आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने मंगलवार को कहा कि भारत शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश करके ‘मध्य-आय के जाल’ से निकल सकता है। उन्होंने समावेशी और टिकाऊ वृद्धि के लिए वैश्विक गठबंधनों में भारत की भागीदारी को भी जरूरी बताया।
पेरिस स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स में प्रोफेसर और वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब के सह-निदेशक पिकेटी ने पीटीआई-भाषा के साथ बातचीत में कहा, ‘‘भारत मध्य-आय जाल से निकल सकता है, लेकिन इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसंरचना में बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत होगी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमें भारत की व्यापक अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों में भागीदारी भी चाहिए, जो अधिक समावेशी और टिकाऊ विकास मॉडल का समर्थन करें।’’
‘मध्य-आय जाल’ उस स्थिति को कहा जाता है जब किसी देश के लिए अपेक्षाकृत अधिक मजदूरी के कारण श्रम-प्रधान वस्तुओं के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है, जबकि कम उत्पादकता के कारण वह उच्च मूल्यवर्धित गतिविधियों में भी प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाता। ऐसे में आर्थिक वृद्धि सुस्त पड़ जाती है, मजदूरी स्थिर या घटने लगती है और असंगठित अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ने लगता है।