आवाज द वाॅयस/श्रीनगर
कश्मीर की धार्मिक और सूफियाना परंपराओं से जुड़ी सदियों पुरानी ख्वाजा दिगार की रस्म सोमवार को श्रीनगर के पुराने शहर में पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ निभाई गई। ऐतिहासिक नक़्शबंद साहिब दरगाह पर सैकड़ों श्रद्धालु जमा हुए और 3 रबीउल अव्वल के मौके पर विशेष सामूहिक नमाज अदा की। कश्मीर के अलग अलग इलाकों से आए लोगों ने इस धार्मिक आयोजन में हिस्सा लिया।
श्रीनगर के पुराने शहर में स्थित नक़्शबंद साहिब दरगाह हर साल ख्वाजा दिगार की नमाज के मौके पर श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र बनती है। सोमवार को भी सुबह से ही दरगाह और उसके आसपास के इलाकों में लोगों की आवाजाही बढ़ गई थी। श्रद्धालु समूहों में दरगाह पहुंचे। कई लोग अपने परिवार के साथ आए थे। कुछ बुजुर्ग ऐसे भी थे जो बचपन से इस परंपरा का हिस्सा बनते रहे हैं।
ख्वाजा दिगार को कश्मीर की धार्मिक विरासत में खास स्थान हासिल है। यह आयोजन सिर्फ एक नमाज तक सीमित नहीं है। इसके साथ लोगों की पुरानी यादें और पारिवारिक परंपराएं भी जुड़ी हैं। हर साल 3 रबीउल अव्वल को होने वाली यह विशेष प्रार्थना कश्मीर के अलग अलग हिस्सों से लोगों को श्रीनगर के पुराने शहर तक खींच लाती है।
70 वर्षीय गुलाम नबी लोन भी सोमवार को नक़्शबंद साहिब दरगाह पहुंचे। उन्होंने अपने बचपन की याद साझा करते हुए कहा कि वह बचपन से अपने बुजुर्गों के साथ यहां आते रहे हैं। अब वह अपने परिवार के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए यह आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं है। यह उनके परिवार और कश्मीर की पुरानी परंपरा से जुड़ा एक भावनात्मक अवसर भी है।
दरगाह के आसपास की गलियों में सोमवार को लोगों की भीड़ नजर आई। श्रद्धालुओं के आने से पुराने शहर का माहौल भी बदल गया। स्थानीय लोगों के लिए ख्वाजा दिगार का आयोजन कश्मीर की साझा धार्मिक स्मृति का हिस्सा है। यहां आने वाले लोगों में अलग अलग उम्र के श्रद्धालु शामिल रहे।

ख्वाजा दिगार क्या है
ख्वाजा दिगार 3 रबीउल अव्वल को नक़्शबंद साहिब दरगाह में अदा की जाने वाली पारंपरिक सामूहिक नमाज है। यह कश्मीर की पुरानी धार्मिक परंपराओं में शामिल मानी जाती है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में लोग एक जगह जमा होते हैं और सामूहिक रूप से नमाज अदा करते हैं।
नक़्शबंद साहिब दरगाह श्रीनगर के पुराने शहर में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। दरगाह का संबंध नक्शबंदी सूफी परंपरा से माना जाता है। कश्मीर में सूफी परंपरा का सामाजिक और धार्मिक जीवन पर लंबे समय से प्रभाव रहा है। इसी वजह से नक़्शबंद साहिब दरगाह धार्मिक आस्था के साथ कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा मानी जाती है।
ख्वाजा दिगार की नमाज के दौरान दरगाह में विशेष भीड़ होती है। कश्मीर के विभिन्न जिलों और कस्बों से श्रद्धालु श्रीनगर पहुंचते हैं। कई परिवार इस आयोजन को पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं। बुजुर्ग अपने बच्चों और पोते पोतियों को भी इस परंपरा से जोड़ते हैं।
मीरवाइज उमर फारूक ने लगाया नजरबंदी का आरोप
इस बीच कश्मीर के प्रमुख धार्मिक नेता मीरवाइज उमर फारूक के कार्यालय ने दावा किया कि उन्हें सोमवार को नजरबंद रखा गया। उनके कार्यालय की ओर से सोशल मीडिया मंच एक्स पर किए गए एक पोस्ट में कहा गया कि नक़्शबंद साहिब दरगाह पर होने वाली सदियों पुरानी ख्वाजा दिगार की परंपरा में शामिल होने से रोकने के लिए मीरवाइज को उनके घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी गई।
मीरवाइज के कार्यालय के अनुसार, उन्हें पारंपरिक धार्मिक भाषण देने और ऐतिहासिक नक़्शबंद साहिब दरगाह में नमाज अदा करने से रोका गया। कार्यालय ने इसे ख्वाजा दिगार की पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ा मामला बताया।
