नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के पुनर्गठन पर तब विचार करेगा जब नई चुनी गई स्टेट बार काउंसिल BCI के गठन की कानूनी प्रक्रिया पूरी कर लेंगी। कोर्ट उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था जिनमें सीनियर एडवोकेट मनन कुमार मिश्रा के BCI चेयरमैन पद पर बने रहने और उनके कार्यकाल को 2030 तक बढ़ाने के कथित फैसले को चुनौती दी गई थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली बेंच - जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे - ने संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर स्टेट बार काउंसिल में महिला सदस्यों को शामिल करने (co-option) की लंबित प्रक्रिया पूरी करें। इसके बाद काउंसिल को अपनी अंतिम संरचना की सूचना देने के लिए एक सप्ताह और उसके बाद एडवोकेट्स एक्ट की धारा 4(1)(c) के तहत बाकी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करने और अनुपालन रिपोर्ट जमा करने के लिए दो सप्ताह का समय मिलेगा।
कोर्ट ने कहा, "इन अनुपालन रिपोर्टों के मिलने पर, हम एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 4 के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पुनर्गठन के मुद्दे पर विचार करेंगे।" हालांकि चुनी हुई BCI का गठन अभी लंबित है, कोर्ट ने रोजमर्रा के कामकाज के लिए मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन नीतिगत फैसलों के लिए एक निगरानी तंत्र (oversight mechanism) लागू किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि भारत के अटॉर्नी जनरल (AGI) और भारत के सॉलिसिटर जनरल (SGI) को ऐसे हर नीतिगत फैसले में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए। कोर्ट ने कहा, "भारत के अटॉर्नी जनरल और भारत के सॉलिसिटर जनरल दोनों को बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा लिए जाने वाले हर नीतिगत फैसले में सक्रिय रूप से शामिल किया जाएगा।"
BCI के वकील सीनियर एडवोकेट गुरु कृष्णकुमार इस बात पर सहमत हुए कि हर नीतिगत फैसला अटॉर्नी जनरल के सामने रखा जाएगा और उन्हें ऐसे फैसलों से जुड़ी बैठकों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि धारा 4(3) के प्रावधान के तहत कामकाज जारी रखना केवल रोजमर्रा के कार्यों के लिए ही हो सकता है, जब तक कि चुनी हुई BCI का गठन नहीं हो जाता। कोर्ट के सामने मुख्य चुनौती मिश्रा के BCI चेयरमैन पद पर बने रहने और उनके कार्यकाल को 2030 तक बढ़ाने के कानूनी आधार से जुड़ी है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने 21 अप्रैल, 2025 की उस अधिसूचना को चुनौती दी, जिसमें BCI चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए पांच साल का कार्यकाल तय करने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि नोटिफिकेशन में ऐसी समय-सीमा बढ़ाने के लिए किसी कानूनी प्रावधान का ज़िक्र नहीं था और तर्क दिया कि इससे बार काउंसिल चुनावों के संबंध में कोर्ट की कार्यवाही बेकार हो जाती है।
दीवान ने 2 मार्च, 2025 को हुई BCI जनरल काउंसिल की बैठक के मिनट्स का ज़िक्र किया, जिनसे पता चला कि मिश्रा को सर्वसम्मति से चेयरमैन चुना गया था, जिनका कार्यकाल 17 अप्रैल, 2025 से शुरू होकर 16 अप्रैल, 2030 तक था। कोर्ट ने BCI नियमों के नियम 12(2) को देखते हुए पांच साल के कार्यकाल के आधार पर सवाल उठाया, जिसमें चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए दो साल के कार्यकाल का प्रावधान है।
दीवान ने 9 जनवरी, 2025 के BCI प्रस्ताव का भी ज़िक्र किया, जिसमें कार्यकाल को तीन साल से बढ़ाकर पांच साल करने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि BCI का प्रस्ताव कानूनी नियमों से ऊपर नहीं हो सकता।
सीनियर एडवोकेट CU सिंह ने कहा कि याचिकाओं में अप्रैल 2025 के नोटिफिकेशन को स्पष्ट रूप से चुनौती दी गई थी। सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने BCI प्रस्ताव के उस दावे की ओर इशारा किया कि एडवोकेट्स एक्ट में ऐसी कोई स्पष्ट या निहित रोक नहीं है जो काउंसिल को अपने पदाधिकारियों का कार्यकाल तय करने या बढ़ाने से रोके।
याचिकाकर्ताओं ने एडवोकेट्स एक्ट की धारा 4(3) के प्रावधान (proviso) के इस्तेमाल के तरीके को भी चुनौती दी। यह प्रावधान सदस्यों को तब तक पद पर बने रहने की अनुमति देता है जब तक उनके उत्तराधिकारी नहीं चुने जाते। दीवान ने कहा कि प्रशासनिक शून्यता (administrative vacuum) को रोकने के लिए बनाए गए प्रावधान का इस्तेमाल कार्यकाल बढ़ाने और नए चुनाव टालने के लिए किया जा रहा था।
CJI ने कहा कि स्टेट बार काउंसिल के चुनाव पूरे होने से हालात बदल गए हैं और BCI के गठन के लिए कानूनी प्रक्रिया को लागू करने की ज़रूरत है। कोर्ट ने कहा कि स्टेट बार काउंसिल द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही BCI के पदाधिकारियों के चुनाव का आधार बनेंगे।
कोर्ट ने कहा, "चुनाव हो जाने के बाद, नई बनी स्टेट बार काउंसिल से यह उम्मीद की जाती है, उनसे यह ज़रूरी है और वे कानूनी रूप से बाध्य हैं कि वे धारा 4(1)(c) के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करें और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए अपने प्रतिनिधि चुनें।"
जस्टिस बागची ने कहा कि प्रथम दृष्टया (prima facie), मौजूदा चेयरमैन केवल BCI के नए चुनाव होने तक ही पद पर बने रह सकते हैं। इस कार्यवाही में BCI से जुड़े ट्रस्ट के संस्थागत ढांचे और वित्तीय मामलों की भी जांच-पड़ताल की गई। सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने 2020 में BCI के PEARL ट्रस्ट के गठन को चुनौती दी, खासकर उस प्रावधान को जिसके तहत ग्यारह मैनेजिंग ट्रस्टियों को BCI सदस्य के तौर पर उनके कार्यकाल की परवाह किए बिना मूल और स्थायी ट्रस्टी बताया गया था।