कश्मीर में नार्को-जिहाद की खामोश साज़िश

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 04-02-2026
The silent conspiracy of narco-jihad in Kashmir.
The silent conspiracy of narco-jihad in Kashmir.

 

अजमल शाह

पीर पंजाल पर्वतमाला पर बिछी निष्कलंक बर्फ लंबे समय से कश्मीर की शांति और पवित्रता का काव्यात्मक रूपक रही है, किंतु आज वही बर्फ एक ऐसी सड़ांध को ढँके हुए है जो पूरी घाटी की आत्मा को निगलने की धमकी दे रही है। दशकों से हमने संघर्ष की कीमत को मुठभेड़ों की ठंडी गणना और ताबूतों की शोकपूर्ण कतारों में मापा है, पर हम यह स्वीकार करने में असफल रहे कि दुश्मन ने मूल रूप से युद्ध की शर्तों को ही बदल दिया है। कलाश्निकोव की गर्जना के साथ अब सिरिंज की खामोश और घातक फुफकार भी जुड़ चुकी है।

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भारत से पारंपरिक युद्ध या यहां तक कि सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से टकराने की निरर्थकता को समझते हुए पाकिस्तान ने ऐसी गहन नैतिक दिवालियापन वाली रणनीति अपनाई है, जिसका उद्देश्य हमारे भविष्य को हमारे ही रक्त को ज़हर बनाकर नष्ट करना है। यह अब केवल विचारधारा या भू-भाग का छद्म युद्ध नहीं रहा; यह एक सुनियोजित जनसांख्यिकीय हमला है, जिसमें हथियार गोली नहीं बल्कि हेरोइन का एक पैकेट है।

यह एक अत्यंत भीषण त्रासदी है कि जो राष्ट्र स्वयं को दक्षिण एशिया में इस्लाम का दुर्ग बताता है, वही आज उस मादक पदार्थ महामारी का प्रमुख शिल्पकार बन गया है, जो उस धर्म के हर उसूल का उल्लंघन करती है जिसे वह बचाने का दावा करता है।

नार्को-जिहाद’ पाकिस्तानी डीप स्टेट की अंतिम पाखंडपूर्ण अभिव्यक्ति है। जहां एक ओर उनके मौलवी नशीले पदार्थों की मनाही और मानव शरीर की पवित्रता पर गरजते हुए उपदेश देते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी खुफिया एजेंसियों और सैन्य संरक्षकों ने हेरोइन और मेथामफेटामीन के उत्पादन और वितरण को औद्योगिक पैमाने पर संगठित कर दिया है।

उन्होंने अपनी नैतिकता को सुविधाजनक ढंग से दो हिस्सों में बाँट लिया है,जहां आस्थावान के लिए नशीले पदार्थों का सेवन हराम है, वहीं शत्रु के युवाओं को नष्ट करने के लिए वही नशा एक जायज़, बल्कि ‘पवित्र’ हथियार बन जाता है। यह धार्मिक कलाबाजी रावलपिंडी में बैठे किसी हैंडलर को बिना किसी अपराधबोध के एक कश्मीरी किशोर को ज़हर देने की सुविधा देती है, जहां वह उस नशेड़ी को पीड़ित नहीं बल्कि भारत को हज़ार घाव देकर लहूलुहान करने के अभियान में एक ‘कोलैटरल डैमेज’ के रूप में देखता है।

इस हमले की संचालनात्मक संरचना वर्षों में भयावह परिष्कार के साथ विकसित हुई है। हमें उन दिनों को याद करना चाहिए जब नियंत्रण रेखा (एलओसी) के आर-पार व्यापार को शांति के पुल के रूप में सराहा गया था—एक विश्वास निर्माण उपाय, जिसका उद्देश्य बंटे हुए परिवारों और अर्थव्यवस्थाओं को फिर से जोड़ना था।