मीरवाइज उमर फारूक का कश्मीर के धार्मिक और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वह श्रीनगर की ऐतिहासिक जामिया मस्जिद से भी जुड़े रहे हैं। धार्मिक अवसरों पर उनके संबोधन को बड़ी संख्या में लोग सुनते हैं। ऐसे में उनके कार्यालय की ओर से नजरबंदी का दावा सामने आने के बाद यह मुद्दा भी ख्वाजा दिगार आयोजन के साथ चर्चा में रहा।
हालांकि, सोमवार को नक़्शबंद साहिब दरगाह पर श्रद्धालुओं की मौजूदगी बनी रही। लोगों ने पारंपरिक नमाज अदा की और धार्मिक रस्म में हिस्सा लिया।
Khawaja Digar! Thousands of people offer the traditional Khoja Digar at the famous Naqshband Sahib Shrine in Srinagar on Monday. #Srinagar #Kashmir #KhojaDigar pic.twitter.com/dzYcVMTLYE
— Umar Ganie (@UmarGanie1) August 17, 2026
पुरानी परंपरा से जुड़ी है श्रद्धालुओं की आस्था
कश्मीर में धार्मिक आयोजन अक्सर स्थानीय संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं से जुड़े होते हैं। ख्वाजा दिगार भी ऐसा ही एक आयोजन है। यहां आने वाले कई श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं है। यह अपने बुजुर्गों की परंपरा को आगे बढ़ाने का अवसर भी है।
श्रीनगर का पुराना शहर अपनी ऐतिहासिक मस्जिदों, दरगाहों और धार्मिक स्थलों के लिए जाना जाता है। नक़्शबंद साहिब दरगाह इसी धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ख्वाजा दिगार के दिन इस क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में काफी बढ़ जाती है।
सोमवार को भी दरगाह के आसपास लोगों की चहल पहल रही। दूरदराज से आए श्रद्धालु नमाज के बाद कुछ समय दरगाह परिसर और आसपास के इलाके में रुके। कई लोगों ने अपने परिचितों और रिश्तेदारों से मुलाकात की। इस तरह धार्मिक आयोजन लोगों के बीच सामाजिक मेलजोल का माध्यम भी बना।
70 वर्षीय गुलाम नबी लोन की बात इस परंपरा की पीढ़ियों तक चली आ रही कड़ी को सामने रखती है। बचपन में वह अपने बुजुर्गों के साथ दरगाह पहुंचते थे। अब अपने परिवार के साथ वहां आते हैं। ऐसी व्यक्तिगत यादें ही किसी धार्मिक परंपरा को लंबे समय तक जीवित रखती हैं।
कश्मीर की सूफी विरासत में नक़्शबंद साहिब दरगाह का स्थान
कश्मीर को लंबे समय से सूफी और रूहानी परंपराओं की भूमि के रूप में देखा जाता रहा है। यहां की कई दरगाहें धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय इतिहास और संस्कृति से भी जुड़ी हैं। नक़्शबंद साहिब दरगाह भी इसी विरासत का हिस्सा है।
श्रीनगर का पुराना शहर इस दृष्टि से खास है। यहां कई ऐतिहासिक धार्मिक स्थल मौजूद हैं। इन स्थलों से जुड़ी परंपराएं आज भी लोगों के दैनिक और सामाजिक जीवन में दिखाई देती हैं। ख्वाजा दिगार की नमाज भी ऐसी ही परंपराओं में शामिल है।
हर साल 3 रबीउल अव्वल को होने वाला यह आयोजन लोगों को अपनी धार्मिक जड़ों से जोड़ता है। नई पीढ़ी भी परिवार के बुजुर्गों के साथ दरगाह पहुंचती है। इससे पुरानी परंपरा आगे बढ़ती रहती है।
सोमवार का ख्वाजा दिगार आयोजन इसी धार्मिक और सांस्कृतिक निरंतरता का उदाहरण रहा। सैकड़ों श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने दिखाया कि श्रीनगर में पुरानी धार्मिक परंपराओं के प्रति लोगों की आस्था अब भी मजबूत है।
एक तरफ दरगाह पर श्रद्धालु पारंपरिक नमाज में शामिल हुए तो दूसरी तरफ मीरवाइज उमर फारूक के कार्यालय की ओर से नजरबंदी का दावा सामने आया। इस तरह ख्वाजा दिगार का धार्मिक आयोजन आस्था के साथ साथ कश्मीर के मौजूदा सामाजिक और धार्मिक माहौल में भी चर्चा का विषय बना।
फिलहाल नक़्शबंद साहिब दरगाह पर हुई ख्वाजा दिगार की नमाज ने एक बार फिर कश्मीर की पुरानी धार्मिक परंपरा, सूफी विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था को सामने ला दिया है। श्रद्धालुओं के लिए यह दिन इबादत, याद और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर रहा।