आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
‘ग्रुप ऑफ 2’ या ‘जी-2’ शब्द 2005 में अमेरिकी अर्थशास्त्री फ्रेड बर्गस्टेन ने गढ़ा था। उनका विचार था कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच मजबूत साझेदारी बनाई जाए।
कुछ वर्षों बाद वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग ने यह संकेत दिया था कि चीन को उदार और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था में शामिल करने की कोशिशें सफल हो रही हैं।
हालांकि, प्रस्तावित ‘जी-2’ का उद्देश्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बड़े और औपचारिक समूह ‘जी20’ की जगह लेना नहीं था, बल्कि उसे और मजबूत करना था।
वैश्विक वित्तीय संकट से निपटने के लिए ‘जी-20’ की व्यापक रणनीति के तहत अमेरिका ने शुरुआती दौर में 787 अरब अमेरिकी डॉलर का आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज लागू किया, जबकि चीन ने 586 अरब डॉलर का प्रोत्साहन पैकेज दिया। इससे दुनिया को कहीं बड़े आर्थिक संकट से बचाने में मदद मिली।
इस सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुई वार्ता ने एक अलग तरह के शिखर सम्मेलन “जी-2” का संकेत दिया है।
शुक्रवार को ट्रंप ने दावा किया कि दोनों देशों के बीच कुछ “अहम व्यापारिक समझौते” हुए हैं। लेकिन शुल्क, दुलर्भ खनिजों या ईरान जैसे मुद्दों पर इन समझौतों का ब्योरा चाहने वालों को निराशा हाथ लगी।