी जा सकती है. अगर मैच बन जाता है तो इसे पेयर्ड एक्सचेंज या स्वैप ट्रांसप्लांट कहते हैं.
इस प्रक्रिया में डोनेशन चेन यानी दान की एक लंबी श्रृंखला भी बनती है. कभी कभी कोई निस्वार्थ डोनर बिना किसी शर्त के अनजान मरीज को अपनी किडनी दान करता है. इससे एक डोमिनो इफेक्ट शुरू होता है. एक डोनर की वजह से लगातार कई मरीजों को मैचिंग डोनर मिलते चले जाते हैं.

किडनी मैचग्रिड: तकनीक के पीछे की ताकत
एपीकेडी ने मेडस्लीथ कंपनी के साथ मिलकर एक खास सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म तैयार किया है. इसे किडनी मैचग्रिड नाम दिया गया है. यह सॉफ्टवेयर अस्पतालों और ट्रांसप्लांट सेंटरों को स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर मैच खोजने की सुविधा देता है.
किडनी मैचग्रिड के पीछे नोबेल पुरस्कार जीतने वाले सिद्धांतों पर आधारित एल्गोरिदम काम करता है. यह सॉफ्टवेयर हर मरीज और डोनर के दर्जनों मेडिकल डेटा पॉइंट्स का विश्लेषण करता है. इससे ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटरों का समय बचता है और वे सटीक मैच ढूंढ पाते हैं.
इस डेटाबेस में मरीजों और डोनरों की जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रखी जाती है. इसके लिए सॉफ्टवेयर में अंतरराष्ट्रीय स्तर के सुरक्षा मानकों का पालन किया जाता है. डेटा सुरक्षा के लिए इसे एसओसी 2 टाइप 2 सर्टिफिकेशन मिला हुआ है.
बच्चों के लिए उम्मीद: विश अपॉन ए डोनर अभियान
अमेरिका में 18 साल से कम उम्र के करीब तीन हजार बच्चे किडनी फेलियर से जूझ रहे हैं. इनमें से कई बच्चों को अपने परिजनों से किडनी नहीं मिल पाती. मृत डोनर से किडनी मिलने में तीन से पांच साल का लंबा समय लग जाता है. इतने लंबे समय तक डायलिसिस पर रहना बच्चों के लिए बेहद दर्दनाक होता है.
इस समस्या से निपटने के लिए एपीकेडी ने विश अपॉन ए डोनर नाम से एक विशेष कार्यक्रम शुरू किया है. यह एक एडवोकेसी प्रोग्राम है जो बीमार बच्चों के लिए जीवित डोनर खोजने में मदद करता है. छोटे बच्चे खुद अपनी बीमारी के बारे में लोगों से मदद नहीं मांग सकते. यह मंच उनके माता पिता को अपनी बात दुनिया के सामने रखने की ताकत देता है.
विश अपॉन ए डोनर अभियान में शामिल होना पूरी तरह मुफ्त और आसान है. इसमें मरीज बच्चे का एक सुंदर और व्यक्तिगत वीडियो बनाया जाता है. यह वीडियो सिर्फ उसकी बीमारी नहीं दिखाता बल्कि उसके सपनों, इच्छाओं और उसकी शख्सियत को दुनिया के सामने लाता है.
इसके साथ ही परिवार को एक समर्पित वेबपेज, क्यूआर कोड वाले कार्ड और सोशल मीडिया गाइड दी जाती है. विश बडी नाम के वॉलंटियर और जीवित डोनर मेंटर इन परिवारों का मार्गदर्शन करते हैं. 10 साल के सलीम जैसे कई बच्चों को इस अभियान के जरिए नया जीवन मिलने की उम्मीद जगी है.