लेकिन पाकिस्तान में बैठे आतंक के आकाओं ने हमारी सद्भावना को कमजोरी के रूप में देखा, जिसका शोषण किया जा सके। जो व्यापार कभी बादाम और संतरे के आदान-प्रदान के लिए था, उसे जल्दी ही मौत के एक मार्ग में बदल दिया गया।

शांति पुलों को पार करने वाले ट्रकों में अब छिपी हुई खानों में मादक पदार्थ और सूखे मेवों की बोरियों के भीतर हेरोइन की ईंटें आने लगीं। जब भारतीय राज्य ने आतंक वित्त को रोकने के लिए इस व्यापार को उचित रूप से निलंबित किया, तो दुश्मन पीछे नहीं हटा बल्कि उसने अपने लॉजिस्टिक्स में विविधता ला दी।

ट्रक की जगह ड्रोन ने ले ली और पहाड़ी दर्रों की जगह समुद्री गलियारों ने। आज हम पंजाब और जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा के ऊपर चुपचाप मंडराते चीनी निर्मित हेक्साकॉप्टर देख रहे हैं, जो ऐसे पैकेट गिराते हैं जिनमें एक घातक सौदा छिपा होता है,स्थानीय बाजार के लिए उच्च गुणवत्ता के नशीले पदार्थ और आतंकवादियों के लिए पिस्तौल या स्टिकी बम।

यह रणनीति एक ऐसे पिंसर मूवमेंट का रूप है, जिसका उद्देश्य भारत को चारों ओर से जकड़ना है, और यहीं यह खतरा पश्चिमी सीमाओं से आगे फैल चुका है। जहां दुनिया का ध्यान पश्चिम में ‘गोल्डन क्रिसेंट’ पर केंद्रित है, वहीं पाकिस्तान ने चुपचाप ‘गोल्डन ट्रायंगल’ का फायदा उठाकर एक घातक पूर्वी मोर्चा सक्रिय कर दिया है।

बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक अव्यवस्था ने इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) को अस्थिरता का एक नया मैदान उपलब्ध कराया है, जिसे उन्होंने आश्चर्यजनक तेजी से हथियार में बदल दिया। ढाका में बने अराजक शून्य का लाभ उठाते हुए पाकिस्तानी ऑपरेटिव्स ने गोल्डन ट्रायंगल के सिंडिकेट्स के साथ गठजोड़ कर लिया है, ताकि भारत के पूर्वी हिस्से में सिंथेटिक ड्रग्स और मेथामफेटामीन की बाढ़ लाई जा सके।

आज हम ज़हर के दो गलियारों के बीच फँस चुके हैं,जहां पश्चिम की हेरोइन और पूर्व की याबा गोलियां एक-दूसरे से मिलती हैं, और दोनों का संचालन उसी कठपुतलीबाज़ द्वारा किया जा रहा है जो रावलपिंडी में बैठकर हमारी सुरक्षा व्यवस्था को उसकी अंतिम सीमा तक खींचना चाहता है। यह केवल तस्करी का मार्ग नहीं, बल्कि एक रणनीतिक घेराबंदी है, जिसमें एक पड़ोसी की अस्थिरता का उपयोग भारत के उत्तर-पूर्व और बंगाल की नसों में मौत पंप करने के लिए किया जा रहा हैयानी इस नशे के युद्ध में एक दूसरा मोर्चा खोल दिया गया है।

हमें 2019 के बाद के दौर में आतंक वित्तपोषण की अपनी समझ की भी गंभीर समीक्षा करनी चाहिए। सुरक्षा प्रतिष्ठान में यह भावना प्रचलित है कि विदेशी फंडिंग पर सफल रोक और उन हवाला नेटवर्क्स के ध्वंस से बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है, जो कभी अलगाववाद की मशीनरी को चिकनाई देते थे।

