सुरों की मलिका और पूर्वोत्तर की गूंज

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 13-04-2026
The queen of melodies and the echo of the Northeast
The queen of melodies and the echo of the Northeast

 

पल्लव भट्टाचार्य

भारतीय उपमहाद्वीप में बहुत कम आवाजें ऐसी हैं जो उतनी दूर तक और उतनी गहराई तक पहुंची हैं जितनी आशा भोंसले की आवाज। 12 अप्रैल 2026 को उनके निधन के साथ संगीत के एक सुनहरे युग का अंत हो गया है। उनके गीतों ने भाषाओं, भावनाओं और पीढ़ियों की सरहदों को पार किया। लेकिन उनके विशाल सफर में एक ऐसा हिस्सा भी है जिसकी चर्चा कम होती है। यह सफर है भारत के पूर्वोत्तर, खासकर असम और त्रिपुरा के सांस्कृतिक दिल में उनकी आवाज की पैठ। यह सिर्फ रिकॉर्डिंग की कहानी नहीं है। यह कहानी है सांस्कृतिक लगाव, कलात्मक सम्मान और सुरों के जरिए दिलों को जोड़ने कीI

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इस गहरे जुड़ाव को समझने के लिए सबसे पहले आशा भोंसले की अद्भुत अनुकूलन क्षमता को समझना होगा। उन्हें अक्सर हिंदी फिल्मों, गजलों और पॉप संगीत के लिए जाना जाता है। लेकिन कई भारतीय भाषाओं में गाने की उनकी इच्छा ने ही उनकी आवाज को मुंबई की चकाचौंध से दूर देश के कोने-कोने तक पहुँचाया। भाषाई खुलापन ही वह जरिया बना जिससे उन्होंने पूर्वोत्तर की संगीत परंपराओं में प्रवेश किया। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी अपनी एक अलग और समृद्ध पहचान है।

असम में संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं है। यह वहां के इतिहास, प्रकृति और आध्यात्मिकता की जीवित अभिव्यक्ति है। वहां भूपेन हजारिका और जुबीन गर्ग जैसी महान हस्तियों का गहरा प्रभाव है। इन्हीं दिग्गजों के जरिए आशा भोंसले का असम से नाता और गहरा हुआ। भूपेन हजारिका के साथ उनका रिश्ता सिर्फ पेशेवर नहीं बल्कि कलात्मक था। हजारिका लोक धुनों को वैश्विक रंग देने के लिए जाने जाते थे। उन्होंने आशा जी की आवाज में वह खूबी पहचानी जो भाषा की दीवार लांघकर सीधे दिल तक पहुंचती थी। जब उन्होंने हजारिका के निर्देशन में असमिया गीत गाए तो उन्होंने उन्हें सिर्फ गाया नहीं बल्कि जीया।

जुबीन गर्ग के साथ भी उनका एक खास रिश्ता रहा। यह कोई व्यावसायिक हिट गाना नहीं था बल्कि एक कलात्मक प्रभाव और जुड़ाव था। जुबीन उसी परंपरा से आते हैं जिसे भूपेन हजारिका ने संवारा था। इसी साझी विरासत की वजह से उनके कलात्मक संसार आपस में मिलते हैं। असमिया और बंगाली संगीत के कई मंचों पर इन दोनों कलाकारों ने साथ काम किया।

जुबीन ने हजारिका की कई कृतियों को नए तरीके से पेश किया जिन्हें पहले आशा जी गा चुकी थीं। यह एक ऐसा पुल है जो एक ही संस्कृति की आत्मा को दो अलग-अलग दौर के गायकों से जोड़ता है। जुबीन गर्ग हमेशा उन्हें अपनी प्रेरणा मानते रहे हैं। पूर्वोत्तर के युवा गायकों के लिए आशा जी का करियर एक मिसाल है कि कैसे भाषाई सीमाओं से ऊपर उठा जा सकता है।

उनके असमिया गीतों में ब्रह्मपुत्र की लहरों की लय, पहाड़ों की उदासी और लोक परंपराओं की गर्माहट महसूस होती है। असम के लोगों के लिए एक राष्ट्रीय आइकन का उनकी भाषा को अपनाना गर्व की बात थी। इससे उनकी सांस्कृतिक समृद्धि को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली।

