आवाज द वाॅयस/नई दिल्ली
जब इंसानी जज्बा आसमान छूने की ठान ले, तो हिमालय की गगनचुंबी चोटियाँ भी छोटी नजर आने लगती हैं। राजस्थान के अजमेर की रहने वाली 38वर्षीय अल्ट्रा-डिस्टेंस रनर सोफिया सूफी ने यह साबित कर दिखाया है। अपने साहस, धैर्य और अदम्य जज्बे के दम पर उन्होंने मनाली से लेह तक की हाई-एल्टीट्यूड माउंटेन रेस पूरी की और गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम किया। यह दौड़ न केवल लंबाई और कठिनाई के लिहाज से चुनौतीपूर्ण थी, बल्कि मानसिक और शारीरिक सहनशक्ति की भी परीक्षा थी।
सोफिया की इस अद्भुत उपलब्धि ने पूरे भारत और दुनिया के रनिंग कम्युनिटी में हलचल मचा दी। इस रेस की कुल दूरी लगभग 480किलोमीटर थी, जिसमें हिमालय के पांच ऊंचे पहाड़ी दर्रे पार करना शामिल था। रूट की खासियत यह थी कि समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर होने के कारण ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम थी, और ठंड इतनी कि यह शरीर की हड्डियों तक जम जाती। बावजूद इसके, सोफिया ने यह दौड़ 98घंटे और 27 मिनट में पूरी की।
यह समय किसी भी महिला द्वारा इस मार्ग पर दर्ज की गई अब तक की सबसे तेज़ दौड़ के रूप में रिकॉर्ड हुआ। उन्होंने प्रतीकात्मक 100 घंटे के मार्क को पार कर दिखाया और साबित किया कि असंभव शब्द उनके शब्दकोश में नहीं है।
हालांकि इस उपलब्धि को गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने 2023में मान्यता दी थी, लेकिन लंबी अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं और कस्टम क्लियरेंस की देरी के कारण सर्टिफिकेट सोफिया तक 2026की शुरुआत में पहुँचा। उनके हाथों में सर्टिफिकेट आते ही रनिंग कम्युनिटी और उनके समर्थकों ने उन्हें जोरदार बधाई दी। यह सर्टिफिकेट केवल कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि उन अनगिनत रातों और कठिन मौसम में बिना सोए बिताए गए समय का प्रमाण है।
सोफिया का जन्म 1987 में अजमेर, राजस्थान में हुआ। उन्होंने लगभग दस वर्षों तक एविएशन सेक्टर में काम किया। एक स्थिर और सुरक्षित नौकरी होने के बावजूद, सोफिया के भीतर कुछ बड़ा करने की इच्छा थी। दौड़ना उनके लिए शुरुआत में सिर्फ फिटनेस का जरिया था, लेकिन धीरे-धीरे यह उनका जुनून और जीवन का उद्देश्य बन गया। उन्होंने अपने करियर को पीछे छोड़कर पूरी तरह से अल्ट्रा रनिंग को अपनाया और खुद को चुनौतीपूर्ण मार्गों पर दौड़ने के लिए तैयार किया।
सोफिया की उपलब्धियों का सफर केवल मनाली-लेह रेस तक सीमित नहीं है। उन्होंने पहले ही कई विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं। 2018 में उन्होंने एक कैलेंडर वर्ष में सबसे ज्यादा मैराथन दौड़ने का गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया।
इसके बाद, उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी लगभग 4000 किलोमीटर की दूरी मात्र 87दिनों में तय की। फिर, उन्होंने गोल्डन क्वाड्रिलैटरल रूट पर 6002किलोमीटर की दौड़ केवल 110दिनों में पूरी की और एक और विश्व रिकॉर्ड हासिल किया। ये उपलब्धियाँ उनकी शारीरिक ताकत, मानसिक दृढ़ता और रणनीतिक योजना का प्रतीक हैं।
सोफिया की इस सफलता में उनके परिवार और सपोर्ट टीम का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। हिमालय की कठिनियों में, जब शरीर थक जाता है और ठंड शरीर की हड्डियों तक पहुंचती है, तब परिवार और टीम का समर्थन उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है।
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर सोफिया ने अपने स्पॉन्सर्स, टीम और शुभचिंतकों का धन्यवाद किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह रिकॉर्ड केवल उनकी मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति की मेहनत और सहयोग का नतीजा है, जिसने उनके साथ हर कदम पर खड़े होकर उन्हें प्रोत्साहित किया।
सोफिया का दौड़ने का मकसद केवल व्यक्तिगत रिकॉर्ड या पुरस्कार तक सीमित नहीं है। वह इसे इंसानियत, एकता, शांति और समानता का संदेश देने का माध्यम मानती हैं। भविष्य में वह दुनिया भर में हजारों किलोमीटर की दौड़ की योजना बना रही हैं, जिसका उद्देश्य यह दिखाना है कि दौड़ते समय इंसान न केवल दूरी को पार करता है, बल्कि अपने अंदर के भय और सामाजिक भेदभाव को भी पीछे छोड़ता है।
मनाली-लेह मार्ग की चुनौतीपूर्ण ऊंचाइयों और कठिन मौसम को पार करना किसी आम इंसान के बस की बात नहीं। ठंड, ऑक्सीजन की कमी, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और लगातार दौड़ की थकान ने इस रेस को शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद कठिन बना दिया। लेकिन सोफिया ने न केवल इस चुनौती को स्वीकार किया, बल्कि उसे पार कर दुनिया को दिखा दिया कि इंसान का जज्बा और इच्छाशक्ति किसी भी बाधा को पार कर सकती है।
द लॉजिकल इंडिया के अनुसार, सोफिया सूफी की कहानी आधुनिक युग की उन महिलाओं की कहानी है, जो अपनी किस्मत खुद लिखती हैं। एक सुरक्षित करियर छोड़कर अनिश्चितता और कठिन रास्तों को चुनना किसी के लिए भी आसान नहीं होता, लेकिन सोफिया ने यह साबित कर दिया कि अगर आपके इरादे मजबूत हैं, तो दुनिया की कोई भी ऊंचाई आपको रोक नहीं सकती।
सोफिया की यह उपलब्धि केवल भारतीय एथलीटों के लिए एक बेंचमार्क नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों का पीछा करने से डरता है। उनका संघर्ष और सफलता यह दर्शाता है कि लगन, धैर्य और मानसिक दृढ़ता के साथ कोई भी चुनौती पार की जा सकती है। आज सोफिया सूफी केवल एक धाविका नहीं, बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति का वैश्विक प्रतीक बन चुकी हैं।