यह सच है कि पाकिस्तान और उसके विदेशी समर्थकों से आने वाले पारंपरिक धन-मार्गों को काफी हद तक दबा दिया गया है, लेकिन हम अक्सर उस भयावह सच्चाई की अनदेखी कर देते हैं कि आज कितना आतंक वित्त हमारे ही भीतर, स्थानीय स्तर पर पैदा हो रहा है। पाकिस्तानी तंत्र ने हमारी सीमाओं के भीतर एक आत्मनिर्भर संघर्ष अर्थव्यवस्था को संचालित कर दिया है।

हालांकि, भारतीय राज्य और कश्मीर के लोगों की दृढ़ता वह कारक है, जिसे रावलपिंडी के योजनाकार लगातार कम आंकते रहे हैं। आज जो सख्ती दिखाई दे रही है, वह केवल पुलिसिया कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे आतंक पारिस्थितिकी तंत्र को ध्वस्त करने की एक रणनीतिक कोशिश है।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा नशे के सरगनाओं की संपत्तियों को कुर्क करने की हालिया कार्रवाइयाँ हमारे आतंक-रोधी सिद्धांत में एक निर्णायक बदलाव को दर्शाती हैं। मौत के इस व्यापार से अर्जित धन से बने खेतों और आलीशान मकानों को जब्त कर राज्य प्रोत्साहन की पूरी संरचना पर ही वार कर रहा है।

हम आतंकवाद के कॉरपोरेट आवरण को भेदकर उसके सहयोगियों को जवाबदेह ठहरा रहे हैं और यह सख्त संदेश दे रहे हैं कि खून के पैसे के लिए कोई सुरक्षित पनाहगाह नहीं है। सऊदी अरब जैसे विदेशी ठिकानों से भी प्रमुख ऑपरेटिव्स की गिरफ्तारी यह दर्शाती है कि भारतीय कानून की पहुँच अब और भी लंबी हो गई है।

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पाकिस्तान अब कश्मीरियों की लाशों पर अपने एजेंडे को नहीं चला रहा; वह एक ऐसी पीढ़ी के सपनों और आकांक्षाओं पर पल रहा है, जो बांह में सुई के बजाय बेहतर भविष्य की हकदार है। घाटी में हेरोइन की लत में 2000 प्रतिशत की वृद्धि केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस पड़ोसी द्वारा किया गया मानवता के विरुद्ध अपराध है, जो हमारे प्रति सहानुभूति का दावा करता है। सिरिंज वास्तव में संगीन बन चुकी है और नशेड़ी उस युद्ध का नया पैदल सैनिक, जिसमें जीत केवल मानवीय क्षमता के विनाश में निहित है।

कश्मीर की घाटियों और उत्तर-पूर्व की पहाड़ियों में लड़ी जा रही यह लड़ाई मानवीय क्षमता के संरक्षण की लड़ाई है। विरोधी की रणनीति सपनों को क्षीण करने और नशे के बोझ तले एक पीढ़ी की आकांक्षाओं को कुचलने पर आधारित है।

किंतु भारतीय सोच की दृढ़ता इसकी सामूहिक इच्छाशक्ति और संस्थानों की सतर्कता में निहित है। मादक पदार्थों से संचालित आग के एक घेरे से भारत को घेरने का प्रयास उस राज्य का हताश जुआ है, जिसके पास पारंपरिक विकल्प समाप्त हो चुके हैं।

यह स्पष्ट रहे कि भविष्य उन्हें नहीं लिखने दिया जाएगा जो ज़हर बेचते हैं, बल्कि उस राष्ट्र द्वारा लिखा जाएगा जो अपने युवाओं को उस पड़ोसी की भू-राजनीतिक साज़िशों में खपने देने से इनकार करता है, जिसने अपना नैतिक कम्पास खो दिया है। यह मौन घेराबंदी केवल हथियारों के बल से नहीं, बल्कि उस समाज की शक्ति से टूटेगी जो जड़ता के बजाय जीवन और निर्भरता के बजाय गरिमा को चुनता है।

( लेखक: अधिवक्ता, जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय में प्रैक्टिसरत।)