असम के साथ उनका रिश्ता सिर्फ स्टूडियो तक सीमित नहीं था। उनकी वहां की यात्राएं और स्थानीय संगीतकारों के साथ मेल-जोल ने इस बंधन को और मजबूत किया। असम ने उन्हें अपनों की तरह अपनाया। आशा जी ने भी वहां के संगीत को विनम्रता और सीखने की जिज्ञासा के साथ गले लगाया। यह दिखाता है कि भारतीय संगीत विविधताओं के बावजूद संवाद और आपसी प्रेम से फलता-फूलता है।

अगर असम सहयोग का केंद्र था तो त्रिपुरा ने एक अलग तरह का जुड़ाव पेश किया। त्रिपुरा आदिवासी परंपराओं और बंगाली संस्कृति का संगम रहा है। आशा जी का बंगाली संगीत में पहले से ही बड़ा नाम था। इसी वजह से उनकी पहुंच त्रिपुरा के घर-घर तक हो गई। वहां उनके गीत सिर्फ लोकप्रिय नहीं हुए बल्कि संस्कृति का हिस्सा बन गए। रेडियो और सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी आवाज एक साथी की तरह गूंजती रही। बिना भाषाई रुकावट के भावनाओं को जगाने की उनकी कला ने उन्हें एकता का दूत बना दिया।

इसका एक ऐतिहासिक पहलू भी है। आजादी के बाद काफी समय तक पूर्वोत्तर मुख्यधारा के सांस्कृतिक गलियारों से कटा हुआ रहा। ऐसे समय में आशा भोंसले जैसे कलाकारों ने देश के सांस्कृतिक ताने-बाने को जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। रेडियो और रिकॉर्ड के जरिए उनकी आवाज असम और त्रिपुरा के घरों तक पहुंची। भौगोलिक दूरियों के बावजूद वह हर परिवार का हिस्सा बन गईं।

पूर्वोत्तर के साथ उनके जुड़ाव की सबसे खास बात यह थी कि यह बनावटी नहीं था। उन्होंने इसे सिर्फ प्रयोग के तौर पर नहीं लिया। इसमें उनकी सच्ची कलात्मक रुचि झलकती थी। उन्होंने वहां की स्थानीय परंपराओं को दबाया नहीं बल्कि अपनी आवाज से उन्हें और निखारा।

यही वजह है कि आज भी पूर्वोत्तर में उनके प्रति गहरा प्रेम है। असम में भूपेन हजारिका के साथ उनके काम को संगीत के इतिहास का सबसे बड़ा पल माना जाता है। त्रिपुरा में उनके गीत पीढ़ियों को जोड़ने का काम करते हैं।

उनका पूरा करियर ही सीमाओं को तोड़ने का रहा है। चाहे वह पश्चिमी संगीत हो, कैबरे हो या क्षेत्रीय भाषाएं, उन्होंने हमेशा नया करने की कोशिश की। असम और त्रिपुरा में उनका काम इसी सोच का हिस्सा है। आज जब राष्ट्रीय एकता की बातें अक्सर राजनीति तक सीमित रह जाती हैं, उनका संगीत एक बेहतर उदाहरण पेश करता है। यह दिखाता है कि ईमानदारी से किया गया काम दिलों की दूरियां मिटा सकता है। संगीत को किसी अनुवाद की जरूरत नहीं होती।

आज जब पूर्वोत्तर को देश की सांस्कृतिक सोच में ज्यादा जगह मिल रही है, आशा भोंसले के योगदान को याद करना और जरूरी हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि जुड़ाव की यह प्रक्रिया नई नहीं है। यह दशकों से उन कलाकारों के जरिए चल रही है जो संगीत की व्यापकता में विश्वास रखते थे।

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उनकी आवाज कालजयी और बहुमुखी है। असम की घाटियों और त्रिपुरा की वादियों में यह आवाज आज भी गूंजती है। यह सिर्फ एक महान गायिका की आवाज नहीं है। यह एक पुल है जो भाषाओं, क्षेत्रों और दिलों को जोड़ता है। पूर्वोत्तर में उनकी सबसे बड़ी विरासत यही है कि उन्होंने वहां के गीतों को सिर्फ गाया ही नहीं बल्कि वहां की लय, कहानियों और आत्मा को सुना और समझा। इसी वजह से वह आज उस माटी का हिस्सा बन गई हैं।