डॉ. शुजात अली कादरी
भारत में आज पहचान, जुड़ाव और राष्ट्रवाद को लेकर जो बहस छिड़ी है, उसमें अमीर खुसरो की आवाज बहुत प्रासंगिक लगती है। खुसरो को अक्सर एक कवि, संगीतकार और निजामुद्दीन औलिया के शिष्य के रूप में याद किया जाता है। लेकिन वे वास्तव में भारतीय सांस्कृतिक चेतना को सबसे पहले परिभाषित करने वालों में से एक थे। उनकी दृष्टि समावेशी थी और आम लोगों के जीवन से जुड़ी थी। आज जब राजनीतिक और सामाजिक विमर्श पहचान को कठोर दायरों में बांट रहे हैं, तब खुसरो एक अलग रास्ता दिखाते हैं।
भारत को लेकर उनका विचार बहिष्कार पर नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने पर आधारित था। वे फारसी में लिखते थे लेकिन हिंदवी में गाते थे। उन्होंने दरबारी शिष्टाचार और लोक संस्कृति के बीच की दूरी को मिटा दिया था। वे सिर्फ भारत में रहते नहीं थे, बल्कि वे सही मायनों में यहीं के होकर रह गए थे।
उनका यह जुड़ाव ऊपरी नहीं था। खुसरो ने भारत की भाषाओं, मौसमों, संगीत और सामाजिक विविधता का जश्न मनाया। उन्होंने गर्व के साथ भारत की सांस्कृतिक विरासत की तारीफ की और इसे दुनिया की महान सभ्यताओं के बराबर खड़ा किया। उन्होंने इस विचार को पूरी तरह नकार दिया कि सांस्कृतिक महानता के लिए हमें बाहर की तरफ देखना चाहिए।
खुसरो के लिए भारत कोई किनारा नहीं बल्कि दुनिया का केंद्र था। उनकी यह भारतीयता उनकी सूफी विचारधारा से अलग नहीं थी। चिश्ती परंपरा ने हमेशा प्रेम, खुलापन और मानवता की सेवा पर जोर दिया है। निजामुद्दीन औलिया के प्रभाव में खुसरो ने एक ऐसी आध्यात्मिक सोच अपनाई जो कट्टरवाद को नकारती थी और इंसानी रिश्तों को अहमियत देती थी। उनका सूफीवाद समाज से कटता नहीं था, बल्कि उसमें पूरी तरह घुला-मिला था।
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— Awaz-The Voice URDU اردو (@AwazTheVoiceUrd) April 8, 2026
खुसरो की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि उन्होंने आध्यात्मिक विचारों को समझाने के लिए स्थानीय संस्कृति का सहारा लिया। कव्वाली, कविता या लोक परंपराओं के जरिए उन्होंने भक्ति की भाषा को सबके लिए आसान बना दिया। उन्होंने ऐसे सांस्कृतिक साझा स्थान बनाए जहां अलग-अलग धार्मिक पहचानों को मिटाने की जरूरत नहीं थी, बल्कि वे सब एक साथ मिलकर रह सकते थे। यह केवल कागजी एकता नहीं थी, बल्कि उनके जीवन का अनुभव था।

आज का भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां पहचान के सवालों को अक्सर विवाद की तरह देखा जाता है। विशेष रूप से भारतीय मुसलमानों के लिए आस्था और राष्ट्रीयता के बीच तालमेल बिठाने का दबाव बढ़ा है। ऐसे समय में खुसरो का जीवन एक मजबूत जवाब देता है।
खुसरो गर्व के साथ मुस्लिम थे और उतने ही गहरे भारतीय भी थे। उनके लिए इन दोनों पहचानों में कोई विरोध नहीं था। उनकी विरासत आज के अलगाववाद और कट्टरवाद, दोनों को चुनौती देती है। वे सिखाते हैं कि भारत के सांस्कृतिक ताने-बाने से जुड़कर रहना ही ऐतिहासिक रूप से सच है।
The line “Bahut kathin hai dagar panghat ki” (The path to the well is very difficult) is not about a physical road. It is a deep insight into the inner resistance one faces when moving toward Truth.
— NaomaKhan (@Naoma_Khan_) March 25, 2026
In Amir Khusro’s tradition, the panghat (well/riverbank) symbolizes the Source —… pic.twitter.com/oCYHti5U7m
खुसरो के विचार आज के युवाओं को कट्टरपंथ से बचाने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। आज जब युवा सोशल मीडिया और भ्रामक जानकारियों के कारण चरमपंथी विचारधाराओं की ओर खिंच रहे हैं, तब खुसरो का प्रेम और खुलेपन का संदेश बहुत जरूरी है। खुसरो का इस्लाम कट्टरता का नहीं बल्कि करुणा का था। वह अलगाव का नहीं बल्कि मेलजोल का धर्म था। खुसरो को याद करना केवल अतीत को याद करना नहीं है, बल्कि एक ऐसे ढांचे को वापस पाना है जो हमें अपनी कई पहचानों के साथ आत्मविश्वास से जीना सिखाता है।
पूरे भारत के लिए खुसरो किसी एक समुदाय के नहीं बल्कि पूरे देश के प्रतीक हैं। वे इस विचार के जीते-जागते उदाहरण हैं कि भारत की असली ताकत मतभेदों को मिटाने में नहीं बल्कि उन्हें स्वीकार करने में है। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास बहिष्कार से नहीं बल्कि एक-दूसरे में समाहित होने से आता है।
सवाल यह नहीं है कि खुसरो इतिहास का हिस्सा हैं या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम उनसे सीखने को तैयार हैं। आज जब सामाजिक ताना-बाना थोड़ा कमजोर पड़ता दिख रहा है, तब खुसरो की विरासत हमें रास्ता दिखाती है। वे हमें एक ऐसे भारत की कल्पना करने के लिए प्रेरित करते हैं जहां पहचान कोई जंग का मैदान नहीं बल्कि एक-दूसरे को जोड़ने वाला पुल हो। यही वह भारत है जिसे अमीर खुसरो ने जिया था और इसी की हमें आज सबसे ज्यादा जरूरत है।
(लेखक मुस्लिम यूथ ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय संयोजक हैं और सूफीवाद, सार्वजनिक नीति व भू-राजनीति जैसे विषयों पर लिखते हैं।)