दयाराम वशिष्ठ/ सूरजकुंड (हरियाणा)
कश्मीर की पारंपरिक वस्त्र एवं हैंडलूम उद्योग ने बीते कुछ वर्षों में अभूतपूर्व विकास किया है और इसका जीवंत उदाहरण सूरजकुंड मेले में देखने को मिल रहा है। मेले में पहुंचे कश्मीरी हस्तशिल्पियों ने अपनी बारीक कढ़ाई, पारंपरिक डिजाइनों और आधुनिक शैली के समन्वय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया है। खासकर कश्मीरी साड़ियां, पश्मीना शॉल और स्टॉल लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई हैं, जिनकी मांग अब न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी तेजी से बढ़ रही है।
इस पारंपरिक उद्योग की सफलता की कहानी 34वर्षीय युवा हस्तशिल्पकार आरिफ हुसैन शाह और उनके परिवार से जुड़ी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला को संजोते आ रहे हैं। आरिफ बताते हैं कि उन्होंने यह हुनर अपने पूर्वजों से विरासत में पाया है।
आठवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने अपने दादा गुलाम मोहम्मद और पिता मोहम्मद हुसैन से हैंडलूम का काम सीखना शुरू कर दिया था। शुरुआत में उन्होंने कढ़ाई और बुनाई की बारीकियां समझीं और धीरे-धीरे पूरे कारोबार की जिम्मेदारी संभालने लगे। आज वे अपने पिता के साथ मिलकर इस पारंपरिक व्यवसाय को आधुनिक बाजार की मांगों के अनुरूप आगे बढ़ा रहे हैं।
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आरिफ बताते हैं कि यह केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक परंपरा है जो उनके परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही है। उनके दादा गुलाम मोहम्मद ने हैंडलूम का काम अपने पूर्वजों से सीखा था, जिसे आगे उनके पिता मोहम्मद हुसैन ने निखारा। वहीं आरिफ की मां गुलशन और दादी जौहरा ने चरखे के माध्यम से ऊन से धागा तैयार करने की कला में अहम भूमिका निभाई। परिवार के हर सदस्य का योगदान इस हस्तशिल्प को जीवित रखने में रहा है।
आरिफ हुसैन शाह बताते हैं कि पहले उनकी मां और दादी चरखे से ऊन को धागे की शक्ल देती थीं। इसके बाद उनके पिता उसी धागे से हैंडलूम पर शॉल तैयार करते थे। शॉल का ढांचा बनने के बाद कुशल कारीगर उस पर महीन कढ़ाई करते थे, जिससे उसे अंतिम रूप मिलता था।
अंत में तैयार उत्पाद को स्थानीय बाजारों और मेलों में बेचने ले जाया जाता था। एक समय था जब उनके दादा और परदादा गांव-गांव घूमकर अपने उत्पाद बेचा करते थे, लेकिन समय के साथ हालात बदले और आज यही उत्पाद विदेशों तक निर्यात हो रहे हैं।
वर्तमान समय में आरिफ के बनाए हैंडलूम उत्पादों की दुबई, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में जबरदस्त मांग है। शूट, साड़ी और स्टॉल की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अच्छी खासी डिमांड है, जिनमें सबसे ज्यादा बिक्री स्टॉल की हो रही है। कश्मीरी साड़ियों की बढ़ती लोकप्रियता का मुख्य कारण उनकी प्राकृतिक रंगत, प्राचीन कढ़ाई तकनीक और आरामदायक फैब्रिक है। ये साड़ियां अपने बेहतरीन पैटर्न और हल्के वजन के लिए जानी जाती हैं, जो हर मौसम और अवसर के लिए उपयुक्त होती हैं।
आरिफ बताते हैं कि उनकी स्टॉल पर पश्मीना शॉल और साड़ियां विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रहती हैं। पश्मीना शॉल बेहद हल्की होने के साथ-साथ गर्माहट और कंफर्ट के लिए जानी जाती हैं। इनके दाम 6हजार रुपये से लेकर 20हजार रुपये तक होते हैं, जो उनकी डिजाइन की जटिलता, कढ़ाई और शुद्धता पर निर्भर करते हैं। अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के बीच इन शॉल्स की खास पहचान बन चुकी है।
हैंडलूम उद्योग में आए बदलावों पर बात करते हुए आरिफ कहते हैं कि पहले और अब के डिजाइनों में काफी अंतर आया है। एक समय था जब कारीगर लकड़ी के छापे खुद बनाते थे और उन्हीं से कपड़े पर डिजाइन प्रिंट किए जाते थे। रंगाई और धुलाई का काम भी पूरी तरह हाथ से होता था।
लेकिन अब तकनीक ने इस उद्योग में नई जान फूंक दी है। आज कंप्यूटर की मदद से डिजाइन तैयार किए जाते हैं, जिससे समय की बचत के साथ-साथ डिजाइन में विविधता भी आई है। हालांकि आरिफ इस बात पर जोर देते हैं कि आधुनिक तकनीक के बावजूद पारंपरिक हस्तकला की आत्मा को बनाए रखना उनकी पहली प्राथमिकता है।
आरिफ का कहना है कि वे कला को संरक्षित रखने के साथ-साथ नए ट्रेंड्स के अनुसार डिजाइनों को भी विकसित कर रहे हैं, ताकि युवा पीढ़ी को पारंपरिक वस्त्रों से जोड़ा जा सके। उनका मानना है कि आज की युवा पीढ़ी फिर से पारंपरिक परिधानों की ओर लौट रही है, जिससे कश्मीर के वस्त्र उद्योग के भविष्य को लेकर उम्मीदें और मजबूत हुई हैं। शादी, त्योहार या किसी विशेष अवसर के लिए कश्मीरी साड़ी और शॉल अब लोगों की पहली पसंद बनती जा रही हैं।
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सूरजकुंड मेले में आए दर्शक भी कश्मीरी हस्तशिल्पियों के काम की जमकर सराहना कर रहे हैं। यहां मौजूद हर स्टॉल कश्मीर की संस्कृति, परंपरा और मेहनत की कहानी बयां करता नजर आता है। आरिफ और उनके परिवार की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि अगर परंपरा, मेहनत और नवाचार साथ चलें, तो स्थानीय कला भी वैश्विक पहचान बना सकती है। कश्मीर का पारंपरिक हैंडलूम उद्योग आज न केवल रोजगार का साधन बन रहा है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को विश्व पटल पर मजबूती से स्थापित कर रहा है।