आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली
नई दिल्ली से लेकर मुंबई तक का सफ़र अक्सर सपनों, संघर्षों और हौसले की एक लंबी कहानी होता है। खासकर तब, जब कोई नौजवान सीमावर्ती और दूरदराज़ इलाके से उठकर देश की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने का सपना देखता है। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है कश्मीर के करनाह क्षेत्र के एक छोटे से गाँव ‘प्राडा’ के रहने वाले नसीम मुग़ल की, जिन्हें उनके अपने लोग ‘वसीम’ के नाम से जानते हैं। यह कहानी सिर्फ एक कलाकार की सफलता नहीं, बल्कि उस जज़्बे की मिसाल है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने सपनों को सच करने का साहस रखता है।
करीब दस साल पहले, नसीम मुग़ल ने अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ जाकर बॉलीवुड में करियर बनाने के लिए मुंबई का रुख किया। उनका परिवार चाहता था कि वह एक सुरक्षित और स्थिर नौकरी करें, जैसे पुलिस या सेना में शामिल हों, जो उस इलाके के युवाओं के लिए आम और सम्मानजनक विकल्प माने जाते हैं। लेकिन नसीम के दिल में अभिनय का जुनून था, और उन्होंने उसी रास्ते को चुना, भले ही उसमें अनिश्चितता और जोखिम भरा हुआ था।

मुंबई पहुंचने के बाद उनके संघर्ष का असली दौर शुरू हुआ। शुरुआती चार साल उनके लिए बेहद कठिन रहे। इस दौरान उन्होंने छोटे-मोटे रोल किए, ऑडिशन दिए और कई बार निराशा का सामना भी किया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार मेहनत और सीखने की चाह ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। उन्होंने टीवी सीरियल्स में काम करके धीरे-धीरे अपनी पहचान बनानी शुरू की और इंडस्ट्री के काम करने के तरीके को समझा।
उनकी मेहनत का फल तब मिला जब उन्हें फिल्म ‘धुरंधर’ (2025) में काम करने का मौका मिला। यह उनके करियर का पहला बड़ा ब्रेक साबित हुआ। इस फिल्म में उन्होंने ‘लुल्ली डकैत’ नाम के एक खतरनाक और दिलचस्प विलेन का किरदार निभाया, जिसने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उनके अभिनय में जो गहराई और प्रभाव था, उसने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। इसके बाद ‘धुरंधर 2: द रिवेंज’ (2026) में उनके कैमियो ने भी दर्शकों के दिलों में उनकी छाप और गहरी कर दी।
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नसीम बताते हैं कि इस फिल्म के लिए चयन प्रक्रिया आसान नहीं थी। उन्होंने पहले कास्टिंग डायरेक्टर के साथ स्क्रीन टेस्ट दिया और फिर निर्देशक से मुलाकात की। उनकी प्रतिभा और मेहनत को देखते हुए उन्हें इस महत्वपूर्ण किरदार के लिए चुना गया। फिल्म में उनका किरदार एक ऐसे डकैत का था जो एक शादी में बदले की नीयत से आता है और कहानी में एक बड़ा मोड़ लाता है। इस दौरान उनका सामना फिल्म के मुख्य किरदार से होता है, जो एक बेहद नाटकीय और यादगार दृश्य बन जाता है।
बड़े पर्दे तक पहुंचने से पहले नसीम ने टीवी इंडस्ट्री में अपनी मजबूत नींव तैयार की थी। उन्होंने करीब 13 साल तक टीवी शो और छोटे प्रोजेक्ट्स में काम किया। लोकप्रिय सिटकॉम ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में ‘मनु भाई’ नाम के एक मैकेनिक के किरदार से उन्हें खास पहचान मिली। इसके अलावा, उन्होंने कई वेब सीरीज़ में भी काम किया, जिससे उनके अभिनय में और निखार आया और उन्हें नई संभावनाएं मिलीं।
एक छोटे से गाँव से आने वाले नसीम के लिए यह सफर आसान नहीं था। उनके पास कोई बैकअप प्लान नहीं था, न ही फिल्म इंडस्ट्री में कोई जान-पहचान। लेकिन उनके अंदर अपने सपने को सच करने की तीव्र इच्छा थी। शुरुआत में उनके परिवार को उनके फैसले पर संदेह था, लेकिन जैसे-जैसे नसीम को काम मिलने लगा और उन्होंने सफलता हासिल की, परिवार का नजरिया बदल गया। आज उनका परिवार और उनका पूरा गाँव उन पर गर्व करता है और उनके साथ खड़ा है।

अपनी सफलता के बावजूद, नसीम अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। उन्हें अपने गाँव, वहां की संस्कृति, लोगों और जीवनशैली की बहुत याद आती है। उन्होंने यह भी चिंता जताई है कि कश्मीर में एक मजबूत स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री का अभाव है, जिसके कारण वहां के युवाओं को अपने हुनर को दिखाने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते। उनका मानना है कि अगर कश्मीर में एक सशक्त क्षेत्रीय फिल्म उद्योग विकसित किया जाए, तो इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और स्थानीय प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मंच मिलेगा।
नसीम बॉलीवुड को अपने जीवन का दूसरा घर मानते हैं। उनका कहना है कि इस इंडस्ट्री ने उन्हें पहचान, सम्मान और आर्थिक स्थिरता दी है। यही वजह है कि वह इसे हमेशा अपने दिल के करीब रखते हैं। हाल ही में, वह तब चर्चा में आए जब उन्होंने अपनी फिल्म की आलोचना का जवाब दिया। कुछ लोगों ने फिल्म को ‘प्रचार’ बताया था, लेकिन नसीम ने इन आरोपों का डटकर सामना किया। उन्होंने कहा कि दर्शकों की जबरदस्त प्रतिक्रिया और फिल्म की सफलता इस बात का प्रमाण है कि सच्ची मेहनत और ईमानदारी को रोका नहीं जा सकता।
युवाओं के लिए नसीम का संदेश बेहद स्पष्ट और प्रेरणादायक है। वह कहते हैं कि अगर आपके अंदर किसी चीज़ को लेकर जुनून है, तो उसे पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ अपनाइए। आधे-अधूरे मन से कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। साथ ही, वह यह भी मानते हैं कि जीवन में संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है,अपने सपनों के साथ-साथ परिवार और जिम्मेदारियों को भी उतना ही महत्व देना चाहिए।
नसीम मुग़ल की कहानी हमें यह सिखाती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत सच्ची हो, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता। एक छोटे से गाँव से निकलकर बॉलीवुड तक पहुंचने का उनका सफर उन सभी युवाओं के लिए एक प्रेरणा है, जो अपने सपनों को सच करने का साहस रखते हैं।