नई दिल्ली।
इंडिया हिस्ट्री फोरम के तत्वावधान में इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित दो दिवसीय नेशनल हिस्ट्री कॉन्फ्रेंस सफलतापूर्वक संपन्न हुई। इस सम्मेलन ने भारतीय इतिहास के अध्ययन को नए दृष्टिकोण से देखने और उसमें मुसलमानों की ऐतिहासिक भूमिका को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की।
सम्मेलन में देशभर से आए इतिहासकारों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री Salman Khurshid, शिक्षाविद Anita Rampal, Ram Puniyani, Salim Engineer, Ishtiaq Hussain सहित कई प्रमुख वक्ताओं ने अपने विचार साझा किए।
डॉ. राम पुनियानी ने अपने संबोधन में कहा कि पिछले कुछ दशकों में इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिससे समाज में विभाजन और नफरत फैलाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐतिहासिक युद्धों को धार्मिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करना गलत है, क्योंकि वे मुख्यतः सत्ता और संसाधनों के लिए लड़े गए थे।
अब्दुल सलाम पुतगे ने भारतीय मुसलमानों की जड़ों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्हें ‘बाहरी’ कहना ऐतिहासिक तथ्यों के खिलाफ है। उन्होंने डीएनए शोध का हवाला देते हुए बताया कि भारत के विभिन्न समुदायों के लोगों ने अलग-अलग समय में इस्लाम अपनाया, जो समानता और आध्यात्मिकता के संदेश से प्रभावित थे।
Salman Khurshid ने कहा कि भारतीय मुसलमानों का योगदान केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने इस सच्चाई को समाज के सामने लाने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि गलतफहमियों और पूर्वाग्रहों को दूर किया जा सके।
प्रोफेसर एस.एम. अजीजुद्दीन हुसैनी ने शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में मुसलमानों के योगदान को रेखांकित किया। वहीं Ishtiaq Hussain ने मध्यकालीन भारत में सांस्कृतिक आदान-प्रदान और भाषाई समन्वय की प्रक्रिया को विस्तार से समझाया।
शिक्षाविद Anita Rampal ने पाठ्यपुस्तकों की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा सामग्री के माध्यम से ही नई पीढ़ी का वैचारिक निर्माण होता है, इसलिए इतिहास को निष्पक्ष और शोधपरक तरीके से प्रस्तुत करना जरूरी है।
दो दिवसीय इस सम्मेलन में विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों ने 20 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए। साथ ही ‘बुक डिस्कशन’ सत्रों के जरिए चयनित पुस्तकों पर गहन विमर्श हुआ।
सम्मेलन के अंत में प्रतिभागियों ने एकमत से कहा कि आज के समय में इतिहास को पूर्वाग्रह से मुक्त, वैज्ञानिक और शोध आधारित दृष्टिकोण से समझना बेहद आवश्यक है, ताकि समाज में संवाद और सौहार्द को बढ़ावा मिल सके।