जीवित डोनर के फायदे और मृत डोनर से तुलना
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार जीवित डोनर से मिली किडनी मृत डोनर से मिली किडनी की तुलना में दोगुनी अवधि तक काम करती है. जीवित डोनर मिलने से ट्रांसप्लांट जल्दी हो जाता है. मरीज को सालों तक डायलिसिस की तकलीफ नहीं सहनी पड़ती.
डायलिसिस मरीज को जीवित तो रखता है लेकिन यह कोई स्थायी इलाज नहीं है. डायलिसिस की प्रक्रिया इंसान को शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती है. इसलिए जीवित अंगदान को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है.
डोनर प्रोटेक्ट: अंगदाताओं के लिए वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा
अंगदान करने की राह में कई बार आर्थिक और व्यावहारिक रुकावटें आती हैं. लोग अंगदान करना चाहते हैं लेकिन काम छूटने या खर्चों के डर से पीछे हट जाते हैं. एपीकेडी ने इस समस्या के समाधान के लिए डोनर प्रोटेक्ट प्रोग्राम बनाया है.
यह प्रोग्राम जीवित डोनरों को कई तरह की आर्थिक मदद और सुरक्षा देता है. डोनर को काम न कर पाने की स्थिति में दस हजार डॉलर तक की कमाई के नुकसान की भरपाई की जाती है. यात्रा, रहने और खाने पीने के खर्च के लिए साढ़े चार हजार डॉलर तक दिए जाते हैं.
अगर डोनर के घर में छोटे बच्चे या बुजुर्ग हैं तो देखभाल के लिए एक हजार डॉलर तक की मदद मिलती है. यहां तक कि पालतू जानवरों की देखभाल के लिए पांच सौ डॉलर तक की राशि का प्रावधान है. इसके अलावा डोनर को दस लाख डॉलर का जीवन बीमा और ढाई लाख डॉलर तक का मेडिकल कॉम्प्लिकेशन कवर भी दिया जाता है.
किडनी प्लेज: भविष्य के लिए जीवन रक्षा की गारंटी
एपीकेडी डोनरों के त्याग का सम्मान करने के लिए उन्हें और उनके परिवार को भविष्य की सुरक्षा भी देता है. इसे किडनी प्रॉमिस और किडनी प्लेज कहा जाता है.
अगर किसी व्यक्ति ने अतीत में अपनी एक किडनी किसी अनजान इंसान को दान की है, और भविष्य में कभी उसके किसी नजदीकी रिश्तेदार या बच्चे को किडनी की जरूरत पड़ती है, तो एपीकेडी नेटवर्क उस परिवार को प्राथमिकता के आधार पर मैचिंग किडनी उपलब्ध कराता है. यह सुविधा अंगदाताओं को यह भरोसा देती है कि उनका त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाएगा.

अंगदान की प्रक्रिया को आसान बनाता नेटवर्क
एपीकेडी का नेटवर्क यह पक्का करता है कि डोनर को अपने घर के पास के अस्पताल में ही सर्जरी की सुविधा मिले. सर्जरी के बाद निकाली गई किडनी को सुरक्षित तरीके से मरीज तक पहुंचाया जाता है.
संस्था के पास प्रशिक्षित डोनर मेंटर होते हैं. ये मेंटर वे लोग होते हैं जो खुद पहले अपनी किडनी दान कर चुके हैं. वे नए डोनरों के मन में उठने वाले हर सवाल और डर को दूर करते हैं. वे सर्जरी और रिकवरी के हर चरण में मार्गदर्शन करते हैं.
तकनीक और इंसानियत का अनोखा संगम
अलायंस फॉरपेयर्ड किडनी डोनेशन तकनीक और इंसानी हमदर्दी का बेहतरीन उदाहरण है. एक तरफ जहां उन्नत सॉफ्टवेयर डेटा का मिलान करके जीवन की राह आसान बनाते हैं, वहीं दूसरी तरफ डोनरों की उदारता नई सांसें देती है.
चाहे भारत में चार अलग राज्यों के परिवारों का स्वैप ट्रांसप्लांट हो या अमेरिका में छोटे बच्चों के लिए चलाया जा रहा विश अभियान हो, एपीकेडी की तकनीक ने यह साबित कर दिया है कि जब नियत और तकनीक एक साथ आते हैं तो धर्म, भाषा और सीमाओं की तमाम दीवारें ढह जाती हैं. अंगदान एक ऐसा महादान है जो किसी भी इंसान को दूसरे के लिए हीरो बना देता है.