The concept of a 'digital afterlife' through AI is being explored, but legal and ethical questions remain.
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन क्या आप अपने निधन के बाद भी अपनों से बातचीत करने वाला अपना एक इंटरैक्टिव “डिजिटल ट्विन” बनाना चाहेंगे? जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने मृतकों को मानो फिर से जीवित कर देने की संभावना पैदा कर दी है। तथाकथित ‘ग्रीफबॉट’ या ‘डेथबॉट’ तेजी से बढ़ते डिजिटल आफ्टरलाइफ उद्योग में फैल रहे हैं, जिसे ‘ग्रीफ टेक’ भी कहा जाता है।
‘ग्रीफबॉट’ या ‘डेथबॉट’ किसी मृत व्यक्ति के डेटा पर आधारित एआई-जनित आवाज, वीडियो या टेक्स्ट चैटबॉट होते हैं।
आमतौर पर ऐसे डेथबॉट शोकाकुल परिजनों द्वारा बनाए जाते हैं और यह शोक की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। हालांकि अब ऐसी सेवाएं भी उपलब्ध हैं, जिनके जरिए कोई व्यक्ति अपने जीवित रहते ही अपना ‘डिजिटल ट्विन’ तैयार कर सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि भविष्य के लिए अभी से ऐसा क्यों न किया जाए?
नई तकनीक के हर तरह से इस्तेमाल की तरह, डिजिटल अमरता की यह अवधारणा भी कई कानूनी सवाल खड़े करती है—और इनमें से अधिकांश के स्पष्ट जवाब फिलहाल मौजूद नहीं हैं।
किसी कंपनी को मृत्यु के बाद व्यक्ति का ‘डिजिटल सिमुलेशन’ बनाने की अनुमति देना एक संवेदनशील मामला है। यह स्थिति उस मामले से अलग है, जिसमें बिना सहमति के किसी मृत व्यक्ति की डिजिटल नकल बनाई जाती है, क्योंकि इस मामले में व्यक्ति अपनी मृत्यु से पहले ही अनुबंध के तहत डेटा उपयोग की अनुमति देता है।
इसके बावजूद कई सवाल अनसुलझे हैं—डिजिटल ट्विन पर कॉपीराइट किसका होगा, निजता का संरक्षण कैसे होगा, यदि कंपनी बंद हो जाए या तकनीक पुरानी हो जाए तो डेटा का क्या होगा, और क्या इस डिजिटल प्रतिरूप का अंत भी किसी समय माना जाएगा?