तौबा, दुआ और रहमत की रात: शब-ए-बरात

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 30-01-2026
A night of repentance, prayer, and mercy: Shab-e-Barat
A night of repentance, prayer, and mercy: Shab-e-Barat

 

 ईमान सकीना

शब-ए-बरात, जिसे आमतौर पर माफी की रात या जहन्नम से मुक्ति की रात कहा जाता है, इस्लामी परंपरा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक रात मानी जाती है। यह रात इस्लामी चंद्र कैलेंडर के आठवें महीने शाबान की पंद्रहवीं तारीख को आती है और दुनिया भर के लाखों मुसलमानों के लिए आत्ममंथन, पश्चाताप और अल्लाह की असीम दया में नई उम्मीद का अवसर लेकर आती है। भले ही अलग-अलग क्षेत्रों और संस्कृतियों में इसे मनाने के तरीके भिन्न हों, लेकिन इसका मूल उद्देश्य हर जगह एक ही रहता है,अपने कर्मों का लेखा-जोखा करना, दिल को साफ करना और अल्लाह के और अधिक क़रीब होना। शब-ए-बरात केवल कुछ विशेष इबादतों या रस्मों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसान को अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा देती है।

A family in Hyderbabad lights candles on the grave of their loved one (FILE)

“बरात” शब्द अरबी भाषा के “बरा-अह” से निकला है, जिसका अर्थ है मुक्ति, छुटकारा या क्षमा। इसी अर्थ के कारण इस रात को ऐसी रात माना जाता है जब अल्लाह अपने बंदों पर विशेष कृपा करता है और सच्चे दिल से तौबा करने वालों के गुनाहों को माफ़ फरमाता है।

कई इस्लामी रिवायतों में शाबान की पंद्रहवीं रात की अहमियत का उल्लेख मिलता है। इन रिवायतों के अनुसार, इस रात अल्लाह अपनी पूरी सृष्टि पर रहमत की नज़र डालता है और उन सभी को माफ़ कर देता है जो ईमानदारी से माफी माँगते हैं, सिवाय उन लोगों के जो घमंड, द्वेष, आपसी नफ़रत या अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराने जैसे बड़े गुनाहों पर अड़े रहते हैं। हालाँकि विद्वानों के बीच इन रिवायतों की प्रामाणिकता को लेकर मतभेद पाए जाते हैं, फिर भी अधिकांश उलेमा इस बात पर सहमत हैं कि यह रात आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इबादत व आत्मसुधार के लिए प्रेरित करती है।

इस्लाम के प्रारंभिक दौर से ही शब-ए-बरात को रमज़ान की तैयारी के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा गया है। यह रात मानो आम महीनों और रमज़ान जैसे पवित्र महीने के बीच एक पुल का काम करती है। रमज़ान में उपवास, इबादत और आत्मसंयम का जो कठोर अभ्यास होता है, उसके लिए इंसान को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तैयार होना आवश्यक है। शब-ए-बरात इसी तैयारी का अवसर प्रदान करती है, जहाँ इंसान अपने दिल की गंदगियों को साफ करता है और नई शुरुआत का संकल्प लेता है।

समय के साथ-साथ शब-ए-बरात से जुड़ी कई परंपराएँ विकसित हुई हैं, विशेष रूप से दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और मध्य पूर्व के क्षेत्रों में। कई मुसलमान इस रात को जागकर नफ़्ल नमाज़ अदा करते हैं, क़ुरआन की तिलावत करते हैं, दुआ माँगते हैं और अपने गुनाहों की माफी के लिए अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाते हैं। अनेक स्थानों पर मस्जिदें देर रात तक खुली रहती हैं और सामूहिक इबादत का माहौल बनता है, जिससे लोगों को एक-दूसरे के साथ मिलकर आत्मिक शांति का अनुभव होता है।

कुछ लोग शब-ए-बरात के बाद वाले दिन रोज़ा भी रखते हैं। यह परंपरा पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की सुन्नत से प्रेरित मानी जाती है, क्योंकि उन्होंने शाबान के महीने में अक्सर रोज़े रखे। यह रोज़ा इंसान को संयम, धैर्य और आत्मनियंत्रण का अभ्यास कराता है और रमज़ान के रोज़ों के लिए शरीर व मन को तैयार करता है।

शब-ए-बरात के अवसर पर दान और परोपकार को भी विशेष महत्व दिया जाता है। गरीबों को खाना खिलाना, ज़रूरतमंदों की मदद करना, पड़ोसियों का हालचाल पूछना और टूटे रिश्तों को जोड़ने की कोशिश करना इस रात की भावना के अनुरूप माना जाता है। यह समझा जाता है कि केवल इबादत ही नहीं, बल्कि इंसानों के साथ अच्छा व्यवहार भी अल्लाह की रज़ा पाने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

कई क्षेत्रों में लोग अपने दिवंगत परिजनों के लिए दुआ करने कब्रिस्तानों में जाते हैं। यह प्रथा इंसान को उसकी नश्वरता की याद दिलाती है और यह एहसास कराती है कि यह दुनिया स्थायी नहीं है। कब्रिस्तान की ज़ियारत इंसान के भीतर विनम्रता, जवाबदेही और नेक जीवन जीने की प्रेरणा पैदा करती है।

कुछ संस्कृतियों में शब-ए-बरात के मौके पर घरों को रोशन किया जाता है, विशेष मिठाइयाँ बनाई जाती हैं और पड़ोसियों के साथ भोजन साझा किया जाता है। हालाँकि ये परंपराएँ धार्मिक अनिवार्यता नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक रंग लिए हुए हैं, फिर भी वे आपसी भाईचारे और सामाजिक एकता को मज़बूत करती हैं। इस्लामी विद्वानों ने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया है कि इन परंपराओं को धर्म का अनिवार्य हिस्सा न माना जाए, बल्कि शब-ए-बरात की असली आत्मा,सच्ची तौबा और आत्मसुधार को प्राथमिकता दी जाए।

आज की तेज़ रफ्तार और भागदौड़ भरी ज़िंदगी में शब-ए-बरात एक ठहराव का अवसर प्रदान करती है। यह रात इंसान को अपनी व्यस्तताओं से अलग होकर अपने भीतर झाँकने और अपने रब से जुड़ने का मौका देती है। यह याद दिलाती है कि माफी केवल ज़ुबानी दुआओं से नहीं मिलती, बल्कि व्यवहार में बदलाव से मिलती है—अहंकार को छोड़ने, नफ़रत को खत्म करने, गलत आदतों से दूर रहने और करुणा व सहानुभूति को अपनाने से।

जैसे-जैसे रमज़ान नज़दीक आता है, शब-ए-बरात एक आध्यात्मिक पड़ाव के रूप में सामने आती है, जहाँ इंसान अपने इरादों को दोबारा परखता है, दिल को पाक करता है और इबादत व अनुशासन के पवित्र महीने के लिए स्वयं को तैयार करता है। सही समझ और सच्चे दिल से मनाई गई शब-ए-बरात यह एहसास कराती है कि कोई भी इंसान अल्लाह की रहमत से वंचित नहीं है और उसकी दया हमेशा इंसानी कमज़ोरियों से कहीं अधिक व्यापक और महान है।