Story by आवाज़ द वॉयस | Published by onikamaheshwari | Date 16-07-2026
Parliamentary panel asks Education Ministry to draw roadmap for remaining Institutions of Eminence, examine expansion of scheme
नई दिल्ली
उच्च शिक्षा संस्थानों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई इंस्टीट्यूशंस ऑफ एमिनेंस (IoE) योजना के धीमे क्रियान्वयन पर संसदीय समिति ने चिंता जताई है। शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने शिक्षा मंत्रालय से योजना के तहत बचे हुए संस्थानों को अधिसूचित करने के लिए समयबद्ध रोडमैप तैयार करने को कहा है। साथ ही समिति ने योजना के दायरे का विस्तार कर देश के अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों, जिनमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) जैसे संस्थान शामिल हैं, को जोड़ने की संभावनाओं की जांच करने की सिफारिश की है।
समिति ने अपनी कार्रवाई रिपोर्ट में कहा कि मंत्रालय की ओर से दिए गए जवाब में केवल योजना की प्रक्रिया और नियमों की जानकारी दी गई, लेकिन समिति द्वारा उठाए गए मुख्य सवालों का संतोषजनक समाधान नहीं किया गया।
संसदीय समिति ने जून में वर्ष 2025-26 के अनुदान मांगों से जुड़ी 364वीं रिपोर्ट पर सरकार द्वारा की गई कार्रवाई की समीक्षा करते हुए अपनी 381वीं रिपोर्ट पेश की थी।
रिपोर्ट में कहा गया कि इंस्टीट्यूशंस ऑफ एमिनेंस योजना, जिसे वर्ल्ड क्लास इंस्टीट्यूशंस योजना के नाम से भी जाना जाता है, वर्ष 2017 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य 10 सरकारी और 10 निजी उच्च शिक्षा संस्थानों की पहचान कर उन्हें विश्वस्तरीय शिक्षण और शोध संस्थानों के रूप में विकसित करना था।
हालांकि, समिति ने कहा कि योजना शुरू हुए करीब आठ साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक निर्धारित 20 संस्थानों में से केवल 12 संस्थानों को ही इंस्टीट्यूशंस ऑफ एमिनेंस का दर्जा दिया गया है।
समिति ने पहले भी शिक्षा मंत्रालय से योजना के तहत बाकी संस्थानों को जल्द अधिसूचित करने की प्रक्रिया तेज करने की सिफारिश की थी। इसके जवाब में मंत्रालय ने कहा कि समिति की टिप्पणियों को "ध्यान में रखा गया है" और योजना की नियामकीय प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी।
मंत्रालय ने बताया कि IoE योजना के तहत चयनित संस्थानों को शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय मामलों में अधिक स्वायत्तता दी जाती है, ताकि वे वैश्विक स्तर के विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित हो सकें। सरकारी संस्थानों को वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाती है, जबकि निजी संस्थानों को नियामकीय स्वतंत्रता दी जाती है।
मंत्रालय के अनुसार, IoE का दर्जा हासिल करने के इच्छुक संस्थानों का मूल्यांकन योजना के तहत गठित एम्पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी (EEC) करती है। इसके बाद कमेटी की सिफारिशें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को भेजी जाती हैं। UGC की सिफारिशों के आधार पर शिक्षा मंत्रालय संबंधित संस्थान के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) करता है और फिर उसे इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस घोषित किया जाता है।
हालांकि, संसदीय समिति ने मंत्रालय के जवाब पर असंतोष जताते हुए कहा कि यह केवल प्रक्रिया की जानकारी तक सीमित है और यह स्पष्ट नहीं करता कि आठ साल बाद भी योजना अधूरी क्यों है।
समिति ने कहा कि 20 में से केवल 12 संस्थानों को अधिसूचित किया जाना योजना की धीमी प्रगति को दर्शाता है।
इसके अलावा समिति ने योजना के विस्तार को लेकर भी अपनी पुरानी सिफारिश दोहराई। समिति का कहना है कि देश में कई ऐसे प्रतिष्ठित संस्थान हैं जो सामाजिक विज्ञान, मानविकी और विकास अध्ययन जैसे क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं, लेकिन वे IoE योजना में शामिल नहीं हैं।
इस संदर्भ में समिति ने विशेष रूप से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) का उल्लेख किया और कहा कि यह सामाजिक विज्ञान, मानविकी और विकास अध्ययन के क्षेत्र में विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित संस्थानों में गिना जाता है। समिति ने सरकार से ऐसे संस्थानों को भी योजना के दायरे में लाने पर विचार करने को कहा।
मंत्रालय ने इस सुझाव पर भी मौजूदा चयन प्रक्रिया का हवाला दिया, लेकिन समिति ने इसे पर्याप्त जवाब नहीं माना। समिति ने कहा कि वैश्विक स्तर पर पहचान रखने वाले संस्थानों को शामिल करने की उसकी सिफारिश पर मंत्रालय ने कोई ठोस कदम नहीं बताया है।
अब समिति ने शिक्षा मंत्रालय से कहा है कि वह बाकी बचे आठ इंस्टीट्यूशंस ऑफ एमिनेंस की पहचान और अधिसूचना के लिए समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करे। इसके साथ ही उच्च शिक्षा विभाग को योजना के विस्तार की व्यवहार्यता पर अध्ययन करने का निर्देश दिया गया है, ताकि देश के अन्य उत्कृष्ट संस्थानों को भी इसका लाभ मिल सके।
समिति का मानना है कि IoE योजना का विस्तार और तेज क्रियान्वयन भारत में ऐसे विश्वविद्यालयों के निर्माण में मदद करेगा जो वैश्विक स्तर पर शोध, शिक्षा और नवाचार के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कर सकें।